धर्म-अध्यात्म याद करें नैमिषारण्य की वह संतसभा March 17, 2013 by सूर्यकांत बाली | Leave a Comment सूर्यकांत बाली इलाहाबाद के महाकुंभ में इकट्ठा हुए संत एक बड़ी बैठक कर देश की राजनीति में सार्थक हस्तक्षेप करने की इस रूप में सोच रहे हैं. क्योंकि वे देश को बताना चाहते हैं कि उनकी राय में देश का प्रधानमंत्री कैसा हो. हो सकता है वे नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में […] Read more » नैमिषारण्य
धर्म-अध्यात्म प्रवक्ता न्यूज़ संत और सत्संग के द्वारा ही आत्मा का उद्धार होता है: संत श्री देवरहाशिवनाथ March 11, 2013 / March 11, 2013 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment परमपूज्य ब्रम्हलीन श्री देवरहा बाबा जी महाराज के परम शिष्य त्रिकालदर्शी संत श्री देवरहाशिवनाथदास जी के नेतृत्व में आलम नगर (बिहार) के बाबा सर्वेश्वरनाथ मंदिर में आयोजित त्रिदिवसीय अष्टयाम संकीर्तन व ज्ञान महायज्ञ का आज दिनांक ११ मार्च को समापन हो गया.इस यज्ञ में भारी संख्या में लोगों ने भाग लिया तथा महाप्रसाद ग्रहण किए. […] Read more » देवरहाशिवनाथ
धर्म-अध्यात्म बढ़ते धर्मोपदेशक और नैतिकता का होता पतन March 8, 2013 / March 9, 2013 by निर्मल रानी | 1 Comment on बढ़ते धर्मोपदेशक और नैतिकता का होता पतन निर्मल रानी भारतवर्ष किसी ज़माने में विश्वगुरु कहा जाता था। कोई इस बात को स्वीकार करे या न करे परंतु भारतीय प्राचीन संस्कृति तथा इसकी समृद्ध विरासत पर विश्वास रखने वाले लोगों का आज भी यह मानना है कि हमारे देश ने दुनिया को बहुत कुछ दिया है। खासतौर पर ज्ञान,अध्यात्म व मानवता के क्षेत्र […] Read more » बढ़ते धर्मोपदेशक और नैतिकता का होता पतन
धर्म-अध्यात्म आध्यात्मिक धर्मनिरपेक्षता की संस्कृति February 21, 2013 / February 22, 2013 by आर. सिंह | Leave a Comment (प्रस्तुत आलेख श्री एम एन कुंडू द्वारा अँग्रेज़ी में लिखित और टाइम्स ऑफ इंडिया के ‘द स्पीकिंग ट्री’ नामक स्तंभ के अंतर्गत प्रकाशित आलेख ‘द कल्चर ऑफ स्पिरिचुअल सेक्युलिरिजम’ का हिन्दी अनुवाद है. मुझे लगा कि यह एक ऐसा लेख है, जो भारत की मूल संस्कृति को हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है, अतः इसे अनूदित […] Read more » अध्यात्मिक धर्मनिरपेक्षता की संस्कृति
टॉप स्टोरी धर्म-अध्यात्म आस्था के कुंभ में मौत की डुबकी February 12, 2013 by प्रमोद भार्गव | 1 Comment on आस्था के कुंभ में मौत की डुबकी प्रमोद भार्गव धार्मिक आयोजनों में जतार्इ जाने वाली श्रद्धा और भक्ति से यह आशय कतर्इ नहीं निकाला जा सकता कि वाकर्इ इनमें भागीदारी से इहलोक या परलोक सुधरने वाले हैं। बलिक जिस तरह से धार्मिक स्थालों पर हादसे घटने का सिलसिला शुरू हुआ है उससे तो यह साफ हो रहा है कि इनमें भागीदारी कर […] Read more » आस्था के कुंभ में मौत की डुबकी
धर्म-अध्यात्म हिंदुत्व और चाटुकारिता को पहचानना होगा February 10, 2013 by सिद्धार्थ शंकर गौतम | Leave a Comment सिद्धार्थ शंकर गौतम कौन कहता है धर्म और राजनीति का मेल नहीं हो सकता? यकीन न हो तो जरा संगम तट पर चल रहे महाकुंभ में राजनीति के चौसर पर चल रही चालों को देखिए। ऐसा प्रतीत होता है मानो धर्म ही अब राजनीति का मार्ग प्रशस्त करने की ओर अग्रसर है। चूंकि भारत धार्मिक […] Read more » हिंदुत्व और चाटुकारिता को पहचानना होगा
