साहित्य कहो कौन्तेय-३५ October 1, 2011 / October 1, 2011 by विपिन किशोर सिन्हा | Leave a Comment (अर्जुन की सदेह स्वर्ग-यात्रा) विपिन किशोर सिन्हा – क्या खोया की गणना कर ही रहा था कि देवराज के रथ की घरघराहट सुनाई पड़ी। जैसे-जैसे रथ समीपआंखें बंद करके, दुर्दिनों में क्या पाया आ रहा था, भीषण ध्वनि से दिशाएं प्रतिध्वनित हो रही थीं। कुछ ही पल में रथ मेरे सामने था। सारथि मातलि ने […] Read more » Draupadi Krishna अर्जुन की सदेह स्वर्ग-यात्रा कहो कौन्तेय
व्यंग्य व्यंग्य/ नारद की चुप्पी के निहितार्थ October 1, 2011 / December 6, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment अशोक गौतम सुनो विक्रम! जैसे ही उन्होंने घोषणा की कि देश के प्रधानमंत्री बनने के उनके मुकाबले उनके अधिक चांस है तो बाबा के बुरे हाल हो गए। बेचारे बाबा ने खाना पीना सब छोड़ दिया। जन हित में ब्याह करना तो पहले ही छोड़ रखा था।’ ‘बेताल! ये क्या मनहूस खबर सुना दी तूने! […] Read more »
लेख एकात्म मानववाद के प्रणेता पं0 दीनदयाल उपाध्याय October 1, 2011 / December 6, 2011 by बृजनन्दन यादव | 2 Comments on एकात्म मानववाद के प्रणेता पं0 दीनदयाल उपाध्याय बृजनन्दन यादव वे एक ऐसे राजनेता थे जिन्हें सत्ता में कोर्इ आकर्षण नहीं था। फिर भी अपने अनुयायियों के दिलों पर राज करते थे। वे राजनीति को राष्ट्रसेवा का अंग मानते थे। पंडित दीनदयाल जी का जन्म 25 सितम्बर 1916 को मथुरा के निकट नगला चन्द्रभान नामक गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। […] Read more » pt. deendayal upadyay एकात्म मानववाद के प्रणेता पं0 दीनदयाल उपाध्याय
लेख नवजागरण काल में लोकतांत्रिक मूल्यों की प्रतिष्ठा और हिन्दी पत्रकारिता October 1, 2011 / December 6, 2011 by मयंक चतुर्वेदी | Leave a Comment डा. मयंक चतुर्वेदी नव जागरण से तात्पर्य है भारत में आधुनिकता का प्रवेश, वैज्ञानिक दृषिटकोण का विकसित होना और किसी भी घटना के परिप्रेक्ष्य में तार्किक मीमांसा के लिए तैयार हो जाना अर्थात तर्क-विर्तक की खुली परम्परा का प्रारंभ। भारतीय सन्दर्भ में इस नवजागरण काल का श्रेय हम अंग्रेजों को दे सकते है, क्योंकि प्राचीन […] Read more » hindi journalism लोकतांत्रिक मूल्यों की प्रतिष्ठा हिन्दी पत्रकारिता
व्यंग्य ये पबिलक है–सब जानती है ….. September 30, 2011 / December 6, 2011 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment जग मोहन ठाकन हमारे समय में जब छात्र पढ़ार्इ शुरु करते थे ,तो पहला पाठ अ-अनार और म-मछली का होता था। बाद में जब हम कालेज स्तर पर आये तो अ-अवसरवादिता तथा म-मनीतंत्र जैसे शब्दों से सामना हुआ । परन्तु आज बचपन में ही नवपीढ़ी को अ-अन्ना व म-मनमोहन के नारे लगाते बीच बाजार जुलूस […] Read more »
व्यंग्य गरीबी के झटके September 30, 2011 / December 6, 2011 by राजकुमार साहू | 1 Comment on गरीबी के झटके राजकुमार साहू देखिए, गरीबों को गरीबी के झटके सहने की आदत होती है या कहें कि वे गरीबी को अपने जीवन में अपना लेते हैं। पेट नहीं भरा, तब भी अपने मन को मारकर नींद ले लेते हैं। गरीबों को ‘एसी की भी जरूरत नहीं होती, उसे पैर फैलाने के लिए कुछ फीट जमीन मिल […] Read more » poverty गरीबी के झटके
