व्यंग्य साहित्य ऋषि मुनियों के देश में , अब अऋषि रहे ना कोय May 5, 2017 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment जग मोहन ठाकन बाबा रामदेव जी महाराज को आप चाहे योग गुरु कहें या संयोग गुरु ; उनके “ गुरु” होने में कोई संदेह नहीं रह गया है .बल्कि महागुरू का ताज भी उनके मस्तक पर छोटा प्रतीत होता है . हाँ , इतना भी निश्चित मानिये कि वो समय की नजाकत और नब्ज […] Read more » Featured बाबा रामदेव
आलोचना राजनीति नायक नहीं, खलनायक हूं मैं May 4, 2017 by वीरेंदर परिहार | Leave a Comment वीरेन्द्र सिंह परिहार अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की उत्पत्ति समझे जानें वाले अरविन्द केजरीवाल के मामले में पूर्व में आम लोगों की धारणा आम राजनीतिज्ञों से कुछ अलग किस्म की थी। यह माना गया था कि पेषेवर राजनीतिज्ञों की जगह केजरीवाल भारतीय राजनींति को नई दिषा देंगे। उनकी ‘आप’ पार्टी के बढ़ते ग्राफ […] Read more » AAP AAP Party Arbind Kejriwal Featured kejriwal खलनायक नायक नहीं
लेख शख्सियत साहित्य कविवर टैगोर : कुछ विवाद – कुछ प्रवाद May 4, 2017 by डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री | Leave a Comment रवीन्द्र नाथ टैगोर (7 मई 1861–7 अगस्त 1941), जिन्हें आधुनिक भारत में “ गुरुदेव “ का सम्मान मिला, ऐसे महाकवि, जिन्हें साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला, विश्व के एकमात्र ऐसे कवि जिनके लिखे गीतों को दो भिन्न देशों में “राष्ट्रगान “ का सम्मान मिला, बहु-आयामी व्यक्तित्व के ऐसे धनी जो हर आयाम में शिखर […] Read more » Featured Guru Rabindra Nath tagore गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर टैगोर
कला-संस्कृति लेख साहित्य हिंदू – इस्लामिक पूजा गृह May 4, 2017 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment डा. राधेश्याम द्विवेदी प्रारम्भिक इतिहास :-हिंद इस्लामिक वास्तुकला का प्रारंभ 12वीं शताब्दी के अंत में भारत पर विदेशी कब्ज़े से हुआ। मुसलमानों को सासानी और बिज़ेन्टाइन साम्राज्यों से विभिन्न योजनाओं का खज़ाना विरासत में मिला । सुरूचिपूर्ण इमारतों होने के कारण उन्होंने जिस भी देश पर कब्ज़ा किया, वहां की स्थानीय वास्तुकला को अपने अनुकूल […] Read more » हिंदू - इस्लामिक पूजा गृह
लेख साहित्य बुढ़िया का ताल: ताल भी,एत्माद्खान का मण्डप निवास भी May 2, 2017 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment डा. राधेश्याम द्विवेदी आगरा की भूमि मुगलकालीन राजाओं,बेगमों उच्च पदस्थ लोगों तथा साधु महात्माओं के स्मारकों, महलों ,बाग बगीचों व बगीचियों से भरी पड़ी है।मुगल पूर्व बागों में कैलाश, रेनुकता, सूरकुटी, बृथला व बुढ़िया का ताल आदि प्रमुख हैं। मुगलकालीन बागों की एक लम्बी श्रृंखला यहां देखने को मिलती है।ये मुख्यतः तीन प्रकार के होते […] Read more » बुढ़िया का ताल
व्यंग्य साहित्य मोबाइल की माया, बना इंसानी हमसाया May 2, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment हर हाथ के पास काम हो या ना हो लेकिन हर हाथ के पास मोबाइल ज़रूर है। आदमी को अपने वर्क की इतनी चिंता नहीं होती है जितनी मोबाइल नेटवर्क की होती है। फेसबुक, वाट्सएप, इंस्टाग्राम जैसे एप्स से आम आदमी टाइम-पास कर बहुत कुछ फेल करना सीख गया है। गूगल प्ले-स्टोर में जाकर दिमाग पर ज़्यादा लोड लिए कुछ भी डाउनलोड करना आसान है। गूगल स्टोर उस गोदाम की तरह की तरह हो गया है जहाँ उचित दाम पर सब वस्तु आसानी से मिल जाती है। वह दिन दूर नहीं जब गूगल स्टोर इतना "यूजर-फ्रैंडली" हो जाएगा की राशन की सारी चीज़े भी पंसारी की तरह उपलब्ध करवाएगा। ज़्यादा व्यस्तता होने आपातकाल में गूगल स्टोर सुलभता से सुलभ शौचालय का रूप लेकर हल्का करने वाला एप भी ला सकता है। हल्का होना इंसान के बहुत ज़रूरी है क्योंकि जितना हल्कापन होगा सफलता की उड़ान उतनी ही ऊँची होगी। Read more » "उड़ान" Featured केंद्र सरकार द्वारा सस्ती हवाई यात्रा मोबाइल की माया हमसाया
