हिंदुस्तान का मुसलमान क्यों डरा है ?
Updated: December 19, 2019
प्रभुनाथ शुक्ल कैब पर भड़की हिंसा ने राजधानी दिल्ली के साथ दूसरे राज्यों को भी…
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महान विदुषी महिला गार्गी का महर्षि याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ
Updated: December 19, 2019
भारतीय इतिहास में ऐसी अनेकों महान नारियां हुई हैं जिन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता , ज्ञान – विज्ञान में निष्णात होने और प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष की…
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वैदिक राजधर्म व्यवस्था एवं देश के अध्यक्ष राजा के उत्तम गुण व आचरण
Updated: December 19, 2019
-मनमोहन कुमार आर्य वेद संसार के सबसे पुराने धर्म ग्रन्थ हैं। वेद के विषय में ऋषि दयानन्द के विचार हैं कि वेद सब सत्य…
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“कौआ कान ले गया “
Updated: December 19, 2019
“हुजूर ,आरिजो रुख्सार क्या तमाम बदनमेरी सुनो तो मुजस्सिम गुलाब हो जाए ,गलत कहूँ तो मेरी आकबत बिगड़ती है जो सच कहूँ तो खुदी बेनकाब हो…
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बलात्कार शब्द का सामान्यीकरण
Updated: December 19, 2019
अनिल अनूप कभी-कभी सोचता हूँ मैं उस शिक्षित समाज का हिस्सा हूँ जो बलात्कार जैसे शब्दों को लेकर बेहद सामान्य हो चुका है। मेरे आस-पास…
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आम-बजट में राहत की उम्मीदें
Updated: December 19, 2019
-ः ललित गर्ग:-देश में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, व्यापार की टूटती सांसें, आर्थिक सुस्ती एवं विकास की रफ्तार में लगातार आ रही गिरावट चिंता एवं चिन्तन…
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ऑस्टियोआर्थराइटिस की संभावना महिलाओं में ज्यादा……
Updated: December 19, 2019
ओस्टियोआथ्र्राइटिस जोड़ों का एक विकार है, जो लाखों भारतीयों को प्रभावित करता है। इससे हड्डियां कमजोर होती हैं और फ्रैक्चर की संभावना बढ़ जाती है।…
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पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था की दौड़ में बाधाएं
Updated: December 19, 2019
दुलीचंद कालीरमन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश को वर्ष 2024 तक पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य कई अर्थशास्त्रियों को दूर की कौड़ी लगता है. वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था तीन ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुकी है. वैसे 2 ट्रिलियन डॉलर से तीन ट्रिलियन डॉलर का सफर तय करने में पांच वर्ष लगे.वर्ष 2014 में जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना कार्यभार संभाला था तो भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की 11वीं अर्थव्यवस्था थी, जो वर्ष 2019 तक आते-आते पांचवें या छठे स्थान पर आ गई है. अपने लिए लक्ष्य निर्धारित कर आगे बढ़ना सकारात्मकता का उदाहरण है. लेकिन वर्तमान आर्थिक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की दौड़ में कई बाधाएं खड़ी है, जिससे जिनको पार करना वर्तमान सरकार के लिए चुनौती भरा कार्य है. अगर हम तकनीकी तौर पर नहीं बल्कि व्यवहारिक पक्ष पर विचार करें तो अर्थव्यवस्था के चार ही पक्ष है. पहला सरकार, दूसरा उद्योग जगत, तीसरा बैंकिंग व्यवस्था और चौथा सामान्य नागरिक. सरकार को देश में विकास कार्यों तथा प्रशासन के संचालन के लिए राजस्व की जरूरत होती है. जिसे वह कर के रूप में उद्योग जगत तथा सामान्य जन से संग्रहित करती है. उद्योग जगत में से जीएसटी तथा कारपोरेट टैक्स के रूप में तथा सामान्य जन से आयकर के रूप में राजस्व आता है. 