चिंतन गाँधी जीवन दर्शन और आज का देश February 5, 2013 / February 6, 2013 by प्रभात कुमार रॉय | 1 Comment on गाँधी जीवन दर्शन और आज का देश प्रभात कुमार रॉय गाँधी के आदर्शो से वस्तुतः बहुत ही दूर चला गया हमारा देश, किंतु गाँधी के महान् आदर्शो की आवश्यकता देश आज भी अत्यंत गहनता से महसूस करता है। इसी प्रबल गहन भाव में बहुत बड़ी उम्मीद के सूत्रबीज विद्यमान हैं। हम यदि चाहे तो गाँधी के सहारे भारतीय सभ्यता-संस्कृति के समग्र बोध […] Read more » गाँधी जीवन दर्शन और आज का देश
धर्म-अध्यात्म नदी संरक्षण से जुड़ा महाकुंभ January 27, 2013 / January 27, 2013 by पियूष द्विवेदी 'भारत' | Leave a Comment हजारों सालों से चली आ रही अपनी परम्परा के गौरवशाली इतिहास के अनुरूप एकबार फिर महाकुंभ का आरम्भ हो चुका है ! वार्षिक कुम्भ का आयोजन तो प्रतिवर्ष किया जाता है, पर प्रत्येक बारह वर्ष में, एक विशेष ग्रह स्थिति आने पर, आयोजित होने वाले इस महाकुंभ का विशेष महत्व है ! वहाँ उपस्थित प्रशासन […] Read more »
चिंतन ऊँचाइयां पाने की तमन्ना हो तो, अपने संस्कारों से नीचे न गिरें January 15, 2013 by डॉ. दीपक आचार्य | Leave a Comment डॉ. दीपक आचार्य जीवन के निर्माण में संस्कारों और आदर्शों का जितना महत्त्व है उतना और किसी का नहीं। अपनी आनुवंशिक परंपरा और पूर्वजों से प्राप्त संस्कारों के साथ ही हमारे शैशव में प्राप्त एवं स्थापित होने वाले संस्कारों के माध्यम से ही हमारे व्यक्तित्व की नींव का निर्माण होता है। इस नींव में जितने […] Read more »
चिंतन जन-जागरण विडंबनाओं के देश में स्त्री-सुरक्षा.. January 2, 2013 by अरुण कान्त शुक्ला | 1 Comment on विडंबनाओं के देश में स्त्री-सुरक्षा.. अरुण कान्त शुक्ला दुनिया के किसी भी देश में रहने वाले इतनी विडंबनाओं के साथ नहीं जीते, जितनी विडंबनाओं के साथ हमें भारत में जीना पड़ता है। धर्म, सम्प्रदाय और राजनीति से परे हम भारतीयों में यदि कोई एकरूपता है, तो वह है, भारतीयों की सोच और कथनी, कथनी और करनी में मौजूद पाखंड। भारतीय […] Read more » women safety
चिंतन लापरवाह नागरिक बनाना चाहते हैं आदर्श राष्ट्र January 2, 2013 by बी.पी. गौतम | Leave a Comment एक से अधिक व्यक्तियों के जुड़ने से एक परिवार बनता है, परिवारों के मिलने से मोहल्ला, नगर और समाज का निर्माण का होता है। इसी क्रम में कुछ गांवों को मिला कर एक विकास खंड बना है, कुछ विकास क्षेत्रों को मिला कर एक तहसील और कई तहसीलों को मिला कर एक जनपद बना है। […] Read more » making a true India
चिंतन समाज उत्तर हर बार औरत को ही क्यों देना पड़ता है? – कुलदीप चंद अग्निहोत्री December 29, 2012 / December 29, 2012 by डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री | 2 Comments on उत्तर हर बार औरत को ही क्यों देना पड़ता है? – कुलदीप चंद अग्निहोत्री दिल्ली में पिछले दिनों चलती बस में कुछ लोगों ने तेईस साल की एक लड़की से बलात्कार किया । केवल बलात्कार ही नहीं बल्कि राक्षसी तरीक़े से उसे शारीरिक चोटें भी पहुँचाई गईं । अब वह लड़की जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही है । पुलिस इस समय भी उससे अपनी इच्छानुसार बयान लेना […] Read more »