कविता साहित्य विकृतियाँ समाज की May 2, 2016 by राघवेन्द्र कुमार 'राघव' | Leave a Comment राघवेन्द्र कुमार राघव मेरे मन की बेचैनी को, क्या शब्द बना लिख सकते हो ? तक़लीफ़ें अन्तर्मन की, क्या शब्दों मे बुन सकते हो ? लिखो हमारे मन के भीतर, उमड़ रहे तूफ़ानों को । लिखो हमारे जिस्मानी, पिघल रहे अरमानों को । प्यास प्यार की लिख डालो, लिख डालो जख़्मी रूहें । लिखो ख़्वाहिशों […] Read more » विकृतियाँ समाज की
कविता साहित्य सखी वे हैं भी या कि हैं ही नहीं April 21, 2016 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment सखी वे हैं भी या कि हैं ही नहीं, हुआ अहसास नहीं उम्र गई; कबहुँ बौराई कबहुँ भायी रही, जगत की माया समझ पाई नहीं ! सहज गति आई नहीं धायी रही, मग़ज मैं मारी रही बूझी नहीं; कर्म बहुतेरे करी धर्म बही, तबहु मैं तरी कहाँ मर्म गही ! ध्यान दुनियाँ कौ रह्यौ उनकौ […] Read more »
कविता साहित्य भारत – स्वच्छ – अस्वच्छ April 19, 2016 / April 21, 2016 by आशा वर्मा | 1 Comment on भारत – स्वच्छ – अस्वच्छ आँख में उँगली डाल एक ज़ोरदार नारे ने हमें झकझोर कर जगा दिया – “स्वच्छ भारत” आजतक पता ही नहीं था कि हम स्वच्छ नहीं हैं । हम तो अबतक यही मानते रहे कि हमने नहा कर तन बदन साफ़ किया । घर-द्वार बुहार कर कूडा कचरा घर के बाहर कर दिया। पूजा-पाठ करके मन […] Read more » अस्वच्छ भारत स्वच्छ
कविता साहित्य “ऐसा अपना भारतवर्ष हो” April 11, 2016 by प्रवक्ता ब्यूरो | 2 Comments on “ऐसा अपना भारतवर्ष हो” रँग वर्ण और सम्प्रदाय का, भेदभाव ना हो आपसी I कर्तव्यपरायण प्रशासक हों, राजधर्म की हो वापसी II अटूट अलौकिक ऐसे ग्रह पर, अपनी भी एक अदभुत छवि हो विश्व-गुरु अति प्रेरणात्मक, ऐसा अपना भारतवर्ष हो II तमिल तेलुगू और केरल में, रिमझिम रिमझिम सी वर्षा हो I कन्नड़ गोवा महाराष्ट्र में, मलयपवन मय मधु […] Read more » ऐसा अपना भारतवर्ष हो
कविता साहित्य प्रष्फुटित चित्त है हुआ जब से ! April 10, 2016 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment प्रष्फुटित चित्त है हुआ जब से, महत महका किया है अन्तस से; अहम् विकसित हुआ किया चुप से, शिशु सृष्टि को निरखता उर से ! चाहता द्रश्य हर लखे झट से, किए विचरण तके प्रकृति पट से; दृष्टि आकाश अग्नि जड़ ताके, बना सम्बन्ध जीव जग समझे ! ललक ले समझे भाषा लय मुद्रा, बोलता […] Read more » प्रष्फुटित चित्त है हुआ जब से !