1 जुलाई 2017 से वस्तु तथा सेवा कर लागू हुआ है. इसे कई प्रकार के करो को एक कर में बदलने के लिए लागू किया गया था और यह कहा गया था कि इससे कर संग्रहण में सुविधा होगी तथा कर संग्रहण सस्ता भी होगा. लेकिन वस्तु तथा सेवा कर के लागू होने के बाद अभी भी इसमें कई समस्याएं हैं. जिसके कारण राजस्व में कमी बनी हुई है. अभी भी फर्जी ई-वे बिल तथा बोगस कंपनियों द्वारा टैक्स रिबेट के नाम पर घोटाले की दिन की खबरें आए दिन अखबारों में छपती हैं. राज्यों को भी कर राजस्व में घाटा हो रहा है तथा जीएसटी कानून के कारण केंद्र सरकार को राज्यों के कर घाटे की भरपाई करनी पड़ रही है. जीएसटी कानून के बेहतर कार्यान्वयन से ही राजस्व संग्रहण में वृद्धि सुनिश्चित की जा सकती है. वर्तमान में जीडीपी यानी ‘सकल घरेलू विकास दर’ निरंतर गिर रही है. वर्ष की दूसरी तिमाही तिमाही में यह 4.5% पर आ चुकी है. भारतीय रिजर्व बैंक में अभी हाल ही में चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर अनुमान घटाकर 6.1 प्रतिशत कर दिया है जो पहले 6.9 प्रतिशत था. उद्योग जगत के ज्यादातर क्षेत्र मंदी की मार में निर्यात लगातार गिर रहा है. घरेलू मोर्चे से भी मांग की कमी का रोना रोया जा रहा है. पिछले बजट में सरकार ने अपने राजस्व संग्रह को बढ़ाने के लिए कॉरपोरेट टैक्स को बढ़ावा बढ़ाया था. लेकिन उद्योग जगत के कमजोर प्रदर्शन से को देखते हुए इसे फिर से कम कर दिया गया है. कॉरपोरेट टैक्स में यह कमी इसी उम्मीद से की गई है कि इससे उद्योग अपनी गतिविधियों को बढ़ाएंगे तथा निर्यात को बढ़ाकर रोजगार की नई संभावनाएं बनेंगी. निर्यात के माध्यम से विदेशी मुद्रा भी भारत में आएगी. यह कितना कारगर होगा यह आने वाला समय ही बताएगा. अर्थव्यवस्था का तीसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र बैंकिंग व्यवस्था है. पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने में यह क्षेत्र बाकी के तीन क्षेत्रों को जोड़ने का कार्य करता है. सरकार, उद्योग, व जन सामान्य का भरोसा बैंकिंग व्यवस्था पर होगा तभी अर्थव्यवस्था पटरी पर चल पड़ेगी. लेकिन खेद का विषय है कि पिछले कुछ वर्षों में बैंकिंग व्यवस्था में आम आदमी का विश्वास कम हुआ है. जिस प्रकार विजय माल्या, नीरव मोदी, चौकसे आदि ने बैंकों में हजारों करोड रुपए का चूना लगाया है उससे आम आदमी का विश्वास उद्योगपतियों, सरकार तथा बैंकिंग व्यवस्था से हिला है. जो भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी बात नहीं है. हाल ही में मुंबई के “पीएमसी बैंक घोटाला” भी इसी कड़ी का एक उदाहरण है. वर्तमान आर्थिक मंदी के दौर में रिजर्व बैंक लगातार कई बार रेपो रेट में कमी करके कर्ज़ों को सस्ता करने का प्रयास कर चुका है. जिससे तरलता की कमी को दूर किया जा सके तथा घरेलू स्तर पर मांग में तेजी आ सके. रिजर्व बैंक द्वारा बैंकों का पुन:पूंजीकरण भी इस व्यवस्था को सुदृढ़ करने का एक प्रयास है. पिछले कुछ सालों में गैर निष्पादित ऋणों के बढ़ते आंकड़ों पर भी कुछ अंकुश लगा है. दिवालिया कानून जैसी प्रक्रिया से भी इस क्षेत्र में आम आदमी का विश्वास थोड़ा मजबूत हुआ है. लेकिन इसमें अभी भी काफी कुछ किया जाना शेष है. भारत जैसे देश में, जिसकी आबादी 130 करोड़ से ऊपर है, वहां पर मांग में कमी (जैसा उद्योग जगत द्वारा कहा जाता है) समझ में नहीं आती है. जबकि यह मांग की कमी नहीं अपितु आय में कमी है. हम सब जानते हैं कि आबादी का 50% हिस्सा कृषि पर निर्भर है. समय के साथ-साथ फसलों का लागत मूल्य लगातार बढ़ रहा है. लेकिन किसानों को उनकी फसलों का उचित एवं लाभकारी मूल्य नहीं मिल पा रहा है. सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य तो घोषित किया जाता है लेकिन किसान की पूरी फसल उस न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आज भी नहीं बिक रही. इससे कृषि मजदूर की आय पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा है. वर्तमान में प्याज की कीमतें ₹150 प्रति किलो तक पहुंच गई थी. लेकिन क्या इसका लाभ प्याज के उत्पादक किसानों को मिला है? इसका जवाब सभी जानते हैं. आज भी फलों और सब्जियों के विपणन तथा भंडारण में सरकार द्वारा बहुत कम प्रयास किए गए है. एक आम किसान के पास इतने संसाधन नहीं होते कि वह उनका भंडारण कर सके. इससे बिचौलियों की पौ-बारह होती है तथा आम किसान अपने आप को ठगा सा महसूस करता है. उसका भरोसा पूरी आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था से उठ जाता है. फिर किसान आंदोलनों को राजनीतिक दल अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए उपयोग करते हैं. अगर कॉर्पोरेट टैक्स की माफी के नाम पर 1.45 लाख करोड रुपए उद्योगपतियों को दिए जा सकते हैं, तो क्या देश की आधी आबादी जो कृषि पर निर्भर है, उसकी आर्थिक मदद नहीं की जा सकती? जिससे मांग में तेजी आएगी, इससे उनके जीवन स्तर के साथ-साथ उद्योग भी की मंदी को भी दूर किया जा सके. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने व्यक्तिगत आयकर में भी कुछ छूट देने के संकेत आगामी बजट में दिए हैं. इससे नकदी का प्रवाह बढ़ेगा और पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था की दौड़ में मंजिल पर पहुंचने में मदद मिलेगी. इसके लिए जरूरी है कि हम आर्थिक नीतियों का निर्धारण करते समय देश में आर्थिक स्थिति के व्यवहारिक पक्ष पर भी ध्यान देकर उसी के अनुसार निर्णय लेंगे, तो ही धरातल पर फर्क स्पष्ट दिखाई देगा अन्यथा किताबी बातें किताबों तक ही रह जाती है,
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मोदी सरकार की आड़ में हिन्दुओं को गाली देने वाली बिगे्रड अब ‘कैब’ विरोध के नाम पर मैदान में
Updated: December 18, 2019
संजय सक्सेना केन्द्र की मोदी सरकार ने आखिरकार भारी विरोध के बीच अपने घोषणा पत्र के एक और चुनावी वायदे ‘नागरिकता संशोधन बिल’ (कैब)को कानूनी…
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बांग्लादेश अवैध घुसपैठियों की वापसी को तैयार
Updated: December 18, 2019
प्रमोद भार्गव बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमेन ने कहा है कि ‘उनके देश ने भारत से अनुरोध किया है कि यदि उनके यहां…
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जारी है किसानों को कर्ज-मुक्त बनाने की पहल
Updated: December 18, 2019
प्रमोद भार्गव मध्य-प्रदेश देश का ऐसा प्रमुख राज्य हैं, जिसने शिवराज सिंह चौहान की सरकार के दौरान उत्तरोत्तर कृषि में प्रगति करते हुए…
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सत्ता सुख नहीं, समस्या समाधान
Updated: December 17, 2019
स्वतंत्र भारत के इतिहास में अनुकूल परिस्थितियां होने के उपरांत भी अनेक समस्याओं को बनाये रखकर हमारे राजनेता दशकों सत्ता का सुख भोगते रहे। राजनीति…
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