Category: राजनीति

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एकता मंचन में भी ‘एकल प्रस्तुति’

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अत: कांग्रेस को वह शांति से खामोशी से देख रही है। वह देख रही है कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह एकता सम्मेलन में भी कटाक्ष करने से बाज नहीं आए। यही नहीं मंच पर बैठे सभी को अगला मुख्यमंत्री बताकर और खुद को रेस से बाहर कर वे इस आंतरिक संघर्ष को और हवा दे गए। लिखना प्रासंगिक होगा कि मध्यप्रदेश के चुनाव के संदर्भ में दिग्विजय सिंह महत्वपूर्ण कारक फिर होने वाले हैं। जनता की निगाह में वे पहले से ही खारिज हैं। कांग्रेस भी उनसे कहीं-कहीं किनारा करती है पर यह भी एक सच है कि उनके बगैर कांग्रेस का पार लगना भी मुश्किल है।

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नारी शक्ति और ममता बैनर्जी

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-''महिलाओं की स्थिति देखने के लिए दक्षिण एशिया के सोनागाछी घूमकर आइये जो कि यहां का सबसे बड़ा वेश्यालय है। कालीघाट, बहूबाजार, खिदिरपुर और लेबूतल्ला के वेश्यालय घूमकर आइये। महिलाएं किस प्रकार नारकीय परिवेश में यौनदासी का जीवन जीने को बाध्य हैं, देखकर आइये। किस तरह लड़कियों की तस्करी हो रही है, उनकी प्रतिदिन कोठे में बिक्री हो रही है, देखकर आइये। लड़कियां केवल दुष्कर्म की ही नहीं, सामूहिक दुष्कर्म की भी शिकार हो रही हैं। गली सडक़ों में उनका यौन उत्पीडऩ दिन-प्रतिदिन हो रहा है। घर में भी पति ससुराल वालों के किस प्रकार अत्याचार सह रही हैं-देखकर आइये। अत्याचार सहन नहीं करने पर आत्महत्या करने के लिए बाध्य हो रही हैं।

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 कैसे हो सशक्त भारत का निर्माण

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पाकिस्तान को मोस्ट फेवरेट नेशन (MFN) न माना जाय और  समझौता एक्सप्रेस, दिल्ली-लाहौर बस सेवा व अन्य जितने भी भारत-पाक यात्रा के रेल व सड़क मार्ग है सभी को प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिये। सांस्कृतिक, फ़िल्मी व खेल आदि के नाम पर आये हुए सभी पाकिस्तानियों को निसंकोच देश से निकाला जाये और भविष्य के लिए इस पर भी प्रतिबंध लगें। भारत की सम्पूर्ण सीमाओं पर घुसपैठियों व आतंकियों को रोकने के प्रभावी उपाय किये जाए। सीमा क्षेत्रों में अवैध मस्ज़िद व मदरसो पर न्यायायिक कार्यवाही करके उनको ध्वस्त किया जाये। देश में सरकार द्वारा घोषित 90 मुस्लिम बहुल जिलों में ही पिछले  30 वर्षो के पुलिस व गुप्तचर विभागों के अभिलेखों का ब्यौरा (रिकार्ड्स) देखें  तो उसमें  नकली करेंसी, अवैध हथियार, नशीले पदार्थ व अन्य देशद्रोही घटनाओं में लिप्त पाये जाने वाले अपराधी अधिकाँश मुसलमान ही मिलेंगे।

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आर्थिकी चुनाव राजनीति

राजनीतिक चंदे के लिए निर्वाचन बाॅन्ड का औचित्य

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एक मोटे अनुमान के अनुसार देश के लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर 50 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च होते हैं। इस खर्च में बड़ी धनराशि कालाधन और आवारा पूंजी होती है। जो औद्योगिक घरानों और बड़े व्यापारियों से ली जाती है। आर्थिक उदारवाद के बाद यह बीमारी सभी दलों में पनपी है। इस कारण दलों में जनभागीदारी निरंतर घट रही है। अब किसी भी दल के कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को पार्टी का सदस्य नहीं बनाती हैं। मसलन काॅरपोरेट फंडिंग ने ग्रास रूट फंडिंग का काम खत्म कर दिया है। इस कारण अब तक सभी दलों की कोशिश रही है कि चंदे में अपारदर्शिता बनी रहे।

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