लेख श्रीलाल शुक्ल और रागदरबारी September 29, 2011 / December 6, 2011 by वीरेन्द्र जैन | 4 Comments on श्रीलाल शुक्ल और रागदरबारी वीरेन्द्र जैन इसमें कोई सन्देह नहीं कि हिन्दी व्यंग्य के भीष्मपितामह हरिशंकर परसाई ही माने जाते हैं किंतु गत शताब्दी के सातवें दशक में अपने व्यंग्य उपन्यास रागदरबारी के प्रकाशन के बाद श्रीलाल शुक्लजी ने अपनी कुर्सी परसाई जी के बगल में ही डलवा ली थी। यह बिल्कुल वैसा ही था जैसे कि मतभेद निराकरण […] Read more »
लेख पत्रकारों की बदलती दिशा और दशा September 29, 2011 / December 6, 2011 by डॉ0 शशि तिवारी | 2 Comments on पत्रकारों की बदलती दिशा और दशा डॉ. शशि तिवारी शब्दों में वो ताकत होती है जो बन्दूक की गोली, तोप के गोले एवं तलवार में नहीं होती है। अस्त्र-शस्त्र से घायल व्यक्ति की सीमा शरीर होता है जो देर-सबेर ठीक हो ही जाता है लेकिन, शब्द से मानव की आत्मा घायल होती है, इस पीड़ा को जीवन-पर्यन्त तक नहीं भुलाया जा […] Read more » journalist पत्रकारों की बदलती दिशा और दशा
लेख नरेंद्र भाई अभी दिल्ली दूर है… September 29, 2011 / December 6, 2011 by श्रीराम तिवारी | 8 Comments on नरेंद्र भाई अभी दिल्ली दूर है… श्रीराम तिवारी भारत में राजनीति को कुआँर की कुतिया समझ कर सरे राह लतियाने वालों में दिग्भ्रमित विपक्ष और टी आर पी रोग से पीड़ित -प्रिंट,श्रव्य,दृश्य और बतरस मीडिया का नाम पहले आता है.भारत को बर्बाद करने में जुटी पाकिस्तान कि खुफिया एजेंसी आई एस आई,उसके द्वारा प्रेरित -पोषित घृणित आतंकवादियों,अलगाववादियों,नक्सलवादियों,पूंजीवादी -सामंती शोषण कि ताकतों,एनजीओ […] Read more » Narendra Modi
आलोचना ”पिट कर नहीं, पीट कर आओ, लोगों को घेर कर मारो” September 29, 2011 / December 6, 2011 by गिरीश पंकज | Leave a Comment गिरीश पंकज ”पिट कर नहीं, पीट कर आओ, लोगों को घेर कर मारो” . यह ”महान” प्रेरक वाक्य किसी तानाशाह का नहीं, लोकशाही के एक प्रतिनिधि का है,. एक राज्य के गृह मंत्री का. जिस जनता के वोट से ये महोदय मंत्री बने, उसी जनता को पीटने की बात कह रहे हैं? पुलिस को पाठ […] Read more »
लेख बाबा रामदेव की हुंकार में समझदारी September 28, 2011 / December 6, 2011 by प्रमोद भार्गव | 6 Comments on बाबा रामदेव की हुंकार में समझदारी प्रमोद भार्गव महारानी लक्ष्मीबाई की कर्मस्थली रही झांसी से बाबा रामदेव ने कालाधन वापिस लाने की जो हुंकार भरी है, वह अब समझदारी का पर्याय भी दिखाई दे रही है। स्वाभिमान यात्रा के नाम से आगाज हुआ यह अभियान परिपक्वता का पर्याय भी बन रहा है। दूध का जला छाछ भी फूंकफूंक कर पीता है, […] Read more » Baba Ramdev बाबा रामदेव
व्यंग्य वक्तव्य की तैयारी September 28, 2011 / December 6, 2011 by विजय कुमार | 1 Comment on वक्तव्य की तैयारी विजय कुमार भारत सरकार चाहती है कि देश में शांति रहे। देश में भले ही न रहे; पर दिल्ली में अवश्य रहे, चूंकि राजधानी होने के कारण यहां की राई को भी मीडिया वाले पहाड़ बनाकर पूरे देश और दुनिया में दिखा देते हैं। बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन से हुई छीछालेदर के […] Read more »