व्यंग्य व्यंग : आप हमारे लीडर नही हो …! June 3, 2017 by अनुज हनुमत | Leave a Comment पहले दिल्ली और लखनऊ में टिकट के लिए हाथ फैलाते हैं फिर जनता के पास आकर वोट के लिए । अगर आपकी दिल्ली -लखनऊ में बात नही बनी तो वहीं विचारों में मतभेद बताकर आप दूसरी पार्टी में भी छलांग लगाकर कूदने से बाज नही आते हो । अगर पिछले 5 साल अच्छे से मन […] Read more » लीडर
दोहे साहित्य चलि दिए विराट विश्व ! June 3, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment चलि दिए विराट विश्व, लै कें फुरकैंया; ध्यान रह्यौ निज सृष्टा, नैनन लखि पैयाँ ! पैंजनियाँ बजति रहीं, देखत है मात रही; प्रकृति ललचात रही, झाँकन रुचि आत रही ! सँभलावत गात चलत, मोहन मन कछु सोचत; अँखियन ते जग निरखत, पगडंडिन वे धावत ! पीले से वस्त्र पहन, गावत तुतलात रहत; दौड़त कबहू ठहरत, […] Read more » चलि दिए विराट विश्व !
कविता लपक लिए आम June 3, 2017 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment प्रभुदयाल श्रीवास्तव लपकी ने लपक लिए, थैले से आम। अम्मा से बोली है, आठ आम लूँगी मैं। भैया को दीदी को, एक नहीं दूँगी मैं। जो भी हो फिर चाहे, इसका अंजाम। न जाने किसने कल ,बीस आम खाये थे। अम्मा ने दिन में जो, फ्रिज में रखवाए थे। शक के घेरे में था, मेरा […] Read more » लपक लिए आम
व्यंग्य बकरी हों तो वही… May 31, 2017 by विजय कुमार | 1 Comment on बकरी हों तो वही… हमारे प्रिय शर्मा जी पिछले दिनों किसी विवाह के सिलसिले में मध्य प्रदेश गये थे। परसों वे लौटे, तो मैं उनसे मिलने चला गया। चाय पीते और शादी की मिठाई खाते हुए शर्मा जी ने म.प्र. का एक अखबार मुझे देकर कहा – लो वर्मा, इसे पढ़ो..। – शर्मा जी, कहां ताजी चाय और कहां […] Read more » Featured मुनव्वर सलीम मुनव्वर सलीम की 23 बकरियां
पुस्तक समीक्षा आत्ममंथन से व्यंग्यमंथन तक May 27, 2017 by एम्.एम्.चंद्रा | Leave a Comment समीक्षक : एम. एम. चन्द्रा वरिष्ठ व्यंग्यकार हरीश नवल की पुस्तक “कुछ व्यंग्य की कुछ व्यंग्यकारों की ” जब मेरे हाथों में उन्होंने सौंपी, तो कुछ समय के लिए तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ. बस दो पल का आत्मीय मिलन सदियों पुराना बन गया. यह पुस्तक आत्म मंथन से व्यंग्य मंथन तक का सफ़र […] Read more » आत्ममंथन से व्यंग्यमंथन तक कुछ व्यंग्य की कुछ व्यंग्यकारों की
व्यंग्य साहित्य खबरों के खजाने का सूखाग्रस्त क्षेत्र …!! May 27, 2017 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा ब्रेकिंग न्यूज… बड़ी खबर…। चैनलों पर इस तरह की झिलमिलाहट होते ही पता नहीं क्यों मेरे जेहन में कुछ खास परिघटनाएं ही उमड़ने – घुमड़ने लगती है। मुझे लगता है यह ब्रेकिंग न्यूज देश की राजधानी दिल्ली के कुछ राजनेताओं के आपसी विवाद से जुड़ा हो सकता है या फिर किसी मशहूर […] Read more » सूखाग्रस्त क्षेत्र
दोहे साहित्य माखन चखत मोहन रहत ! May 26, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment माखन चखत मोहन रहत, गोपिन के मन गोपन रमत; Read more » माखन चखत मोहन रहत
लेख साहित्य महाकवि रंगपालजी की लोक रचनाएं May 25, 2017 / May 25, 2017 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment डा. राधेश्याम द्विवेदी (स्रोत : डा. मुनिलाल उपाध्याय कृत “बस्ती जनपद के छन्दकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1) रंगपाल नाम से विख्यात महाकवि रंग नारायण पाल जूदेश वीरेश पाल का जन्म सन्तकबीर नगर (उत्तर प्रदेश) के नगर पंचायत हरिहरपुर में फागुन कृष्ण 10 संवत 1921 विक्रमी को हुआ था। ‘बस्ती जनपद के छन्दकारों का सहित्यिक […] Read more » महाकवि रंगपालजी
लेख साहित्य 1857 की क्रांति की 160वीं जयंती May 25, 2017 / May 25, 2017 by डॉ शैलेन्द्र कुमार | Leave a Comment कई इतिहासकारों ने यह भी कहा है कि इस युद्ध में पूरा देश शामिल नहीं था। इसलिए इसे राष्ट्रीय युद्ध की संज्ञा देना अनुचित होगा। तो प्रश्न उठता है कि किसी स्थान विशेष में किया गया युद्ध राष्ट्रीय क्यों नहीं हो सकता। इस पर यदि गहराई से विचार करें तो बीसवीं शताब्दी के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी ऐसे अनेक आंदोलन हुए जो किसी स्थान विशेष तक ही सीमित रह गए। यहां तक कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की तीव्रता भी सारे देश में एक समान नहीं थी। Read more » 1857 की क्रांति Featured the revolution of 1857
कविता साहित्य वीरवार बाज़ार May 25, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment महानगरों में भी लगता है, हफ्ते का हाट, मौलों की चकाचौंध और एयर कंडीशन्ड बड़े बडे शो रूमों नये से नये रैस्टोरैंट के बीच ज़िन्दा है अभी भी हफ्ते का हाट! हमारा वीर बाजार! यहाँ सब कुछ मिलता है…. सब्ज़ी फल के लियें लोग यहाँ आते है बड़ी बड़ी गाड़ियों वाले भी भर के ले […] Read more » वीरवार बाज़ार
कविता बाल्कनी May 25, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment महानगरों में, ऊँची उँची इमारते, यहाँ कोई पिछवाड़ा नहीं, ना कोई सामने का दरवाज़ा, इमारत के चारों तरफ़ , बाल्कनी का नज़ारा, धुले हुए कपड़े……… बाल्कनी में लहराते सूखते, कभी झाड़न पोछन सूखते, कभी कालीन या रजाई को धूप मिलती, घर के फालतू सामान को पनाह देती है ये बाल्कनी, घर का अहम हिस्सा है […] Read more » बाल्कनी
व्यंग्य साहित्य चोरी और डकैती का लाइसेंस May 24, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment सच कहूं, मैं कपिल सिब्बल से बहुत प्रभावित हूं। यद्यपि मेरी उनसे आज तक भेंट नहीं हुई। भगवान न करे कभी हो। चूंकि वकील, डॉक्टर और थाने के चक्कर में एक बार फंसे, तो जिंदगी भले ही छूट जाए, पर ये पिंड नहीं छोड़ते। हमारे प्रिय शर्मा जी ने जवानी में डेढ़ साल कानून की […] Read more » कपिल सिब्बल