व्यंग्य साहित्य अथ श्री आलोचक कथा May 24, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment वे आलोचक है, अभी से नहीं, तभी से, मतलब जब से उनके धरती पर अवतरित होने की दुर्घटना हुई थी तब से। यहाँ तक की उन्होंने अपने अवतरित होने की भी आलोचना कर दी थी। वो आलोचना खाते, पीते, ओढ़ते और बिछाते है। उनकी रग- रग में आलोचना समाई हुई है। वो कर्मयोगी भी है, […] Read more » Featured अथ श्री आलोचक कथा
कहानी कलयुग के देवता May 24, 2017 / May 24, 2017 by मालचन्द कन्नौजिया 'बेपनाह' | Leave a Comment कहने को आजाद हो गये हम पर मिली आजादी किस बात की जब बिना रिश्वतखोरी के आती नहीं है साँसभी। घर से निकलते होती है मुलाकात रिश्वतखोर दलालों से येहैं कलयुग के देवता पाला न पड़े गद्दारों से।। कैसे छुपायें, पचती नहीं गैस बनती है बात भी बिना रिशवतखोरी के आती नहीं है साँसभी।। करप्सन,करप्शन, […] Read more »
दोहे साहित्य तुम चलत सहमित संस्फुरत ! May 16, 2017 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment उड़िकें गगन आए धरणि, बहु वेग कौ करिकें शमन; वरिकें नमन भास्वर नयन, ज्यों यान उतरत पट्टियन ! बचिकें विमानन जिमि विचरि, गतिरोध कौ अवरोध तरि; आत्मा चलत झाँकत जगत, मन सहज करि लखि क्षुद्र गति ! Read more » तुम चलत सहमित संस्फुरत !
कविता साहित्य मेरा एकालाप May 15, 2017 by आशुतोष माधव | Leave a Comment बोल उठी तब त्रिपुरसुंदरी तू डूबे क्यों,क्यों पार तरे? तेरे समस्त गान, रुदन औ' हास ऊँ नमो मणिपद्मे हुं का पाठ तेरा प्रचलन मेरी प्रदक्षिणा तेरा कुछ भी मेरा सबकुछ ओ मेरे प्यारे अबोध शिशु गोद भरे,तू मुझमें नित-नूतन मोद भरे। Read more » Featured चन्द्रमा देवदारु हिमालय
कविता साहित्य रेलवे स्टेशन पर: बारिश की एक शाम May 15, 2017 by आशुतोष माधव | Leave a Comment आशुतोष माधव भीग-भीग कर सड़ता एक पीला उदास स्टेशन. जर्जर सराय सा, हाँफ-हाँफकर पहुँचते जाने कितने कलावंत गर्जन तर्जन लोहित देह; कुछ श्रीमंत केवल छूकर कर जाते छि:, चलन ऐसा मानो मैनाक को धन्य कर रहे हों हनुमान. यह प्रौढ़ा चिर-सधवा पीली देह उदास तार तार उतारती रहती पार-पार नाविक तरणी पतवार मँझधार शहरी गँवार […] Read more » बारिश की एक शाम
व्यंग्य साहित्य नयेपन की डिमांड और अलग तरह की राजनीती May 13, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment आम आदमी के नाम पर बनी पार्टी ने मतदाता के एंटरटेनमेंट का पूरा ख्याल रखा है । आम आदमी पार्टी ("आप") ने लोकतंत्र की नीरसता को ना केवल दूर करने का काम किया है बल्कि दूरदर्शी राजनैतिक मूल्यों की स्थापना करने में भी महती भूमिका निभाई है। आप पर कोई भ्रष्टाचार का आरोप लगाए उससे पहले ही आप सबको भ्रष्टाचारी घोषित कर स्वयं को ईमानदारी का एकमात्र मसीहा घोषित कर दो। इससे ना तो आप की ईमानदारी साबित होती है और ना ही दूसरे की बेईमानी लेकिन टाइमपास अच्छा हो जाता है और मुँह बाए खड़ी सैंकड़ो समस्याओ के बावजूद सबका मूड फ्रेश रहता है। Read more » Featured नयेपन की डिमांड
कहानी चश्मा May 13, 2017 by देवेश शास्त्री | Leave a Comment देवेश शास्त्री ………. उन्हें नीति-नेम, धर्म-कर्म से कोई मतलब नहीं था। उसकी स्वाभाविक वृत्ति राजनैतिक रूप से ऐन-केन प्रकारेण अपना उल्लू सीधा करने यानी कमाऊ जुगाड़ भिड़ाने की रही है। कई बार चुनाव भी लड़ा और हारते रहे, उनका नजरिया चुनाव जीतने की बजाय आलाकमान से मिलने वाले चुनावी खर्चे को हड़पने और क्षेत्रीय रसूख […] Read more » ‘‘चश्मा’’
