लेख विविधा साहित्य महाराणा प्रतापसिंह का पवित्र स्मारक स्थल है कुम्भलगढ़ August 1, 2016 / August 1, 2016 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य महाराणा का व्यक्तित्व चित्रण महाराणा प्रताप भारतीय स्वातंत्रय समर के इतिहास के एक दैदीप्यमान नक्षत्र हैं। प्रताप एक ऐसा नाम है जिसको सुनकर हर व्यक्ति संसार के ताप-संताप, प्रलाप और विलाप छोडक़र केवल प्रताप से भर जाना चाहता है, एक ऐसा नाम जो राष्ट्र का ‘प्रताप’ भी है और ‘सिंह’ भी है। […] Read more » Featured Kumbhalgarh Maharana Pratap Singh कुम्भलगढ़ पवित्र स्मारक स्थल कुम्भलगढ़ महाराणा प्रतापसिंह
व्यंग्य साहित्य बिना जूते ओलम्पिक पदक July 30, 2016 / July 30, 2016 by एम्.एम्.चंद्रा | 1 Comment on बिना जूते ओलम्पिक पदक एक फिल्मी गाना शादी-विवाह में आज तक चलाया जाता है “जूते दे दो पैसे ले लो” लगता था यह जूते वाला खेल बस घर तक ही सीमित है, लेकिन जब एक फिल्म आयी “भाग मिल्खा भाग” तो यह जूता घर से बहार निकल कर खेल के मैदान तक पहुँच गया. उसे देख कर लगता था […] Read more » बिना जूते ओलम्पिक पदक
व्यंग्य साहित्य प्रेमचंद की जरूरत थी July 30, 2016 by अशोक गौतम | 1 Comment on प्रेमचंद की जरूरत थी अधराता हो चुका था। पर आखों से नींद वैसे ही गायब थी जैसे यूपी में चुनाव के चलते हर नेताई आंख से नींद गायब है। जैसे तैसे सोने का नाटक कर सोने ही लगा था कि फोन आया तो चैंका। किसका फोन होगा? किसी दोस्त को कहीं कुछ हो तो नहीं गया होगा? ये दोस्त […] Read more » Featured प्रेमचंद प्रेमचंद की जरूरत
कविता साहित्य कौन…… July 28, 2016 / July 30, 2016 by आकाश कुमार राय | Leave a Comment चुप-चाप खड़े हैं हम दोनों, सवाल यही कि बोले कौन ? बीच हमारे घोर खामोशी, चुप्पी के कान मरोड़े कौन ? सर-सर बह रही हवाएं, कानों से मफलर खोले कौन ? शब्द फंसे सब मुख के अंदर, सन्नाटे को तोड़े कौन ? कटुता इतनी भरी है हममें, मिसरी सी बातें घोले कौन ? लाख मानू […] Read more » कौन
व्यंग्य साहित्य बाबा, उनकी नींद भली July 28, 2016 by विजय कुमार | Leave a Comment लोकजीवन में कहावतों का बड़ा महत्व है। ये होती तो छोटी हैं, पर उनमें बहुत गहरा अर्थ छिपा होता है। ‘‘जो सोता है, वो खोता है’’ और ‘‘जो जागे सो पावे’’ ऐसी ही कहावते हैं। लेकिन एक भाषा की कहावत दूसरी भाषा में कई बार अर्थ का अनर्थ भी कर देती है। एक हिन्दीभाषी संत […] Read more » उनकी नींद भली बाबा
कहानी साहित्य शीला दादी की बंद दुकान July 27, 2016 by विजय कुमार | 1 Comment on शीला दादी की बंद दुकान हिन्दी में कुछ शब्दों का प्रयोग प्रायः साथ-साथ होता है। जैसे दिन और रात, सुबह और शाम, सूरज और चांद, बच्चे और बूढ़े, जवानी और बुढ़ापा, धरती और आकाश… आदि। प्रायः ये शब्द एक-दूसरे के विलोम होते हैं। लिखते या बोलते समय अपनी बात का वजन या सुंदरता बढ़ाने के लिए इनका प्रयोग होता है। […] Read more » शीला शीला दादी की बंद दुकान
