कविता प्यार के पत्ते जब झड़ जाते है,पतझड़ आ जाता है जीवन में May 29, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment प्यार के पत्ते जब झड़ जाते है,पतझड़ आ जाता है जीवन में शरीर के अंग जब थक जाते है,बुढ़ापा आ जाता है जीवन में ह्रदय तोड़ दे जब कोई तुम्हारा,नीरसता आ जाती है जीवन में पास न हो जब प्रियतम तुम्हारा,विरहता आ जाती है जीवन में मिलन हो जाये जब दो दिलो का,खुशियां आ जाती […] Read more » क्रान्ति तुम्हारे मन का मीत मिल जाये तुमको संतोष धन
कविता सुनो सुजाता : एक May 29, 2018 by आशुतोष माधव | Leave a Comment सुनो सुजाता : एक सुनो सुजाता मैं नहीं जानता तुम्हारा समाज-सत्य। शब्दार्थ की रपटीली पगडंडियाँ यदि हैं,आपका सचेत चुनाव तो आओ, बैठो बातें करो। सुनो सुजाता : दो शब्द सोते हैं शब्द जागते हैं रोना, खिलखिलाना, गुदगुदाना या फिर बाएँ कान में खुसफुसाना : सब कुछ करते हैं शब्द ठीक हमारी तरह। फर्ज करो हमें […] Read more » कम बुरा बुरा मामूली बुरा समाज-सत्य सुनो सुजाता : एक
कविता समर्पण बढ़ रहा है प्रभु चरण में! May 28, 2018 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment समर्पण बढ़ रहा है प्रभु चरण में, प्रकट गुरु लख रहे हैं तरंगों में; सृष्टि समरस हुई है समागम में, निगम आगम के इस सरोवर में ! शान्त हो स्वत: सत्व बढ़ जाता, निमंत्रण प्रकृति से है मिल जाता; सुकृति हो जाती विकृति कम होती, हृदय की वीणा विपुल स्वर बजती ! ठगा रह जाता नृत्य लख लेता, स्वयम्बर अम्बरों का तक लेता; प्राण वायु में श्वाँस उसकी ले, परश मैं उसका पा सिहर लेता ! वे ही आए सजाए जग लगते, संभाले लट ललाट लय ललके; साथ चल दूर रह उरहिं उझके, कबहु आनन्द की छटा छिटके ! कराएँगे न जाने क्या मगों में, दिखा क्या क्या न देंगे वे पलों में; जहान जादूगरी है झाँकते बस, मिला कर नयन ‘मधु’ उनके नयन में ! रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’ Read more » कबहु आनन्द जहान जादूगरी प्रभु चरण में! समर्पण बढ़ रहा सृष्टि समरस स्वयम्बर अम्बरों
कविता ज़िन्दगी का रंग May 28, 2018 by पंखुरी सिन्हा | Leave a Comment पंखुरी सिन्हा बिना उसका नाम लिए बिना कहे वह शब्द क्योंकि इतना बड़ा है जीवन किसी भी भाषा की अभिव्यक्ति से जगमगा जाता है अक्सर किसी रंग की आहट टिमटिमाहट में जबकि रंग उजास में हैं और उसके बाहर के अँधेरे में भी जीवन लेकिन, एक रंग तो होता ही है ज़िन्दगी का मौत […] Read more » गंदला गन्दुमा चला आता है ज़िन्दगी का रंग दस्तक देता मारा मारी स्याह
कविता मन का मेला May 28, 2018 by शकुन्तला बहादुर | Leave a Comment मेरे अतीत के आँगन में है,अनगिन सुधियों का मेला । कहाँ कहाँ ये जीवन बीता , कहाँ कहाँ ये है खेला ।। * रंग-बिरंगी लगीं दुकानें , तरह तरह के हैं झूले । उन सब में भटका सा ये मन,अपना सब कुछ भूले ।। * झूले के घोड़े पर बैठा , ये मन सरपट […] Read more » आँगन में कहीं ठहर जाता मेरे अतीत मेले में बिछड़े
कविता प्रतीक्षा में है बहुत कुछ May 26, 2018 / May 26, 2018 by पंखुरी सिन्हा | Leave a Comment हम कभी तो निकलेंगे धर्म के जंजाल से जातियों के मोहजाल से कर्मकांडो के मायाजाल से कि प्रगति सचमुच हमारी राह देखती है— पहुंचेंगे उस तक कभी हम जाने किस सूर्योदय के सुनहले पंख लिए होकर विजित जाने किन अस्मिताओं की कैसी लड़ाइयों में जो उभरती ही रहती हैं निरंतर शान्ति के पटल पर अकारण […] Read more » कर्मकांडो कुछ खेतों जंगलों प्रतीक्षा में है बहुत
