लेख साहित्य हम होलिका की जय क्यों बोलते हैं ? March 24, 2016 by अनुज अग्रवाल | Leave a Comment होलिका दहन के समय पता नहीं क्यों हमारे यहाँ होलिका माता की जय बोली जाती है | लोग जलती हुई होली में जौ डालते जाते हैं और होली की परिक्रमा करते हुए उसकी जय बोलते हैं | एक राक्षसी जो भक्त प्रह्लाद को जीवित जलाने के लिए स्वयं आग में बैठी और हम उसकी जय […] Read more » holika maata ki jai why do we say holika mata ki jai हम होलिका की जय क्यों बोलते हैं ? होलिका की जय
व्यंग्य साहित्य तीसरे दर्जे के शुभचिंतक March 24, 2016 by अशोक गौतम | Leave a Comment मेरी किसी भी बात से आप भले ही सहमत हों या न, पर मेरी इस बात से तो आप भी हंडरड परसेंट सहमत होंगे कि पहली श्रेणी के शुभचिंतकों का मिलना आज की तारीख में वैसे ही कठिन है जैसे आप शताब्दी की करंट बुकिंग के लिए पांच बजे भी सीट मिलने की उम्मीद में […] Read more » third category of wellwisher तीसरे दर्जे के शुभचिंतक शुभचिंतक
लेख साहित्य दुनिया मेरे आगे लोहिया के कॉलेज में March 22, 2016 by उमेश चतुर्वेदी | Leave a Comment उमेश चतुर्वेदी बचपन में मानस में कुछ कोलॉज चस्पा हो जाते हैं..वे कोलॉज ताउम्र आपका पीछा नहीं छोड़ते..कोलकाता को लेकर बचपन से ही मेरे मन में खास तरह का रोमांस है..कहते हैं ना सपनों का शहर..तो कोलकाता मेरे लिए सपनों का ही शहर है..सपने हकीकत की पथरीली जमीन पर अक्सर झनाक से टूट जाते हैं। […] Read more » दुनिया मेरे आगे लोहिया के कॉलेज में
कविता साहित्य अब हम शिक्षक की बारी है March 19, 2016 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment कई दिनों के बाद आज यें स्वर्णीम अवसर आया है। बड़ी तपस्या करके हमने, शिक्षक रूप को पाया है।। मन में उठी तमन्ना है, पूरी कर ली तैयारी है। बहुत पढ़ाया लोगो ने, अब हम शिक्षक की बारी है।। विश्वविद्यायल की माटी में अब बीज शान के बोना है। कतर््ाव्यों से सींच के […] Read more » अब हम शिक्षक की बारी है
राजनीति व्यंग्य साहित्य एक पाती शत्रुघ्न सिन्हा के नाम March 18, 2016 by विपिन किशोर सिन्हा | 3 Comments on एक पाती शत्रुघ्न सिन्हा के नाम प्रिय शत्रु बचवा तक चच्चा के प्यार-दुलार पहुंचे। आगे यह बताना है कि भगवान के किरिपा से हम इहां राजी-खुशी हैं, और तोहरी राजी खुशी के वास्ते भगवान से आरजू-मिन्नत करते रहते हैं। बचवा, कई बार हम तोसे भेंट करे वास्ते पटना गए, तो मालूम भया कि तुम दिल्ली गए हो – संसद के काम-काज […] Read more » Featured letter in the name of shatrughan sinha शत्रुघ्न सिन्हा
व्यंग्य साहित्य माल्या प्रा… तुस्सी ग्रेट हो…!!! March 16, 2016 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा जन – धन योजना तब जनता से काफी दूर थी। बैंक से संबंध गिने – चुने लोगों का ही होता था। आलम यह कि नया एकाउंट खुलवाने के लिए सिफारिश की जरूरत पड़ती। किसी भी कार्य से बैंक जाना काफी तनाव भरा अनुभव साबित होता था। क्योंकि रकम जमा करानी हो या […] Read more » Featured Vijay Mallya माल्या प्रा