कविता साहित्य तन्हाई July 27, 2016 by चारु शिखा | Leave a Comment तन्हाई छोड़ देती हूँ सिलवटे अब ठीक नहीं करती, मन सुकून चाहता , जो शायद मिल पाना मुश्किल, मुस्कान भी झूठी लगती, अच्छी थी कच्ची मिट्टी की मुस्कान, वक्त के साथ, सोच बदल गयीं। पर हकीकत कुछ और हैं. सहारा नहीं साथ की दरकार हैं, अब उसकी भी नहीं आस है, ढूंढती नजरें पर सब […] Read more » तन्हाई
व्यंग्य साहित्य आया सावन जल -भुन के July 25, 2016 by अशोक गौतम | Leave a Comment लीजिए साहब! जिस बेदर्दी सावन का फरवरी से ही सरकार को इंतजार था आखिर वह आ ही गया। जल -भुन के ही सही। सावन हद से अधिक झूमता- लड़खड़ाता जनता के सामने अपने को पेश करे अतैव सरकार ने उसको लड़खड़ाते हुए आने के लिए रास्ते में ही गच्च कर दिया है। हर दो कोस […] Read more » Featured आया सावन जल -भुन के सावन
दोहे साहित्य प्रभु प्रभाव प्रति जीव सुहाई ! July 24, 2016 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment प्रभु प्रभाव प्रति जीव सुहाई; देश काल एकहि लग पाई ! पृथ्वी एक, देश सब अापन; विश्व बसहि, मानस उर अन्तर ! भेद प्रकट मन ही ते होबत; भाव सबल आत्मा संचारत ! बृह्म भाव आबत जब सुलझत; खुलत जात ग्रंथिन के घूँघट ! चक्र सुदर्शन-चक्र चलाबत; आहत होत द्वैत मति भागत ! नेह सनेह […] Read more » प्रभु प्रभाव प्रति जीव सुहाई !
व्यंग्य साहित्य राजनेता या पॉलिटिकल सेल्समैन…!! July 24, 2016 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा सचमुच मैं अवाक था। क्योंकि मंच पर अप्रत्याशित रूप से उन महानुभाव का अवतरण हुआ जो कुछ समय से परिदृश्य से गायब थे। श्रीमान कोई पेशेवर राजनेता तो नहीं लेकिन अपने क्षेत्र के एक स्थापित शख्सियत हैं। ताकतवर राजनेता की बदौलत एक बार उन्हें माननीय बनने का मौका भी मिल चुका है […] Read more » political salesman politicians पॉलिटिकल सेल्समैन राजनेता
पुस्तक समीक्षा साहित्य शिकारी का अधिकार – (व्यंग्य संग्रह) आरिफा एविस July 22, 2016 by बी एन गोयल | 3 Comments on शिकारी का अधिकार – (व्यंग्य संग्रह) आरिफा एविस समीक्षा – बी एन गोयल एक प्रसिद्ध दोहा है – शब्द सम्हारे बोलिए शब्द के हाथ न पांव एक शब्द करे औषधि एक शब्द करे घाव , इस दोहे में एक सलाह दी गयी है कि जब भी कुछ बोलो नाप तोल कर बोलो. सोच समझ कर बोलो. यह सलाह यद्यपि सब के लिए हैं […] Read more » शिकारी का अधिकार
आलोचना साहित्य गांधी पर राहुल की महापंडिताई! July 22, 2016 by डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Leave a Comment नेहरु राजवंश के युवराज राहुल गांधी अपने ही शब्द-जाल में फंस गए हैं। मार्च 2014 में देश को चुनाव का बुखार चढ़ा हुआ था। महाराष्ट्र की एक सभा में उन्होंने एक जुमला दे मारा। उन्हें यह बुरा लगा कि नरेंद्र मोदी-जैसा आदमी अपनी सभाओं में गांधी और पटेल की दुहाई दे रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक […] Read more » गांधी राहुल गांधी की महापंडिताई