व्यंग्य साहित्य भूखे को भूख, खाए को खाजा…!! July 4, 2016 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा भूखे को भूख सहने की आदत धीरे – धीरे पड़ ही जाती है। वहीं पांत में बैठ जी भर कर जीमने के बाद स्वादिष्ट मिठाइयों का अपना ही मजा है। शायद सरकारें कुछ ऐसा ही सोचती है। इसीलिए तेल वाले सिरों पर और ज्यादा तेल चुपड़ते जाने का सिलसिला लगातार चलता ही […] Read more » खाए को खाजा भूख भूखे को भूख
लेख साहित्य दक्खिन का दर्द July 2, 2016 by संजय चाणक्य | Leave a Comment संजय चाणक्य ‘‘ तेरा मिजाज तो अनपढ़ के हाथों का खत है! नजर तो आता है मतलब कहां निकलता है!!’’ मेरी नानी बचपन में कहती थी कि दक्खिन की ओर मुह करके खाना मत खाओं,दक्खिन की ओर पांव करके मत सोओं। गांव में बड़े-बुजुर्ग कहते थे कि गांव के दक्खिन टोला में मत जाना। हमेशा […] Read more » दक्खिन का दर्द
लेख शख्सियत साहित्य नागार्जुन की कविता का भावबोध July 1, 2016 by शैलेन्द्र चौहान | Leave a Comment शैलेन्द्र चौहान बाबा नागार्जुन को भावबोध और कविता के मिज़ाज के स्तर पर सबसे अधिक निराला और कबीर के साथ जोड़कर देखा गया है। वैसे, यदि जरा और व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य-परंपरा ही जीवंत रूप में उपस्थित देखी जा सकती है। उनका कवि-व्यक्तित्व […] Read more » Featured Poet Nagarjun काव्य-संसार नागार्जुन नागार्जुन का संपूर्ण काव्य-संसार बाबा नागार्जुन
लेख साहित्य संपूर्ण भारत कभी गुलाम नही रहा Part 10 July 1, 2016 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment महाराणा का राजधर्म भी यही था यह था भारत का राजधर्म। महाराणा प्रताप इसी राजधर्म की रक्षार्थ अकबर से संघर्षरत रहे। हमारा राजधर्म व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता का उद्घोषक था। व्यक्ति के विचार-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उदघोषक था। अकबर राजधर्म की परिभाषा तक नही जानता था। ऐसे बादशाहों की बादशाहतें क्रूरता पर अवलंबित होती हैं। […] Read more » Featured Maharana Pratap अकबर अकबर इस्लामिक राजधर्म का संवाहक प्राचीन राजधर्म भारतीय राजधर्म महाराणा प्रताप भारत के राजधर्म के संवाहक महाराणा प्रतापसिंह हमारा प्राचीन राजधर्म
लेख साहित्य संपूर्ण भारत कभी गुलाम नही रहा Part 9 July 1, 2016 / July 1, 2016 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment कुछ आदर्शों को लेकर महाराणा करते रहे अकबर से युद्घ राकेश कुमार आर्य इतिहास के पन्नो से  भारत में राजधर्म की महत्ता भारत का क्षात्र धर्म अति व्यापक है। महाभारत ‘शांति-पर्व’ (63 : 29) में कहा गया है :- सर्वेत्यागा राजधर्मेषु दृष्टा:। सर्वादीक्षा राजधर्मेषु योक्ता। सर्वाविद्या राजधर्मेषु युक्ता:। सर्वे लोका: राजधर्मेषु प्रविष्ठा। इसका अभिप्राय […] Read more » Featured Maharana Pratap अकबर प्राचीन राजधर्म हमारा प्राचीन राजधर्म
कहानी साहित्य पाप का बोझ June 30, 2016 / June 30, 2016 by विजय कुमार | Leave a Comment मुझे बालपन से ही अपना काम खुद करने की आदत रही है। इसका श्रेय मेरे पिताजी को है, जिन्होंने मुझे स्वावलम्बी बनने के लिए प्रेरित किया। वे कहते थे कि कोई भी काम छोटा नहीं होता। अपना काम खुद करने में शर्म कैसी ? वे अपने और बाबाजी के जूते खुद पालिश करते थे। […] Read more » पाप का बोझ
