Category: राजनीति

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योगी का पराक्रम और प्रताप

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उत्तर प्रदेश की जनता को पुन: एक बार बधाई, जिसने परिपक्व निर्णय लिया और सत्ता की चाबी सत्ता के दलालों (त्रिशंकु विधानसभा बनने पर जो लोग सत्ता में अपनी-अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अपना-अपना हिस्सा मांगते) के हाथों में न देकर सीधे एक ऐसे व्यक्ति के हाथों में सौंप दी-जिसके आने की आहट से ही गौमाता को राहत की सांस मिलनी आरंभ हो गयी। पराक्रम इसी का नाम होता है कि जिसके पुण्य कर्मों से निर्मित उसका पुण्यमयी प्रतापी आभामण्डल समाज के अतिवादी लोगों को कंपायमान कर दे और सज्जनों को चैन की सांस दिला दे।

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केेजरीवाल जी! पहले दिल्ली संभालो

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करके केजरीवाल अपने आपको मोदी के समान स्तर का राजनेता बनाने का अतार्किक प्रयास कर रहे हैं। माना कि लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति को बड़े से बड़ा पद लेने का संवैधानिक अधिकार है, परंतु इस अधिकार की अपनी सीमाएं हैं और उन सीमाओं की पवित्रता इसमें है कि आप जितने बड़े पद को लेना चाहते हैं उतने ही बड़े अनुपात में आपके साथ जनाधार होना चाहिए। यह जनाधार किसी भी राजनेता को तभी मिलता है जब लोग उसके कार्य को प्रशंसा देने लगते हैं। यदि केजरीवाल जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुए दिल्ली के दिल को जीतने में असफल हो रहे हैं तो मानना पड़ेगा कि वह प्रधानमंत्री मोदी से बराबरी करके न केवल अपनी ऊर्जा को नष्ट कर रहे हैं, अपितु अपनी अपने आपको उपहास का पात्र भी बना रहे हैं।

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बिहार से यूपी तक और मोदी से योगी तक

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एक लम्बे समय तक साम्प्रदायिक शब्द भारतीय राजनीत का प्यारा शब्द रहा है। समयानुसार यह शब्द अपने अर्थ तब्दील करता रहा, राजनीतिज्ञों की जुबानी। कभी अटल बिहारी बाजपेयी असाम्प्रदायिक थे और आडवाणी साम्प्रदायिक। समय बदला आडवाणी हो गये असाम्प्रदायिक और मोदी हो गये साम्प्रदायिक। आज के दौर में एक बार पुनः इस शब्द की व्याख्या हो रही है, व्यक्ति के सन्दर्भ में । कहा ये जा रहा है कि अब मोदी असाम्प्रदायिक है और आदित्यनाथ योगी साम्प्रदायिक। सुविधा की राजनीत इसे ही कहते है।

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‘न्यू इंडिया’ के लिए राष्ट्रपति कौन… ये, वो या फिर कोई और ?

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राष्ट्रपति पद के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल में से देखें, तो वित्त मंत्री अरुण जेटली, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, नगर विकास मंत्री वेंकैया नायडू समेत लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन जैसे भी कुछेक जानदार नाम हैं। पार्टी में देखे, तो लालकृष्ण आडवाणी भी सबसे प्रबल स्वरूप में सामने हैं। मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार, केशूभाई पटेल और यशवंत सिन्हा भी उम्मीद पाले हुए हैं। लेकिन इन सब में जेटली और आडवाणी को छोड़कर बाकी सभी को तो उपराष्ट्रपति पद से भी संतुष्ट किया जा सकता है।

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कौन हैं मुसलमानों को योगी का डर दिखाने वाले लोग?

