पुस्तक समीक्षा साहित्य सजग पत्रकार की दृष्टि में मोदी-युग June 23, 2017 by संजय द्विवेदी | Leave a Comment संजय द्विवेदी के जन्म से पूर्व के एक तथ्य को मैं अपनी तरफ से जोड़ना चाहता हूं, जब भारत विभाजन के पश्चात पश्चिमी पंजाब से लाखों की संख्या में हिंदू पूर्वी पंजाब पहुंचे तो संघ के स्वयंसेवकों ने बड़ी संख्या में उनके आतिथ्य, त्वरित पुर्नवास और उनके संबंधियों तक उन्हें पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय बड़ी तादाद में अनेक व्यक्ति घायल और अंग-भंग के शिकार होकर विभाजित भारत में पहुंचे थे। उन्हें यथा संभव उपचार उपलब्ध कराने में संघ के स्वयंसेवकों ने शासन-प्रशासन तंत्र को मुक्त सहयोग दिया था। उसके साथ ही स्वतंत्र भारत ने अनेक प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी संघ के अनुषांगिक संगठनों से जुडे़ समाज सेवियों को स्वतःस्फूर्त सक्रिय पाया जाता रहा। Read more » मोदी युग सजग पत्रकार की दृष्टि में मोदी-युग
व्यंग्य हैलो माईक टेस्टिंग , हैलो , हैलो June 22, 2017 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment चौबे जी मंद मंद मुस्काये , बोले –ठीक पकड़े है . आज की सत्ता के शिखर पर बैठे पुरोधा यही तो चाहते हैं , यही तो इनका एजेंडा है , कि वजन बढे तो केवल उनका , दूसरा कोई इनके समान वजन धारी ना हो जाए . सुना है कि कुछ ‘शाह’ लोग ज्यादा ही वजनधारी होने लगे थे , पर समय रहते हमारे पारखी ‘ग्रीन टी’ वाले की नजर पड़ गयी और आज उनका लगभग बीस किलो वजन कम हो गया बताते हैं . वजन कम करने की तकनीक में तो ग्रीन टी का कोई सानी नहीं है . कल तक जिनकी ‘वाणी’ में अदम्य ‘जोश’ था , आज उनका इतना कम वजन हो गया है कि कोई उनका वजन तौलने तक राजी नहीं है . Read more »
लेख शख्सियत क्षणजन्मा डॉक्टर हेनरी नॉर्मन बेथुन June 22, 2017 / June 22, 2017 by गंगानन्द झा | Leave a Comment किताब चलते रहने का हौसला पैदा करती है, रास्ता दिखाती है और कभी कभी हमारा रास्ता रोककर खड़ी हो जाती है। — अनाम कभी कभार ही ऐसा होता है कि आपके हाथ ऐसी किताब लग जाए जो सालों बीत जाने पर भी आपकी चेतना को संस्कार-मण्डित करती रहती है और सदा के लिए महत्वपूर्ण […] Read more » Featured हेनरी नॉर्मन बेथुन
कविता साहित्य है नाट्यशाला विश्व यह ! June 18, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment है नाट्यशाला विश्व यह, अभिनय अनेकों चल रहे; हैं जीव कितने पल रहे, औ मंच कितने सज रहे ! रंग रूप मन कितने विलग, नाटक जुटे खट-पट किए; पट बदलते नट नाचते, रुख़ नियन्ता लख बदलते ! उर भाँपते सुर काँपते, संसार सागर सरकते; निशि दिवस कर्मों में रसे, रचना के रस में हैं लसे […] Read more » नाटक नियन्ता के अनंत ! हैं कीट कितने विचरते ! है नाट्यशाला विश्व यह !
कविता साहित्य मैं आज तेरा नाम लिख लूँ June 16, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment प्रेम के इक गीत पर मैं आज तेरा नाम लिख लूँ पंछियों की चहक मीठी शहद जैसे मन में घोले कोकिला की मृदु कुहुक पर आज तेरा नाम लिख लूँ रंग हर ऋतु का अलग है ढंग भी उसका नया है धूप के हर क़तरे पर मैं आज तेरा नाम लिख लूं […] Read more » मैं आज तेरा नाम लिख लूँ
कविता साहित्य क्योंकि मोबाइल है… June 16, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment घड़ी पहनने की आदत छूट गई, पहले पैन साथ लेके चलते थे वो आदत भी छूट गई अब तो क्योंकि मोबाइल है……,, कैमरे की भी ज़रूरत नहीं है अब, पहले वीडियो बनाना मुश्किल था, अब स्टिंग इतने होते हैं क्योंकि मोबाइल है…………. पहले कैसेट सी डी से गाने सुनतेथे साथ बैठकर रेडियो भी सुनते थे […] Read more » क्योंकि मोबाइल है...