कविता साहित्य नव संवत्सर पर इड़ा, मही, सरस्वती को नमन March 29, 2016 by विमलेश बंसल 'आर्या' | Leave a Comment विमलेश बंसल ‘आर्या’ नमन तुम्हें हे नव संवत्सर, नमन तुम्हें हे आर्य समाज। नमन तुम्हें हे भारत माता, नमन तुम्हें हे प्रिय ऋषिराज।। नव संवत् की चैत्र पंचमी, आर्य समाज बनाया था। गहन नींद से जगाकर ॠषि ने, सत्य का बोध कराया था।। पीकर विष पत्थर खा खाकर, पुनः किया हमको आगाज़॥ नमन तुम्हें […] Read more » नव संवत्सर नव संवत्सर पर इड़ा सरस्वती को नमन
कविता साहित्य उलझन March 25, 2016 by बीनू भटनागर | Leave a Comment उलझी हुई सी ज़िन्दगी, बेचैन सी रातें, उलझे हुए तागों मे, पड़ती गईं गाँठे, ये गाँठे अब, खुलती नहीं मुझसे उलझी हुई गाँठों को बक्से बन्द करदूँ, या गाँठों से जुडी बातों को, जहन से अलग कर दूँ। अब कोई मक़सद, नया मै कहीं ढूँढू, ज़िन्दगी की यही चाल है तो, ऐसे ही न क्यो जी लूँ Read more » उलझन
कविता साहित्य केकरा संग खेलहूं फाग March 24, 2016 by विपिन किशोर सिन्हा | 3 Comments on केकरा संग खेलहूं फाग बुरा न मानें होली है — एक ठे स्पेसल फगुआ केकरा संग खेलहूं फाग इटली दूर बसत है इटली दूर बसत है केकरा संग खेलहूं फाग कि नैहर दूर बसत है। परणव से मोहे लाज लगत है मोदिया के मन बेईमान नैहर दूर बसत है केकरा संग खेलहूं फाग नैहर दूर बसत है। दिग्गी मगन […] Read more » Featured केकरा संग खेलहूं फाग
कविता साहित्य अब हम शिक्षक की बारी है March 19, 2016 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment कई दिनों के बाद आज यें स्वर्णीम अवसर आया है। बड़ी तपस्या करके हमने, शिक्षक रूप को पाया है।। मन में उठी तमन्ना है, पूरी कर ली तैयारी है। बहुत पढ़ाया लोगो ने, अब हम शिक्षक की बारी है।। विश्वविद्यायल की माटी में अब बीज शान के बोना है। कतर््ाव्यों से सींच के […] Read more » अब हम शिक्षक की बारी है
कविता साहित्य क्या मै लिख सकूँगा : पेड़ की संवेदनाओं को March 15, 2016 by प्रवक्ता ब्यूरो | 2 Comments on क्या मै लिख सकूँगा : पेड़ की संवेदनाओं को सुशील कुमार शर्मा कल एक पेड़ से मुलाकात हो गई। चलते चलते आँखों में कुछ बात हो गई। बोला पेड़ लिखते हो संवेदनाओं को। उकेरते हो रंग भरी भावनाओं को। क्या मेरी सूनी संवेदनाओं को छू सकोगे ? क्या मेरी कोरी भावनाओं को जी सकोगे ? मैंने कहा कोशिश करूँगा कि मैं तुम्हे पढ़ […] Read more » cutting of trees poem on cutting of trees poem on trees क्या मै लिख सकूँगा पेड़ की संवेदना
कविता साहित्य अभिशप्त March 15, 2016 / March 17, 2016 by डॉ. प्रतिभा सक्सेना | 3 Comments on अभिशप्त रात का था धुँधलका , सिर्फ़ तारों की छाँह । मैंने देखा – मन्दिर से निकल कर एक छायामूर्ति चली जा रही है विजन वन की ओर । आश्चर्यचकित मैंने पूछा, ” देवि ! आप कौन हैं ? रात्रि के इस सुनसान प्रहर में अकेली कहाँ जा रही हैं ? ” * वह चौंक गई, […] Read more » abhishapt poem by Dr. Pratibha saksena अभिशप्त अयोध्या अभिशप्त है
कविता साहित्य कबहू उझकि कबहू उलटि ! March 15, 2016 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment कबहू उझकि कबहू उलटि ! कबहू उझकि कबहू उलटि, ग्रीवा घुमा जग कूँ निरखि; रोकर विहँसि तुतला कभी, जिह्वा कछुक बोलन चही ! पहचानना आया अभी, है द्रष्टि अब जमने लगी; हर चित्र वह देखा किया, ग्रह घूम कर जाना किया ! लोरी सुने बतियाँ सुने, गुनगुनाने उर में लगे; कीर्तन भजन मन भावने, लागा […] Read more » poem by gopal baghel कबहू उझकि कबहू उलटि ! चहकित चकित चेतन चलत