व्यंग्य साहित्य मुख्य अतिथि बनने का सुख October 21, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment मेहता जी एक सम्मानित व्यक्तित्व है जिसका एक मात्र उपयोग वे मुख्य अतिथि बनने में करते है। यह अनुमान लगाना कठिन है कि वे पहले से सम्मानित थे या फिर विभिन्न समारोह में मुख्य अतिथि बनने के बाद वे सम्मान-गति को प्राप्त हुए है। मेहता जी तन मन और आदतन मुख्य अतिथि है। मुख्य […] Read more » मुख्य अतिथि
कविता साहित्य चलो, दिवाली आज मनाएं October 20, 2017 by बलवन्त | Leave a Comment हर आँगन में उजियारा हो तिमिर मिटे संसार का। चलो, दिवाली आज मनाएं दीया जलाकर प्यार का। सपने हो मन में अनंत के हो अनंत की अभिलाषा। मन अनंत का ही भूखा हो मन अनंत का हो प्यासा। कोई भी उपयोग नहीं सूने वीणा के तार का । चलो, दिवाली आज मनाएं दीया जलाकर प्यार का। इन दीयों से दूर न […] Read more » दिवाली
व्यंग्य वाह ताज October 20, 2017 by एल. आर गान्धी | Leave a Comment वाह ताज ….. एक शहंशाह का श्वान प्रेम ! …. ताज पर तकरार जारी। .. इक शहंशाह ने बनवा के हसीन ताज महल हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक ….. प्यार की निशानी ! ….. कैसा प्यार ! …… जिसे पाने के लिए , उसके शौहर को क़त्ल करवाया ? फिर जा के […] Read more » ताज
कविता ‘वेबलेंथ’ का खेल October 15, 2017 by अलकनंदा सिंह | Leave a Comment भावों के विशाल पर्वत पर, उगती खिलती आकाश बेल चढ़ती- कुछ हकीकतें और कुछ आस्था, का मेल होती है मित्रता। तय परिधियों के अरण्य में ब्रह्म कमल सी एक बार खिलती मन-सुगंध को अपनी नाभि में समेटने का खेल होती है मित्रता। स्त्री- पुरुष, पुरुष -स्त्री, स्त्री-स्त्री, पुरुष- पुरुष, के सारे विभेद नापती, अविश्वास से […] Read more » Featured वेबलेंथ
कविता साहित्य जब नींद नहीं आँखों में October 13, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment बेवजह रात को जब भी मुझे नींद नहीं आती है करवटें बदल बदल कर रात गुज़र जाती है। चादर की हर सिलवट तब, कोई कहानी अपनी, यों ही कह जाती है। जब घर में आँगन होता था और नींद नहीं आती थी चँदा से बाते होती थीं, तारों को गिनने में वो रात गुज़र जाती थी। हल्की सी बयार का झोंका जब तन को छूकर जाता था, उसकी हल्की सी थपकी, नींद बुला लाती थी। अब बंद कमरों मे जब नींद नहीं आँखों में यादों के झरोखे से अब रात के तीसरे पहर में नींद के बादल आते हैं जो मुझे सुला जाते हैं। Read more » जब नींद नहीं आँखों में
कहानी साहित्य नींद नैन में बस जाती है October 13, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment नींद हमे जब ना आती है चलती घड़ी रुक सी जाती है। कलम उठाकर लिखना चाहूँ भूली बीसरी याद आती है। कलम जब कभी रुक जाती है नींद कंहा फिर तब आती है। कोई कहानी मुकम्मल होकर जब काग़ज पे उतर आती है, नींद नैन में बस जाती है। शब्द कभी कहीं खो जाते हैं भाव रुलाने लग जाते हैं किसी पुराने गाने की लय पर कोई कविता जब बन जाती है। नींद हमें फिर आ जाती है। राह में जब रोड़े आते है, चलते चलते थक जाते हैं पैरों में छाले पड़ जाते ऐसे सपने हमें आते है, कोई नई कहानी तब सपनो में ही गढ़ी जाती है, नींद चौंक कर खुल जाती है। Read more » नींद नैन में बस जाती है
व्यंग्य हम काम से नहीं डरते October 11, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment शर्मा जी बहुत दुखी हैं। बेटे का विवाह सिर पर है और मोहल्ले की सड़क है कि ठीक ही नहीं हो रही। छह महीने पहले पानी की लाइन टूट गयी। सारा पानी सड़क पर बहने लगा। भीषण गरमी के मौसम में पूरे मोहल्ले में तीन दिन तक हाहाकार मचा रहा। छुट्टियों के कारण अधिकांश लोगों […] Read more » Featured काम काम से नहीं डरते
कहानी साहित्य काट औ छाँट जो रही जग में ! October 10, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment काट औ छाँट जो रही जग में, दाग बेदाग़ जो रहे मग में; बढ़ा सौन्दर्य वे रहे प्रकृति, रचे ब्रह्माण्ड गति औ व्याप्ति ! कष्ट पत्ती सही तो रंग बदली, लालिमा ले के लगी वह गहमी; गही महिमा ललाट लौ लहकी, किसी ने माधुरी वहाँ देखी ! सेब जो जंगलों में सेवा किये, […] Read more » काट औ छाँट
कविता साहित्य यान ही यान हैं यहाँ रमते ! October 8, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment यान ही यान हैं यहाँ रमते ! शिकागो के गगन से यान ही यान हैं यहाँ रमते, तरा ऊपर तलों में वे उड़ते; धरणि नीचे वे देख हैं लेते, साये आकाश के वे छू लेते ! कोई आते कोई चले जाते, पट्टियों पर कोई उतर चलते; कोई उन पट्टियों से उड़ जाते, उड़ते […] Read more » शिकागो के गगन से
कविता साहित्य कभी कुछ भी नज़र नहीं आए ! October 8, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment कभी कुछ भी नज़र नहीं आए ! शिकागो के गगन से कभी कुछ भी नज़र नहीं आए, धुँधलका आसमान में छा जाए; श्वेत बादल बिछे से नभ पाएँ, व्योम में धूप सी नज़र आए ! ज्योति सम-रस सी रमी मन भाये, मेघ लीला किए यों भरमाएँ; धरा से देख यह कहाँ पायें, रुचिर […] Read more » कभी कुछ भी नज़र नहीं आए !
कहानी साहित्य पारिजात के फूल October 7, 2017 / October 7, 2017 by विजय कुमार सप्पाती | 1 Comment on पारिजात के फूल भाग 1 – 1982 वह सर्दियों के दिन थे. मैं अपनी फैक्टरी से नाईट शिफ्ट करके बाहर निकला और पार्किंग से अपनी साइकिल उठाकर घर की ओर चल पड़ा. सुबह के 8:00 बज रहे थे. मैं अपने घर के सामने से गुजरा. मां दरवाजे पर खड़ी थी, मैंने मां को बोला ‘मां नहाने का पानी […] Read more » Featured पारिजात
व्यंग्य साहित्य गुरुगिरी मिटती नहीं हमारी October 7, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment हमारा देश हमेशा से ज्ञान का उपासक रहा है और इस पर कभी किसी को कोई शक नहीं रहा है। ज्ञान के मामले में हम शुरू से उदार रहे है,केवल बाँटने में यकीन रखते है। ज्ञान की आउटगोइंग कॉल्स को हमने सदा बैलेंस और रोमिंग के बंधनो से मुक्त रखा है। हमने विश्व को शून्य […] Read more » Featured गुरुगिरी