कविता साहित्य कभी कुछ भी नज़र नहीं आए ! October 8, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment कभी कुछ भी नज़र नहीं आए ! शिकागो के गगन से कभी कुछ भी नज़र नहीं आए, धुँधलका आसमान में छा जाए; श्वेत बादल बिछे से नभ पाएँ, व्योम में धूप सी नज़र आए ! ज्योति सम-रस सी रमी मन भाये, मेघ लीला किए यों भरमाएँ; धरा से देख यह कहाँ पायें, रुचिर […] Read more » कभी कुछ भी नज़र नहीं आए !
कहानी साहित्य पारिजात के फूल October 7, 2017 / October 7, 2017 by विजय कुमार सप्पाती | 1 Comment on पारिजात के फूल भाग 1 – 1982 वह सर्दियों के दिन थे. मैं अपनी फैक्टरी से नाईट शिफ्ट करके बाहर निकला और पार्किंग से अपनी साइकिल उठाकर घर की ओर चल पड़ा. सुबह के 8:00 बज रहे थे. मैं अपने घर के सामने से गुजरा. मां दरवाजे पर खड़ी थी, मैंने मां को बोला ‘मां नहाने का पानी […] Read more » Featured पारिजात
व्यंग्य साहित्य गुरुगिरी मिटती नहीं हमारी October 7, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment हमारा देश हमेशा से ज्ञान का उपासक रहा है और इस पर कभी किसी को कोई शक नहीं रहा है। ज्ञान के मामले में हम शुरू से उदार रहे है,केवल बाँटने में यकीन रखते है। ज्ञान की आउटगोइंग कॉल्स को हमने सदा बैलेंस और रोमिंग के बंधनो से मुक्त रखा है। हमने विश्व को शून्य […] Read more » Featured गुरुगिरी
कविता साहित्य ज्वालामुखी October 6, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment हर आदमी आज यहाँ, ज्वालामुखी बन चुका है। क्रोध कुंठा ईर्ष्या की आग भीतर ही भीतर सुलग रही है। कोई फटने को तैयार बैठा हैं, कोई आग को दबाये बैठा है, किसी के मन की भीतरी परत में, चिंगारियां लग चुकी हैं। कोई ज्वालामुखी सुप्त है, कोई कब फट पड़े कोई नहीं जानता। समाज की विद्रूपताओं का सामना करने वाले या उनको बदलने वाले अब नहीं रहे क्योंकि सब जल रहे हैं भीतर से और बाहर से. क्योंकि वो ज्वालामुखी बन चुके हैं। ज्वालामुखी का पूरा समूह फटता है , तो कई निर्दोष मरते है, जब बम फटते है, नाइन इलैवन या ट्वैनटी सिक्स इलैवन होता है। किसी बड़े ज्वालामुखी के फटने से प्रद्युम्न मरते है या निर्भया, गुड़िया,या किसी मीना की इज्जत पर डाके पड़ते है, फिर हाल बेहाल, वो कही सड़क पर कहीं फेंक चलते है। कभी कार मे छोटी सी खरोंच आनेपर चाकू छुरी या देसी कट्टे चलतेहैं क्योंकि वो आदमी नहीं है ज्वालामुखी बन चुके हैं क्रोध कहीं से लिया और कहीं दाग़ दिया क्रोध कुँठा से ही ज्वालामुख बनते हैं औरों के साथ ख़ुद के लियें भी ,ख़तरा बनते हैं। कुछ ज्वालामुखी भीतर ही भीतर धदकते है ये भड़कर फटते भी नहीं हैं, अपनी ही जान लेते हैं। कोई गरीबी में जलता है, कोई प्रेम त्रिकोण में फंसता है कोई परीक्षा में असफल है, कोई उपेक्षित महसूस करता है या फिर अवसाद रोग से जलता रहा है कुछ कह नहीं रहा…,.,……. किसी की प्रेमिका ने किसी और के संग करली है सगाई……….. ये सब ज्वालामुखी धधक रहे हैं शायद ही किसी की आग कोई बुझा सके तो अच्छा हो, वरना ये ज्वालामुखी, अन्दर ही फटते है कोई पंखे पे लटक गया कोई नवीं, मंजिल से कूदा है इन ज्वालामुखियों के फटने से रोज खून इतना बहता है कि अखबार के चार पन्ने लाल होते हैं यहाँ हर आदमी ज्वालामुखी बन चुका है अब, हम जी तो रह है, पर डर के साये में, कौन कब फटे बस यही किसी को नहीं पता! Read more » Featured ज्वालामुखी
व्यंग्य साहित्य तो क्या हाथी निकलेगा ? October 6, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment दुनिया में शाकाहारी अधिक हैं या मांसाहारी; शाकाहार अच्छा है या मांसाहार; फार्म हाउस के अंडे और घरेलू तालाब की छोटी मछली शाकाहार है या मांसाहार; मांस में भी झटका ठीक है या हलाल; ताजा पका हुआ मांस अच्छा है या डिब्बाबंद; ये कुछ चिरंतन प्रश्न हैं, जिनके उत्तर मनुष्य सदियों से तलाश रहा है। […] Read more » adulterated food Featured rat in the food तो क्या हाथी निकलेगा