व्यंग्य साहित्य दूर के रसगुल्ले , पास के गुलगुले …!! May 12, 2017 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा इसे जनसाधारण की बदनसीबी कहें या निराशावाद कि खबरों की आंधी में उड़ने वाले सूचनाओं के जो तिनके दूर से उन्हें रसगुल्ले जैसे प्रतीत होते हैं, वहीं नजदीक आने पर गुलगुले सा बेस्वाद हो जाते हैं। मैगों मैन के पास खुश होने के हजार बहाने हो सकते हैं, लेकिन मुश्किल यह कि […] Read more » दूर के रसगुल्ले
लेख साहित्य अपदीपो भव …………. May 11, 2017 by वीरेंदर परिहार | Leave a Comment भगवान बुद्ध ने कहा कि वही सुखी है जो जय-पराजय की भावना का त्याग करता है। वजह यह कि जय की भावना से बैर उत्पन्न होता है, पराजय से दुःख उत्पन्न होता है। उनका मानना था - अक्रोध के द्वारा क्रोध को, साधुता के द्वारा असाधु भाव को, दान के द्वारा कदर्प और सत्य के द्वारा मृषावाद या झूंठ को जीतना चाहिए। उनके अनुसार जिसका किसी से बैर नही है और जो सभी प्राणियों से मैत्री करता है वही सुखी होता है। Read more » बुद्ध पूर्णिमा
लेख साहित्य आदि पत्रकार देवर्षि नारद May 11, 2017 by मृत्युंजय दीक्षित | Leave a Comment 12 मई पर विशेष:- मृत्युंजय दीक्षित सृष्टिकर्ता प्रजापति ब्रहमा के मापस पुत्र पारद। महान तपस्वी तेजस्वी सम्पूर्ण वेदान्त शास़्त्र के ज्ञाता तथा समस्त विद्वाओं में पारंगत नारद। ब्रहमतेज से संपन्न हैं। नारद जी क महान कृतित्व व व्यक्तित्व पर जितनी भी उपमाएं लिखी जायें बेहद कम हैं। देवर्षि नारद ने अपने धर्मबल से परमात्मा का […] Read more » Featured आदि पत्रकार देवर्षि नारद देवर्षि नारद
लेख साहित्य 1857 की क्रान्ति का नायक धनसिंह गुर्जर कोतवाल May 10, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment कोतवाल धनसिंह ने इन आजादी के दीवानों की सेना का रामराम करके स्वागत किया और उनसे पूछा कि क्या चाहते हो? उसने अपनी ओर से लोगों से कहा कि-'मारो फिरंगी को और देश को आजाद कराओ।' हनुमान की जय बोलकर इन सिरफिरे देशभक्तों की सेना कोतवाल धनसिंह के घोड़े के पीछे-2 चल दी, वह पुलिस जो इनके विशाल दल को रोकने के लिए तैनात थी, वह भी अपने कोतवाल के पीछे पीछे चल पड़ी। इन्होंने पहला धावा मेरठ की नई जेल पर बोल दिया। इन्होंने जेल से 839 कैदियों को मुक्त कराया और वे भी मुक्त होकर स्वतंत्रता सेनानियों के इस दल के साथ मिल गए और अंग्रेेजों की मेरठ जेल तोड़ दी । वहां से यह भीड़ मेरठ शहर और सिविल लाइन में घुस गई और अंग्रेज अधिकारियों के बंगलों को आग लगाना और उन्हें मारना शुरू कर दिया। Read more » 1857 की क्रान्ति का नायक Featured धनसिंह गुर्जर धनसिंह गुर्जर कोतवाल
लेख साहित्य माहिष्मती के समृद्ध इतिहास को कौन नहीं बूझना चाहता May 8, 2017 by अलकनंदा सिंह | Leave a Comment उस समय मुस्लिम थे ही कहां? और जब मुस्लिम थे ही नहीं तो फिल्म में मुस्लिम किरदार कैसे घुसाया जाता? घुसा भी दिया जाता तो शायद वामपंथी इस बात पर सिर पीटते कि मुस्लिमों को बदनाम करने के लिए इतिहास से छेड़छाड़ की गई है क्योंकि मुस्लिम शासकों का किरदार प्रशंसा के योग्य सिर्फ अपवाद स्वरूप ही मिलता है। Read more » Featured माहिष्मती माहिष्मती के समृद्ध इतिहास