Category: साहित्‍य

व्यंग्य साहित्‍य

मोबाइल की माया, बना इंसानी हमसाया

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हर हाथ के पास काम हो या ना हो लेकिन हर हाथ के पास मोबाइल ज़रूर है। आदमी को अपने वर्क की इतनी चिंता नहीं होती है जितनी मोबाइल नेटवर्क की होती है। फेसबुक, वाट्सएप, इंस्टाग्राम जैसे एप्स से आम आदमी टाइम-पास कर बहुत कुछ फेल करना सीख गया है। गूगल प्ले-स्टोर में जाकर दिमाग पर ज़्यादा लोड लिए कुछ भी डाउनलोड करना आसान है। गूगल स्टोर उस गोदाम की तरह की तरह हो गया है जहाँ उचित दाम पर सब वस्तु आसानी से मिल जाती है। वह दिन दूर नहीं जब गूगल स्टोर इतना "यूजर-फ्रैंडली" हो जाएगा की राशन की सारी चीज़े भी पंसारी की तरह उपलब्ध करवाएगा। ज़्यादा व्यस्तता होने आपातकाल में गूगल स्टोर सुलभता से सुलभ शौचालय का रूप लेकर हल्का करने वाला एप भी ला सकता है। हल्का होना इंसान के बहुत ज़रूरी है क्योंकि जितना हल्कापन होगा सफलता की उड़ान उतनी ही ऊँची होगी।

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कविता साहित्‍य

सुकमा और कुपवाड़ा में शहीद हुए अमर शहीदों को श्रद्धांजलि

| 2 Comments on सुकमा और कुपवाड़ा में शहीद हुए अमर शहीदों को श्रद्धांजलि

व्यथित है मेरी भारत माँ, कैसे छंद प्यार के गाऊँ कैसे मैं श्रृंगार लिखुँ, कैसे तुमको आज हँसाऊ कलम हुई आक्रोशित, शोणित आखर ही लिख पाऊँ वीर शहीदों की शहादत को , शत शत शीश झुकाऊँ   सिंदूर उजड़ गया माथे का, कंगना चूर चूर टूटे शहीद की विधवा के, पायल बिंदिया काजल छूटे हृदय […]

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लेख साहित्‍य

 सबके आदर्श हैं भगवान परशुराम

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राष्ट्रकवि दिनकर ने सन् 1962 ई. में चीनी आक्रमण के समय देश को ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ शीर्षक से ओजस्वी काव्यकृति देकर सही रास्ता चुनने की प्रेरणा दी थी। युगचारण ने अपने दायित्व का सही-सही निर्वाह किया, किन्तु राजसत्ता की कुटिल और अंधी स्वार्थपूर्ण लालसा ने हमारे तत्कालीन नेतृत्व के बहरे कानों में उसकी पुकार ही नहीं आने दी। पाँच दशक बीत गये। इस बीच एक ओर साहित्य में परशुराम के प्रतीकार्थ को लेकर समय≤ पर प्रेरणाप्रद रचनायें प्रकाश में आती रहीं और दूसरी ओर सहस्रबाहु की तरह विलासिता में डूबा हमारा नेतृत्व राष्ट्र-विरोधी षडयन्त्रों को देश के भीतर और बाहर--दोनों ओर पनपने का अवसर देता रहा। परशुराम पर केन्द्रित साहित्यिक रचनाओं के संदेश को व्यावहारिक स्तर पर स्वीकार करके हम साधारण जनजीवन और राष्ट्रीय गौरव की रक्षा कर सकते हैं।

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कला-संस्कृति लेख साहित्‍य

अयोध्या से दक्षिण कोरिया का अटूट पौराणिक सम्बन्ध

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कोरिया के पूर्व राष्ट्रपति किम देई जुंग और पूर्व प्रधानमंत्री हियो जियोंग और जोंग पिल किम कारक वंश से ही संबंध रखते थे। कारक वंश के लोगों ने उस पत्थर को भी सहेज कर रखा है जिसके विषय में यह कहा जाता है कि अयोध्या की राजकुमारी सुरीरत्ना अपनी समुद्र यात्रा के दौरान नाव का संतुलन बनाए रखने के लिए उसे रखकर लाई थी। किमहये शहर में राजकुमारी हौ की प्रतिमा भी है। कोरिया में रहने वाले कारक वंश के लोगों का एक समूह हर साल फरवरी-मार्च के दौरान राजकुमारी सुरीरत्ना की मातृभूमि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने अयोध्या आता है।

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लेख साहित्‍य

राष्ट्रभाषा ही आत्मीय संस्कृति की अस्मिता की जनक ।

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यूरोप के किसी देश में, यह फ्रांस हो या जर्मनी, स्पेन हो या पुर्तगाल, नीदरलैंड हो या पोलैंड । इन देशों में भारतवंशी जब आपस में मिलेंगे तो हिंदुस्तानी में वैसेही बातें करेंगे जिस तरह फ्रेंच से फ्रेंच और जर्मन से जर्मन बिना किसी हीनता ग्रंथि के आपस में संवाद करते हैं । भारतवंशियों को हिंदी भाषा परिवार की बोलियां उसी कोटि की हैं । जैसे फ्रेंच- जर्मन और डच भाषा परिवार की बोलियां । लेकिन यूरोप सहित विश्व के किसी भी देश में यदि कोई 15 - 20 वर्ष से रह रहा भारतीय किसी दूसरे भारतीय से मिलेगा तो वह अंग्रेजी में बातें करेगा। यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि यूरोप सहित अन्य देशों में भारतीयों के कारण हीअंग्रेजी बसर कर रही है ,उस देश के आम नागरिकों के कारण नहीं।

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