कविता साहित्य तुम्हारी हर ख्वाहिशें October 5, 2017 by अर्पण जैन "अविचल" | Leave a Comment अर्पण जैन ‘अविचल’ हर ख्वाब तेरे सिरहाने रख दुँ, जैसे चांद के पास सारी चांदनी बिखरते हुए अशकार समेट लूं, जैसे शायरी से मिलकर बनती है गजल कुछ खिलौनों-सी जिद है जिन्दगी, जैसे बचपन की गुड़िया की रसोई फर्श पर फिसलते मेरे इश्तेहार जैसे स्याही के बिखरने से बिगड़ता कागज […] Read more » तुम्हारी हर ख्वाहिशें
कविता साहित्य भारत के वे “लाल” यशस्वी,सचमुच बड़े “बहादुर” थे । September 28, 2017 by शकुन्तला बहादुर | 4 Comments on भारत के वे “लाल” यशस्वी,सचमुच बड़े “बहादुर” थे । भारत के यशस्वी पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री जी को * सादर समर्पित श्रद्धा-सुमन ********* भारत के वे “लाल” यशस्वी,सचमुच बड़े “बहादुर” थे । क़द छोटा, इंसान बड़े थे , देश-प्रेम हित आतुर थे ।। पले अभावों में थे लेकिन,मन से बड़े उदारमना । कर्त्तव्यों में निष्ठा थी,निज कष्टों को नहीं गिना ।। काशी विद्यापीठ […] Read more » सादर समर्पित श्रद्धा-सुमन स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री जी
व्यंग्य साहित्य त्योहार और बाजार…!! September 26, 2017 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा कहते हैं बाजार में वो ताकत हैं जिसकी दूरदर्शी आंखे हर अवसर को भुना कर मोटा मुनाफा कमाने में सक्षम हैं। महंगे प्राइवेट स्कूल, क्रिकेट , शीतल पेयजल व मॉल से लेकर फ्लैट संस्कृति तक इसी बाजार की उपज है। बाजार ने इनकी उपयोगिता व संभावनाओं को बहुत पहले पहचान लिया और […] Read more » त्योहार त्योहार और बाजार बाजार
व्यंग्य साहित्य डिजीटल शौचालय, सुविधा से मुसीबत तक September 22, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment भारत की हमारी महान सरकार ने तय कर लिया है कि वो हर चीज को डिजीटल करके रहेगी। वैसे तो ये जमाना ही कम्प्यूटर का है। राशन हो या दूध, रुपये पैसे हों या कोई प्रमाण पत्र। हर चीज कम्प्यूटर के बटन दबाने से ही मिलती है। जब से मोबाइल फोन स्मार्ट हुआ है, तब […] Read more » डिजीटल शौचालय
व्यंग्य साहित्य राजनीति का कोढ़ : वंशवाद September 21, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment कल शर्मा जी मेरे घर आये, तो हाथ में मिठाई का डिब्बा था। उसका लेबल बता रहा था कि ये ‘नेहरू चौक’ वाले खानदानी ‘जवाहर हलवाई’ की दुकान से ली गयी है। डिब्बे में बस एक ही बरफी बची थी। उन्होंने वह मुझे देकर डिब्बा मेज पर रख दिया। – लो वर्मा, मुंह मीठा करो। […] Read more » Featured वंशवाद
पुस्तक समीक्षा समाज, प्रकृति और विज्ञान September 18, 2017 by अरुण तिवारी | Leave a Comment समाज का प्रकृति एजेण्डा जगाती एक पुस्तक समीक्षक: अरुण तिवारी पुस्तक का नाम: समाज, प्रकृति और विज्ञान लेखक: श्री विजयदत्त श्रीधर, श्री राजेन्द्र हरदेनिया, श्री कृष्ण गोपाल व्यास, डाॅ. कपूरमल जैन, श्री चण्डी प्रसाद भट्ट संपादक: श्री राजेन्द्र हरदेनिया प्रकाशक: माधवराव सप्रे स्मृति समाचारप संग्रहालय, एवम् शोध संस्थान, माधवराव सप्रे मार्ग (मेन रोड नंबर […] Read more » प्रकृति और विज्ञान समाज
कविता साहित्य कुचल दो कुयाशा की शाखाएँ ! September 18, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment कुचल दो कुयाशा की शाखाएँ, कुहक ले चल पड़ो कृष्ण चाहे; कृपा पा जाओगे राह आए, कुटिल भागेंगे भक्ति रस पाए ! भयंकर रूप जो रहे छाए, भाग वे जाएँगे वक़्त आए; छटेंगे बादलों की भाँति गगन, आँधियाँ ज्यों ही विश्व प्रभु लाएँ ! देखलो क्या रहा था उनके मन, जान लो कहाँ […] Read more » कुचल दो कुयाशा की शाखाएँ !