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कुछेक बयानों को आधार बनाकर यह लोग योगी आदित्यनाथ को बदनाम कर रहे हैं। निश्चित तौर पर उनके कुछ बयान कड़े हैं, लेकिन समूचा देश यह भी जानता है कि वे बयान अकारण नहीं आए थे। उन बयानों के पीछे एक पीडि़त,आहत और व्यथित मन था। योगी की कट्टर छवि गढऩे वाले मीडिया और कम्युनिस्टों को आज से 10 साल पहले वर्ष2007 में संसद में दिए गए गोरखपुर के सांसद आदित्यनाथ का आँसुओं से तरबतर पूरा भाषण सुनना चाहिए। प्रोपोगंडा फैलाने में माहिर और हिटलर के सूचना मंत्री गोएबल्स के वंशज यह लोग क्या इस बात का जवाब दे सकते हैं कि संसद में एक संत क्यों फफक-फफक कर रोया था?

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उत्तर प्रदेश में योगी की ताजपोशी के साथ महाबदलाव के क्षण

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उप्र के युवा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शपथ लेने के साथ ही दो उपमुख्यमंत्रियों केशव प्रसाद मौर्य व लखनऊ के महापौर डा. दिनेश शर्मा को उपमुख्यमंमत्रंी पद की शपथ दिलायी गयी। उनके साथ 22 कैबिनेट मंत्रियांे सहित 13 राज्यमंत्रियों व नौ स्वतंत्र प्रभार मंत्रियों को भी पद और गोपनीयता की शपथ दिलायी गयी । प्रदेश के राजनैतिक इतिहास में योगी मंत्रिपरिषद ऐसी पहली मंत्रिपरिषद है जो पूरी तरह से बेदाग है। यह मंत्रिपरिषद नये और पुराने चेहरों का सम्मिश्रण है। मंत्रिपरिषद के गठन में जातीय व क्षेत्रीय संतुलन का शानदार तरीके से प्रयोग किया गया है

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मनुवाद का उग्र व रक्तरंजित विरोध पर मायावती को सोचना होगा

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प्रमाणित और निर्णायक तौर पर मायावती न तो काशी राम हैं और न ही भीमराव अबेडकर हैं। काशी राम और भीम राव अंबेडकर को दौलत नहीं चाहिए थे, संपत्ति से इन्हें कोई मोह नहीं था। इनकी केवल इच्छा दलितों की उन्नति और उत्थान था, जिनके लिए ये लडे। काशी राम पार्टी और संगठन में आये पैसे कार्यकर्ताओं के बीच वितरित करते थे। इसलिए काशी राम के प्रति दलितों का सम्मान जारी है। अबेडकर कहा करते थे कि सिर्फ उफान पैदा करने से और गाली देने से मात्र से दलितों का उत्थान नहीं होगा, उन्नति नहीं होगी।

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गुजरात चुनाव एक बड़ी चुनौती है

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इन दिनों गुजरात के आदिवासी समुदाय को बांटने और तोड़ने के व्यापक उपक्रम चल रहे हैं जिनमें अनेक राजनीतिक दल अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए इस तरह के घिनौने एवं देश को तोड़ने वाले प्रयास कर रहे हैं। ऐसे ही प्रयासों ने भिलीस्तान जैसी समस्या को खड़ा कर दिया है। एक आंदोलन का रूप देकर आदिवासी समुदाय को विखण्डित करने की कोशिश की जा रही है। इस भिलीस्तान आंदोलन को नहीं रोका गया तो गुजरात का आदिवासी समाज खण्ड-खण्ड हो जाएगा।

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मोदी युग की प्रचंडता और यूपी का चुनावी बहुमत

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दलित उत्थान में योगदान करनेवाले कई सामाजिक क्षत्रपों की मूर्तियां इतिहास के पन्नों से निकलकर 21वीं सदी में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है, तो यूपी में इसकी वजह मायावती ही है| हालांकि बीते शासनकाल में मूर्तियों और स्मारकों के निर्माण में बड़े पैमाने पर हुए भ्रष्टाचार की वजह से ही उन्हें सत्ता गंवानी पड़ी| अब तमाम विवादों और आरोपों को दरकिनार कर मायावती ने पांचवीं बार प्रदेश के मुख्यमंत्री की गद्दी पर अपना दावा तो ठोका पर किस्मत के साथ-साथ खराब सोशल इंजीनियरिंग उन्हे ले डूबी |

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