कविता साहित्य क्या मै लिख सकूँगा : पेड़ की संवेदनाओं को March 15, 2016 by प्रवक्ता ब्यूरो | 2 Comments on क्या मै लिख सकूँगा : पेड़ की संवेदनाओं को सुशील कुमार शर्मा कल एक पेड़ से मुलाकात हो गई। चलते चलते आँखों में कुछ बात हो गई। बोला पेड़ लिखते हो संवेदनाओं को। उकेरते हो रंग भरी भावनाओं को। क्या मेरी सूनी संवेदनाओं को छू सकोगे ? क्या मेरी कोरी भावनाओं को जी सकोगे ? मैंने कहा कोशिश करूँगा कि मैं तुम्हे पढ़ […] Read more » cutting of trees poem on cutting of trees poem on trees क्या मै लिख सकूँगा पेड़ की संवेदना
कहानी साहित्य हरम March 15, 2016 by अमित राजपूत | Leave a Comment अमित राजपूत कष्ट था उसे, जो उसको अंदर तक द्रवित कर रहा था। लेकिन उसके आंसुओं की भरी-मोटी बूंदों को देखकर लग रहा था कि ये कष्ट उसके द्वारा मजबूरी में किये गये किसी न्यौछावर के हैं। अजीब तो लग ही रहा था मुझे उसका इस तरह से झुंझलाकर ऑडीटोरियम से बाहर आना और आकर […] Read more » haram story on writer हरम
कविता साहित्य अभिशप्त March 15, 2016 / March 17, 2016 by डॉ. प्रतिभा सक्सेना | 3 Comments on अभिशप्त रात का था धुँधलका , सिर्फ़ तारों की छाँह । मैंने देखा – मन्दिर से निकल कर एक छायामूर्ति चली जा रही है विजन वन की ओर । आश्चर्यचकित मैंने पूछा, ” देवि ! आप कौन हैं ? रात्रि के इस सुनसान प्रहर में अकेली कहाँ जा रही हैं ? ” * वह चौंक गई, […] Read more » abhishapt poem by Dr. Pratibha saksena अभिशप्त अयोध्या अभिशप्त है
कविता साहित्य कबहू उझकि कबहू उलटि ! March 15, 2016 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment कबहू उझकि कबहू उलटि ! कबहू उझकि कबहू उलटि, ग्रीवा घुमा जग कूँ निरखि; रोकर विहँसि तुतला कभी, जिह्वा कछुक बोलन चही ! पहचानना आया अभी, है द्रष्टि अब जमने लगी; हर चित्र वह देखा किया, ग्रह घूम कर जाना किया ! लोरी सुने बतियाँ सुने, गुनगुनाने उर में लगे; कीर्तन भजन मन भावने, लागा […] Read more » poem by gopal baghel कबहू उझकि कबहू उलटि ! चहकित चकित चेतन चलत
लेख साहित्य स्वयंसेवक के वेश में परिवर्तन March 15, 2016 by विजय कुमार | Leave a Comment 11 से 13 मार्च, 2016 तक राजस्थान के नागौर नगर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिनिधि सभा का वार्षिक सम्मेलन सम्पन्न हुआ। संघ की सर्वाधिक अधिकार प्राप्त सभा होने के नाते महत्वपूर्ण निर्णय प्रायः इसमें ही होते हैं। इस बार सभा की विशेषता यह रही कि इसमें स्वयंसेवकों के गणवेश में खाकी नेकर की जगह […] Read more » change in dress code of rss dress code of rss स्वयंसेवक स्वयंसेवक के वेश में परिवर्तन
कविता साहित्य कलयुगी कन्हैया March 14, 2016 by शकुन्तला बहादुर | 3 Comments on कलयुगी कन्हैया नाम “कन्हैया” पाकर समझा, मैं हूँ कृष्णकन्हैया । नहीं समझ पाया ले डूबेगा , निज जीवन-नैया ।। ” कान्हा ने जब उठा लिया था, गोवर्धन पर्वत को । मैं भी अब उखाड़ फेकूँगा ,इस मोदी शासन को ।।” जैसे क्षमा किये कान्हा ने , दुष्ट वचन शिशुपाल के । मोदी भी हैं क्षमा कर रहे, […] Read more » Poem by Shakuntala Bahadur poem on kanhaiya kumar JNU कन्हैया कलयुगी कन्हैया