कविता रामस्वरूप रावतसरे की पांच लघु कविताएं September 5, 2009 / December 26, 2011 by रामस्वरूप रावतसरे | Leave a Comment 1-नीम नीम खुद ही हकीम 2-हिम्मत फटे को सीना और सिले को फाडना हिम्मत का काम है 3-घर आदमी को पता है, घर जाते ही समस्याओं से जुझना पडेगा फिर भी वह खूंटे के बैल की तरह गर्दन नीची किए हर शाम चला जाता है घर 4-मूल्यांकन हम उच्च व्यवस्था का दम्भ भरते है पर […] Read more » poem
कविता प्रवक्ता न्यूज़ राकेश उपाध्याय की चार कविताएं September 3, 2009 / December 26, 2011 by राकेश उपाध्याय | 5 Comments on राकेश उपाध्याय की चार कविताएं छंटे तिमिर, खिले तो उपवन उठे जलजला जले जरा फूटे यौवन छंटे तिमिर तरे जन खिले तो उपवन। मन कानन में बाजे बंशी़, भोरे रे गाय रंभाती,हमें बुलाती, दुह ले रे यह सूर्य किरण, चमके घर~आंगन भाग्य जगा है सुन~सुन तो ले रे। उठे जलजला जले जरा फूटे यौवन छंटे तिमिर तरे जन खिले तो […] Read more » Poems
कविता भारत बनाम ईंडिया…….. August 30, 2009 / December 27, 2011 by सुरभी | 2 Comments on भारत बनाम ईंडिया…….. भारत बनाम ईंडिया…….. सहमा सकुचा सिमटा सा उपेक्षित,निरुत्साह, भारत है डरा हुआ ईंडिया है स्वाभिमानी,स्वछंद स्वतंत्र उदंडता,उत्साह उमंग से भरा हुआ सहमा हुआ है डरा हुआ है पर अडिग है अस्तित्व को बचाने के लिये विडंबना है कि हर ईंडियन आतुर है भारत को बेचकर खाने के लिये…… दुनिया को बदल दे भारत में वो […] Read more » India भारत
कविता मेरा पहला प्यार………… August 23, 2009 / December 27, 2011 by सुरभी | 4 Comments on मेरा पहला प्यार………… मेरा पहला प्यार………… एक दिन यूं ही ख्याल आया अलग तरिके से देखूं ये संसार क्या सबकी सोच एक जैसी है? क्या सबके लिये खास होता है, उनका पहला प्यार? चलते – चलते, रोते बिलखते, एक बच्ची को देखा! पुछा तुम्हारा पहला प्यार क्या है छोटी? बडी मासुमीयत से बोली बच्ची ने, दीदी! मेरा […] Read more » Love प्यार
कविता महँगाई का दंश – पुनीता सिंह August 23, 2009 / December 27, 2011 by पुनीता सिंह | 1 Comment on महँगाई का दंश – पुनीता सिंह बरसात आती है या महँगाई बरसती है बाजार मे हर चीज बहुत मंहगी है। बाहर बाढ जैसा नज़ारा है इधर घर की नाव डूबने को है। सब्ज़ियों के भाव बादल जैसे गरज रहे है हर चीज को महगाई ने डस लिया है इन्सान और इन्सानियत क्यों इतनी सस्ती हो गई? राह चलते इसके दूकानदारो की […] Read more » Inflation महँगाई
कविता आईना August 22, 2009 / December 27, 2011 by पुनीता सिंह | 1 Comment on आईना मानवीय मूल्यों के प्रसंग में आदर्शो की बात करते है सब, एक आईना लगा है हर घर के आँगन मे दूसरो के दोष उसमें दिखते हैं अपनी आकॄति सुन्दर॥ क्यो होता है ऐसा? खेल क्यो समझते है वो खिल्ली उडाना, मजे लेना, दिल्लगी करना। समय काटना/दूसरो को हँसाना हो सकती है उनकी आदत पर किसी […] Read more » Mirror आईना
कविता कविता/अबोध बच्चा August 7, 2009 / December 27, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 1 Comment on कविता/अबोध बच्चा अबोध बच्चा कल मिला मुझे अबोध बच्चा एक आंखों में आंसू होंठों पर सिसकियों के साथ न जाने उसका अपना कौन, क्या कहां गुम था ? सुनाई पड़ रही थी उसके रोने की हिचकियां चुप कराने की बहुत की कोशिश बच्चा नहीं माना नहीं थम रहे थे आंसू आंखों में टंगा था किसी के लिए […] Read more » poem कविता
कविता आओ, अंधेरे से हम लड़ें August 4, 2009 / December 27, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 3 Comments on आओ, अंधेरे से हम लड़ें रात कितनी भी अंधेरी – घनी क्यों न हो रात कोख में छिपी होती है उजाले की किरण। कितना भी तुम क्यों न सताओ किसी को- अपने बच्चे को देख उभरती है तुम्हारे चेहरे पर अब भी मुस्कान। अंधेरा- नहीं पहचानने देता है खुद की शक्ल और अंधेरे की उपज तमाम अनबुझी कामनाएं सुरसा की […] Read more » Dark अंधेरे
कविता शायद पत्रकार हूँ मैं…. August 2, 2009 / December 27, 2011 by हिमांशु डबराल | 5 Comments on शायद पत्रकार हूँ मैं…. क्या कहूँ कौन हूँ मैं??? शायद इंसानों की भीड़ का हिस्सा, या उस भीड़ में सबसे जुदा शब्दों का काश्तकार हूँ मैं, शायद पत्रकार हूँ मैं… एक आईना जो बहुत कुछ दिखता है, कभी हकीकत तो कभी झूठ से भी मिलवाता है, कभी-कभी तो धुंधुला भी पड़ जाता है, उस आईने का व्यवहार हूँ मैं, […] Read more » journalist पत्रकार
कविता जीवन की उलझी राहों में ……… July 26, 2009 / December 27, 2011 by जयराम 'विप्लव' | 1 Comment on जीवन की उलझी राहों में ……… ख़ुद से दूर रहना चाहता हूँ , अपने हीं अक्स से घबराता हूँ , प्यार किसी से करता हूँ , क्या प्यार उसी से करता हूँ ? Read more » life जीवन
कविता हम जान बुझ कर फिसल गये July 12, 2009 / December 27, 2011 by कनिष्क कश्यप | Leave a Comment सभी मिट्टी के घरौंदे टूट गये हाथों से हाथ जब छुट गये तैरने लगे सपने बिखर के नैनों से जो सावन फ़ूट गये तरस गये शब नींद को तश्न्गी से लब तरश गये नाखुदा ने पुकार भी की कई अब्र फ़िर भी बरस गये सरगोशी से कुछ बात चली हम गिरते-गिरते संभल गये मुझे था […] Read more » Kanishka Kashyap Love Love Songs Poems
कविता विविधा कनिष्क कश्यप : अक्श बिखरा पड़ा है आईने में June 10, 2009 / December 27, 2011 by कनिष्क कश्यप | 3 Comments on कनिष्क कश्यप : अक्श बिखरा पड़ा है आईने में अक्श बिखरा पड़ा है आईने में मैं जुड़ने कि आस लिए फिरता हूँ कदम तलाशते कुछ जमीं हाथों पर आकाश लिए फिरता हूँ कठोर हकीक़त है है मेरा आज कल खोया विस्वास लिए फिरता हूँ कदम उठते पर पूछते कुछ सवाल क़दमों का उपहास लिए फिरता हूँ कामयाबियां खुशी नहीं दे पाती ऐसी कमी का […] Read more » Mirror आईने