कविता अक्सर … September 7, 2017 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment बारिशो के मौसम में ; यूँ ही पानी की तेज बरसाती बौछारों में ; मैं अपना हाथ बढाता हूँ कि तुम थाम लो , पर सिर्फ तुम्हारी यादो की बूंदे ही ; मेरी हथेली पर तेरा नाम लिख जाती है .. ! और फिर गले में कुछ गीला सा अटक जाता है ; जो पिछली बारिश की याद दिलाता है , जो […] Read more » अक्सर
लेख साहित्य कोई पूछे तो सही, अशोक अब तक वाजपेयी क्यों हैं September 6, 2017 / September 6, 2017 by अलकनंदा सिंह | Leave a Comment रामकुमार वर्मा ने अपने महाकाव्य ”एकलव्य” में लिखा है, ”तुम नहीं वत्स, यह समय ही शूद्र है”। हमेशा से ही ”शूद्र” शब्द को दलितों का प्रतीक माना जाता रहा जबकि ”शूद्र” कोई जाति नहीं एक उपमा है जो निम्नतर होते विचारों, मूल्यों, भावनाओं, विवेक और संकल्पों को हमारे सामने ठीक उसी तरह लाती है जिस […] Read more » Featured Jawad Habib जावेद हबीब सलून में हिन्दू देवी देवताओं को मैनीक्योर-पैडीक्योर
कविता ये नौकर September 6, 2017 / September 6, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment घर का कोई पुराना नौकर, ईमानदार वफ़ादार सा नौकर, हर व्यक्ति की सेवा करता मुश्किल से मिलता था ये नौकर लैण्ड लाइन सा ना कोई नौकर अब बूढा होकर ये नौकर पड़ा है इक कौने में नौकर कितना सुन्दर था ये नौकर मालिक का सर गर्व से उठता जिसके घर होता ये नौकर। मेज़पर […] Read more » ये नौकर
कविता चल वहां चल …………… September 5, 2017 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment चल वहां चल , किसी एक लम्हे में वक़्त की उँगली को थाम कर !!!! जहाँ नीली नदी खामोश बहती हो जहाँ पर्वत सर झुकाए थमे हुए हो जहाँ चीड़ के ऊंचे पेड़ चुपचाप खड़े हो जहाँ शाम धुन्धलाती न हो जहाँ कुल जहान का मौन हो जहाँ खुदा मौजूद हो , उसका करम हो […] Read more » चल वहां चल ……………
व्यंग्य साहित्य क्यों पनपते हैं बाबाओं के डेरे ? August 30, 2017 / August 30, 2017 by जगमोहन ठाकन | 4 Comments on क्यों पनपते हैं बाबाओं के डेरे ? कार्ल मार्क्स ने कहा था- धर्म अफीम के समान है . पर कोई व्यक्ति क्यों अफीम का प्रयोग करता है , कब शुरू करता है इसका सेवन और कब तक रहता है इसके नशे का आदि ? यदि यही प्रश्न हम धर्म , सम्प्रदाय , पंथ या डेरे से जोड़कर देखें , सोचें ; तो कहीं ना […] Read more » बाबाओं के डेरे
व्यंग्य दो रोगों की एक दवाई August 30, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment बचपन में स्कूल में हमें गुरुजी ने एक सूत्र रटाया था, ‘‘सौ रोगों की एक दवाई, सफाई सफाई सफाई।’’ कुछ बड़े हुए, तो संसार और कारोबार में फंस गये। इससे परिवार और बैंक बैलेंस के साथ ही थोंद और तनाव भी बढ़ने लगा। फिर शुगर, रक्तचाप और नींद पर असर पड़ा। डॉक्टर के पास गये, […] Read more » bjp Congress Featured Indian political parties political parties unite political parties united in India अन्ना द्रमुक दवाई
व्यंग्य चुनाव की तैयारी August 25, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment चुनाव लड़ना या लड़ाना कोई बुरी बात नहीं है। राजनीतिक दल यदि चुनाव न लड़ें, तो उनका दाना-पानी ही बंद हो जाए। चुनाव से चंदा मिलता है। अखबारों में फोटो छपता है। हींग लगे न फिटकरी, और रंग चोखा। बिना किसी खर्च के ऐसी प्रसिद्धि किसे बुरी लगती है ? इसलिए हारें या जीतें, पर […] Read more » Featured preparation for election चुनाव चुनाव की तैयारी
व्यंग्य हम सीख रहे हैं….. August 25, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment कहते हैं सीखने की कोई उम्र नहीं होती।अब 70 हमारे पास मंडरा रहा है और हम सीखे जा रहे है, शायद कब्र तक पंहुचते पंहुचते भी सीखते रहे, सीखने से छुट्टी नहीं मिलने वाली, सीखे जाओ किये जाओ यही हमारी नियति है। पचास साल हो गये पढ़ाई पूरी किये पर सीखना बन्द नहीं हुआ। हिन्दी […] Read more » Featured ईमोजी हम सीख रहे हैं
व्यंग्य साहित्य नमक का ढेला और गुड़ की लेप August 23, 2017 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment जग मोहन ठाकन लगातार छह माह से इन्तजार करके आँखें थक चुकी थी कि शायद आज ही कोई लाइक आया जाए , कोई कमेंट आ जाए और तो और कोई पोक ही जाए तो भी सब्र कर लूँ . पर सब के सब कंजूस हैं . सैंकड़ों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी , ज्यादातर ने तो […] Read more » गुड़ की लेप नमक का ढेला
कविता साहित्य खुशिओं के दिन फिर आयेगे August 22, 2017 by राकेश कुमार सिंह | Leave a Comment राकेश कुमार सिंह मुसाफिर चलता जा, कोशिस करता जा, गम के बादल छट जायेगे, खुशिओं के दिन फिर आयेंगे ! मंजिल जब मिल जायेगी ! मेहनत से इतिहास बदल दो, दुनिया का आगाज बदल दो, लहू से अपने सींच धरा को, फिर से अपनी परवाज बदल दो, खुशिओं के दिन फिर आयेगे ! मंजिल जब […] Read more » खुशिओं के दिन फिर आयेगे
कविता साहित्य शबनमी आेश के कण August 22, 2017 by राकेश कुमार सिंह | Leave a Comment राकेश कुमार सिंह शबनमी ओश के कण मोती सदृस्य बिखरे हुये, कोमलता पारदर्शी, मुखड़ा तुम्हारा याद आया ! शीतल मंद वायु का झोका, मौसम अठखेलियाँ करता हुआ, गुंजार भ्रमरों का सुना तो, हँसना तुम्हारा याद आया ! चटखती हुई कलियाँ; महक पुष्पित फिजा की, निर्गमित आह्लाद बनकर, पायल छनकाना तुम्हारा, बरबस हमें याद आया ! […] Read more » शबनमी आेश के कण
कला-संस्कृति लेख साहित्य परसाई के बहाने August 22, 2017 by आरिफा एविस | Leave a Comment आरिफा एविस हिंदी साहित्य के मशहूर व्यंग्यकार और लेखक हरिशंकर परसाई से आज कौन परिचित नहीं है और जो परिचित नहीं है उन्हें परिचित होने की जरूरत है. मध्य प्रदेश के होशंगाबाद के जमानी गाँव में 22 अगस्त 1924 में पैदा हुए परसाई ने लोगों के दिलों पर जो अपनी अमिट छाप छोड़ी है. उसका […] Read more » Featured poet Hari Shankar Parsai मशहूर व्यंग्यकार और लेखक हरिशंकर परसाई हरिशंकर परसाई