लेख साहित्य स्वदेश, स्वधर्म और स्वसंस्कृति का रक्षक सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य June 28, 2016 by राकेश कुमार आर्य | 3 Comments on स्वदेश, स्वधर्म और स्वसंस्कृति का रक्षक सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य किया गया हेमचंद्र विक्रमादित्य को इतिहास में उपेक्षित जिस समय अकबर कलानौर के दुर्ग में भारत में अपने पिता द्वारा विजित क्षेत्रों का राजा बनाया गया, उस समय आगरा पर सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य (1501-1556 ई.) उपनाम हेमू का शासन था। मां भारती के जिन अमर हुतात्मा वीरों को इतिहास में उनके वीरतापूर्ण कृत्यों से खींझकर […] Read more » Featured Maharaja Hemchandra Vikramaditya सम्राट हेमचंद्र (हेमू) विक्रमादित्य हेमचंद्र विक्रमादित्य
लेख साहित्य संपूर्ण भारत कभी गुलाम नही रहा (Part – 8) June 27, 2016 / June 27, 2016 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment अकबर की महानता और भारतीय परंपरा में राजा के गुण राकेश कुमार आर्य भारत के विषय में बाबर के विचार भारत के विषय में बाबर ने लिखा है-‘‘हिन्दुस्थान में बहुत कम आकर्षण है। यहां के निवासी न तो रूपवान होते हैं, और न ही सामाजिक व्यवहार में कुशल होते हैं। ये न तो किसी से […] Read more » Featured अकबर का पालन पोषण अकबर का राज्यारोहण भारत के विषय में बाबर के विचार हुमायूं का पुत्र अकबर
व्यंग्य साहित्य हिंदीभाषी होने का दर्द June 27, 2016 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment भाषा वैसे तो संवाद का माध्यम मात्र है लेकिन हम चीज़ो को मल्टीपरपज बनाने में यकीन रखते है इसलिए हमारे देश में भाषा, संवाद के साथ साथ वाद -विवाद और स्टेटस सिंबल का भी माध्यम बन चुकी है। हमें बचपन में बताया गया की हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाए आपस में बहने है लेकिन सयाने […] Read more » Featured हिंदीभाषी हिंदीभाषी होने का दर्द
व्यंग्य साहित्य यह समाजसेवा, वह समाजसेवा…!! June 22, 2016 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा बचपन से मेरी बाबा भोलेनाथ के प्रति अगाध श्रद्धा व भक्ति रही है। बचपन से लेकर युवावस्था तक अनेक बार कंधे में कांवर लटका कर बाबा के धाम जल चढ़ाने भी गया। कांवर में जल भर कर बाबा के मंदिर तक जाने वाले रास्ते साधारणतः वीरान हुआ करते थे। इस सन्नाटे को […] Read more » समाजसेवा
लेख साहित्य संपूर्ण भारत कभी गुलाम नही रहा (Part 7) June 19, 2016 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment हम रहे हैं मोक्ष और लोक की स्वतंत्रता के सनातन साधक राकेश कुमार आर्य इतिहासकार कानूनगो का कथन इतिहासकार कानूनगो ने शेरशाह के विषय में लिखा है –“ऐतिहासिक दस्तावेजों की कमी के उपरांत जो कुछ सामग्री उपलब्ध है वह यह बात स्पष्ट कर देती है कि अकबर और उसके उत्तराधिकारियों के साम्राज्य जिन विचारों पर […] Read more » Featured भारत शेरशाह संपूर्ण भारत कभी गुलाम नही रहा : छल प्रपंचों की कथा
व्यंग्य साहित्य अमित्र सभा June 19, 2016 by विजय कुमार | Leave a Comment प्रसिद्ध होने की इच्छा अर्थात ‘लोकेषणा’ भी अजीब चीज है। इसके लिए लोग तरह-तरह के काम करते हैं, जिससे उनका नाम ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड’ में आ जाए। ये काम भले भी हो सकते हैं और बुरे भी। सीधे भी हो सकते हैं और उल्टे भी। जान लेने वाले भी हो सकते हैं और […] Read more » अमित्र सभा