कविता साहित्य सुकमा और कुपवाड़ा में शहीद हुए अमर शहीदों को श्रद्धांजलि April 30, 2017 by हेमंत कुमावत 'हेमू ' | 2 Comments on सुकमा और कुपवाड़ा में शहीद हुए अमर शहीदों को श्रद्धांजलि व्यथित है मेरी भारत माँ, कैसे छंद प्यार के गाऊँ कैसे मैं श्रृंगार लिखुँ, कैसे तुमको आज हँसाऊ कलम हुई आक्रोशित, शोणित आखर ही लिख पाऊँ वीर शहीदों की शहादत को , शत शत शीश झुकाऊँ सिंदूर उजड़ गया माथे का, कंगना चूर चूर टूटे शहीद की विधवा के, पायल बिंदिया काजल छूटे हृदय […] Read more » कुपवाड़ा में शहीद हुए अमर शहीदों को श्रद्धांजलि शहीद हुए अमर शहीदों को श्रद्धांजलि सुकमा और कुपवाड़ा में शहीद हुए अमर शहीदों को श्रद्धांजलि सुकमा में शहीद हुए अमर शहीदों को श्रद्धांजलि
लेख साहित्य सबके आदर्श हैं भगवान परशुराम April 28, 2017 by डाॅ. कृष्णगोपाल मिश्र | Leave a Comment राष्ट्रकवि दिनकर ने सन् 1962 ई. में चीनी आक्रमण के समय देश को ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ शीर्षक से ओजस्वी काव्यकृति देकर सही रास्ता चुनने की प्रेरणा दी थी। युगचारण ने अपने दायित्व का सही-सही निर्वाह किया, किन्तु राजसत्ता की कुटिल और अंधी स्वार्थपूर्ण लालसा ने हमारे तत्कालीन नेतृत्व के बहरे कानों में उसकी पुकार ही नहीं आने दी। पाँच दशक बीत गये। इस बीच एक ओर साहित्य में परशुराम के प्रतीकार्थ को लेकर समय≤ पर प्रेरणाप्रद रचनायें प्रकाश में आती रहीं और दूसरी ओर सहस्रबाहु की तरह विलासिता में डूबा हमारा नेतृत्व राष्ट्र-विरोधी षडयन्त्रों को देश के भीतर और बाहर--दोनों ओर पनपने का अवसर देता रहा। परशुराम पर केन्द्रित साहित्यिक रचनाओं के संदेश को व्यावहारिक स्तर पर स्वीकार करके हम साधारण जनजीवन और राष्ट्रीय गौरव की रक्षा कर सकते हैं। Read more » भगवान परशुराम
कला-संस्कृति लेख साहित्य अयोध्या से दक्षिण कोरिया का अटूट पौराणिक सम्बन्ध April 28, 2017 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment कोरिया के पूर्व राष्ट्रपति किम देई जुंग और पूर्व प्रधानमंत्री हियो जियोंग और जोंग पिल किम कारक वंश से ही संबंध रखते थे। कारक वंश के लोगों ने उस पत्थर को भी सहेज कर रखा है जिसके विषय में यह कहा जाता है कि अयोध्या की राजकुमारी सुरीरत्ना अपनी समुद्र यात्रा के दौरान नाव का संतुलन बनाए रखने के लिए उसे रखकर लाई थी। किमहये शहर में राजकुमारी हौ की प्रतिमा भी है। कोरिया में रहने वाले कारक वंश के लोगों का एक समूह हर साल फरवरी-मार्च के दौरान राजकुमारी सुरीरत्ना की मातृभूमि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने अयोध्या आता है। Read more » अयोध्या दक्षिण कोरिया राजकुमारी सुरीरत्ना
कविता साहित्य किलकि चहकि खिलत जात ! April 27, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment किलकि चहकि खिलत जात ! किलकि चहकि खिलत जात, हर डालन कलिका; बागन में फागुन में, पुलक देत कहका ! केका कूँ टेरि चलत, कलरव सुनि मन चाहत; मौन रहन ना चहवत, सैनन सब थिरकावत ! चेतन जब ह्वै जावत, उर पाँखुड़ि खुलि पावत; अन्दर ना रहि पावत, बाहर झाँकन चाहत ! मोहत मोहिनी होवत, […] Read more » किलकि चहकि खिलत जात
कविता साहित्य आज मेरे देश की ज़मीं जी भर के रोई है, April 26, 2017 / April 26, 2017 by हिमांशु तिवारी आत्मीय | Leave a Comment हिमांशु तिवारी आत्मीय अपने लाल की फिक्र में वो न रात सोई है, हौले से उठाती है वो अपना आंचल, सूखे हुए आंसुओं से भी तलाश लेती है हर दर्द उसका, वो उंगलियां थामकर चलता था, हर तकलीफ में उसे मां याद आती थी, नींद न आती तो मां उसे लोरियां सुनाती थी, कई […] Read more » आज मेरे देश की ज़मीं जी भर के रोई है
लेख साहित्य राष्ट्रभाषा ही आत्मीय संस्कृति की अस्मिता की जनक । April 25, 2017 / April 25, 2017 by प्रो. पुष्पिता अवस्थी | Leave a Comment यूरोप के किसी देश में, यह फ्रांस हो या जर्मनी, स्पेन हो या पुर्तगाल, नीदरलैंड हो या पोलैंड । इन देशों में भारतवंशी जब आपस में मिलेंगे तो हिंदुस्तानी में वैसेही बातें करेंगे जिस तरह फ्रेंच से फ्रेंच और जर्मन से जर्मन बिना किसी हीनता ग्रंथि के आपस में संवाद करते हैं । भारतवंशियों को हिंदी भाषा परिवार की बोलियां उसी कोटि की हैं । जैसे फ्रेंच- जर्मन और डच भाषा परिवार की बोलियां । लेकिन यूरोप सहित विश्व के किसी भी देश में यदि कोई 15 - 20 वर्ष से रह रहा भारतीय किसी दूसरे भारतीय से मिलेगा तो वह अंग्रेजी में बातें करेगा। यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि यूरोप सहित अन्य देशों में भारतीयों के कारण हीअंग्रेजी बसर कर रही है ,उस देश के आम नागरिकों के कारण नहीं। Read more » Featured आत्मीय संस्कृति की अस्मिता की जनक । राष्ट्रभाषा