कविता उचित अनुचित है अपेक्षित होता ! May 24, 2018 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment उचित अनुचित है अपेक्षित होता, बुरों को भी कोई बुरा लगता; अच्छों को अच्छे बहुत से लगते, बुरों को अच्छा कोई है लगता ! देखता सृष्टा सबों को रहता, लख के गुणवत्ता ढालता रहता; अधूरे अध-पके जीव सब हैं, सीखने सुधरने ही आए हैं ! निखरते निरन्तर ही रहना है, मापदण्डों में उसके गढ़ना है; […] Read more » ‘मधु’ टपकाता अपेक्षित होता उचित अनुचित माँगते रहते
कविता पंछियों के मंत्र पाठ से प्रभात, मंगल-प्रभात होता: May 19, 2018 by डॉ. मधुसूदन | Leave a Comment डॉ. मधुसूदन (एक) एक चुनौती भरी कठिन प्रस्तुति: कवि की कल्पना कविकल्पना ही कहलाती है. कवि जो देखता है वो रवि भी नहीं देख सकता. एक ऐसी ही थोडी कठिन कविता प्रस्तुत करता हूँ. कुछ बौद्धिक व्यायाम होगा. पर बिना बौद्धिक व्यायाम वास्तव में मनोरंजन भी संभव नहीं होता. कुछ पाठक तो लाभान्वित होंगे […] Read more » आंँगन आँगनों गुरुकुल वृक्ष-झुण्ड वृक्षों वृक्षों शाख शाख
कविता कर्नाटक का नाटक खत्म नहीं हुआ,अभी और देखना बाकी है May 18, 2018 by आर के रस्तोगी | 1 Comment on कर्नाटक का नाटक खत्म नहीं हुआ,अभी और देखना बाकी है कर्नाटक का नाटक खत्म नहीं हुआ,अभी और देखना बाकी है अभी तो ट्रेलर देखा है तुमने,पूरी फिल्म अभी देखना बाकी है येदुरप्पा ने अभी शपथ ली है,औरो को शपथ दिलाना बाकी है येदुरप्पा को अभी सदन में,अपना बहुमत सिद्ध करना बाकी है राजनीति में जोड़-तोड़ की हवा चली है,खरीद-फरोख्त बाकी है कुछ एम एल ऐ […] Read more » कर्नाटक नाटक खत्म नहीं बहुमत सिद्ध राजनीति
कविता मिले न जब मन का मीत,मनमीत तुम किसे बनाओगी ? May 18, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment मिले न जब मन का मीत,मनमीत तुम किसे बनाओगी ? मै मीरा बनकर अपने मनमोहन को मनमीत बनाऊँगी जब तोड़ दे कोई ह्रदय तुम्हारा,फिर किसके द्वार तुम जाओगी ? जब तोड़ेगा कोई ह्रदय मेरा,अपने द्वारकाधीश के द्वार जाऊंगी जब मिले न कोई संग-साथ,फिर किसको संगीत सुनाओगी ? जब मिलेगा न कोई संग-साथ,मीरा बनकर भजन सुनाऊंगी […] Read more » अंतिम संस्कार कराओगी ? आंसू बहाओगी मन का मीत मिले न जब विष का प्याला
कविता माँ ने पूछा,मै आई किसके हिस्से में ? May 15, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment सन्नाटा छा गया बटवारे के किस्से में माँ ने पूछा,मै आई किसके हिस्से में ? कहते है सभी लोग आज माँ का दिन है मै कहता हूँ,कौन सा दिन माँ के बिन है एक अच्छी माँ होती है सभी के पास होती नहीं अच्छी औलाद सभी के पास माँ तो एक सबसे बड़ी नियामत हे […] Read more » औलाद ज़िन्दगी नियामत बहन भाई मां
कविता ‘फिर जुल्फ लहराए’ May 14, 2018 by कुलदीप प्रजापति | Leave a Comment ‘फिर जुल्फ लहराए’ फिजा ठंडी हैं कुछ पल बाद ये माहौल गरमाए। कहीं चालाकियाँ ये इश्क में भारी न पड़ जाए। ज़रा सी गुफ्तगू कर लें, बड़े दिन बाद लौटे हो, नज़ाकत हुस्न वालों के ज़रा हालात फरमाए। अहा! क्या खूबसूरत आपने यह रंग पाया हैं, निशा का चाँद गर देखे तो खुद में ही […] Read more » इश्क खूबसूरत ज़ियारत बद्दुआएँ सजदा