कविता साहित्य सोने नहीं देते…… June 15, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment कभी कभी कुछ शब्द, सोने नहीं देते…… जब तक उन्हे किसी कविता का आकार न दे दूँ। कभी कभी कोई धुन, सोने नहीं देती….. जब तक उसमे शब्द पिरोकर, गीत का कोई रूप न दे दूँ। कभी कभी कोई विचार सोने नहीं देते….. जब तक विचारों को संजोकर आलेख का आकार न […] Read more » sleeplessness कुछ शब्द सोने नहीं देते
व्यंग्य साहित्य यह आंदोलन , वह आंदोलन ….!! June 13, 2017 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment बेशक अपराधी के गांव वाले या परिजनों के लिए यह मामूली बात थी। क्योंकि उसका जेल आना – जाना लगा रहता था। अपराधी को जीप में बिठाने के दौरान परिजनों ने पुलिस वालों से कहा भी कि ले तो जा रहे हैं ... लेकिन ऐसी व्यवस्था कीजिएगा कि बंदे को आसानी से जमानत मिल जाए। पुलिस ने केस फारवर्ड किया तो अदालत ने उसकी जमानत याचिका नामंजूर करते हुए आरोपी को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। बस फिर क्या था। आरोपी के गांव में कोहराम मच गया। लोगों ने पास स्थित राष्ट्रीय राजमार्ग पर पथावरोध कर ट्रैफिक जाम कर दिया। सूचना पर पुलिस पहुंची तो उन्हें दौड़ा – दौड़ा कर पीटा। Read more » Featured आंदोलन
कविता साहित्य आदमी June 13, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment हज़ारों की भीड़ में भी, अकेला है आदमी! आदमी ही आदमी को, नहीं मानता आदमी! संवेदनायें खो गईं, चोरी क़त्ल बढ़ गये, कोई भी दुष्कर्म करते, डरता नहीं अब आदमी। भगवान ऊपर बैठकर ये सोचता होगा कभी, ऐसा नहीं बनाया था मैने क्या बन गया है आदमी! स्वार्थ की इंतहा हुई , भूल गया दोस्ती […] Read more » आदमी
कविता तोहफे June 13, 2017 / June 13, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment मै नहीं कोई ताल तलैया ना ही मैं सागर हूँ। मीठे पानी की झील भी नहीं, मैं बहती सरिता हूँ। सरल नहीं रास्ते मेरे चट्टनों को काटा है। ऊपर से नीचे आने.में झरने कई बनाये मैने इन झरनों के गिरने पर प्रकृति भी मुस्काई है पर मेरी इक इक बूँद ने यहाँ हर पल चोट […] Read more » तोहफे
दोहे साहित्य जो छा रहा वह जा रहा ! June 12, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment जो छा रहा वह जा रहा ! जो छा रहा वह जा रहा, ना संस्कार बना रहा; प्रारब्ध है कुछ ढा रहा, ना लोभ पैदा कर रहा ! मन मोह से हो कर विलग, लग संग मन-मोहन सजग; नि:संग में सब पा रहा, वह हो असंग घुला मिला ! खिल खिला कर है वह खुला, […] Read more »
लेख साहित्य बटेश्वर के मंदिरों का खतरों से भरा जीर्णोद्धार कार्य June 12, 2017 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment चम्बल की घाटी में लगभग 10 एकड़ जगह में बने इन मंदिरों के बारे में जब पता चला कि एक मुस्लिम अधिकारी डॉ के. के. मुहम्मद ने इनके जीर्णोद्धार करने का बीड़ा उठाया है तो सबको बहुत ही आश्चर्य हुआ। उस समय मुश्किल यह थी कि वहां आसपास चम्बल के डकैतों का डर व्याप्त था। इसलिए न तो कोई अधिकारी आगे बढ़ रहा था और न काम करने वाले मजदूर। Read more » बटेश्वर