Category: विविधा

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धर्माधारित आतंकवाद –एक सच्चाई”

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सन 2008 में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि तालिबान व अलक़ायदा आदि जिहादी संगठन पाक व अफगानिस्तान की सीमाओ पर अनेक छोटे छोटे बच्चों को धन देकर व जन्नत का वास्ता देकर "फिदायींन" बनाते है। तालिबान ने "फिदायीन-ए-इस्लाम" नाम से वजीरिस्तान में तीन ऐसे प्रशिक्षण शिविर तैयार किये हुए है जिसमें हज़ारो की संख्या में कम आयु (10 से 13 वर्ष) के मासूम मुस्लिम बच्चे प्रशिक्षण पा रहें है। अफगानिस्तान की तत्कालीन सरकार के अनुसार इन बच्चों को चौदह हज़ार से साठ हज़ार डॉलर में खरीदा जाता है और इनके माँ-बाप को समझाया जाता है कि धन के अतिरिक्त आपका बेटा इस्लाम के लिये शहीद होकर सीधे जन्नत पहुँचेगा।

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विविधा शख्सियत सिनेमा

समर्पित अभिनेता और राजनेता की तरह हमेशा याद किये जाएंगे विनोद खन्ना 

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विनोद खन्ना ने अपने राजनैतिक कैरियर की शुरुआत भाजपा से की। विनोद खन्ना 1997 में पहली बार पंजाब के गुरदासपुर क्षेत्र से भाजपा की ओर से सांसद चुने गए। इसके बाद 1999 के लोकसभा चुनाव में गुरदासपुर लोकसभा से ही दूसरी बार जीतकर संसद पहुंचे। विनोद खन्ना को 2002 में अटल बिहारी वाजपेई सरकार में संस्कृति और पर्यटन के केंद्रीय मंत्री बनाया गया। 6 महीने के बाद उनका विभाग बदलकर उनको अति महत्वपूर्ण विदेश मामलों के मंत्रालय में राज्य मंत्री बना दिया गया। 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने गुरदासपुर लोकसभा सीट से फिर से चुनाव जीता। हालांकि, 2009 के लोकसभा चुनाव में विनोद खन्ना को हार का सामना करना पड़ा। लेकिन एक बार फिर 2014 लोकसभा चुनाव में विनोद खन्ना गुरदासपुर लोकसभा से चैथी बार चुनाव जीतकर संसद पहुंचे।

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निजी अनुभवों की सांझ-2

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बिजली की चोरी होती है-कर्मचारियों की कृपा से! सरकारी प्रयास होते हैं-मीटर लगाने के, जिससे इसे रोका जा सके। किंतु सारे प्रयास निरर्थक हो जाते हैं। कानून बनाये जाते हैं, मानव की दुष्प्रवृत्तियों को सद्प्रवृत्तियों में परिवर्तित करने के लिए। पर एक समय आता है कि कानून की तनी हुई चादर में से भी छिद्र कर दिये जाते हैं और कानून की ओजोन की परत को तोडक़र मानवीय स्वभाव की पराबैंगनी किरणें सीधे पडक़र मानव को ही तंग व परेशान करती हैं। यह सांप छछूंदर का खेल है, जिसमें कानून व्यक्ति को गलत कार्यों को करने से रोकना चाहता है और व्यक्ति उल्टे कानून के बढ़ते हाथों को (अपनी ओर बढऩे से) रोकना चाहता है।

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महंगी होती चुनावी व्यवस्था

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हमें इस समय अपनी चुनावी प्रक्रिया में व्यापक सुधारों की आवश्यकता है। इसके लिए उचित होगा कि देश में लोकसभा और विधानसभाओं सहित अधिकतर चुनाव एक साथ कराने की व्यवस्था पर गंभीरता से विचार किया जाए। इससे हम चुनावों पर व्यय होने वाली बड़ी धनराशि को बचा सकते हैं। चुनाव आयोग को बार-बार सरकारी कर्मियों को उनके सरकारी कार्य रूकवाकर उन पर अपना डंडा चलाने का अधिकार अभी लगभग वर्ष भर कहीं न कहीं मिला रहता है। यदि चुनाव एक साथ होते हैं तो चुनाव आयोग सरकारी कर्मियों का कार्य रूकवाने से दूर रहेगा।

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जीवित मनुष्य से बढ़कर हैं नदियाँ

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नदियों के संरक्षण के प्रति समाज को जागरूक करने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री दुनिया के सबसे बड़े नदी संरक्षण अभियान 'नमामि देवी नर्मदे : सेवा यात्रा' का संचालन कर रहे हैं। जनसहभागिता से प्रत्येक दिन नर्मदा के किनारे नदी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति समाज को जागरूक करने के लिए बड़े-बड़े आयोजन किए जा रहे हैं। नर्मदा सेवा यात्रा के अंतर्गत इन आयोजनों में देश-दुनिया के अलग-अलग विधा के प्रख्यात लोग आ चुके हैं। इसी सिलसिले में मण्डला में आयोजित जन-संवाद कार्यक्रम में शामिल होने गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी पहुँचे।

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कला-संस्कृति विविधा

संस्कृति

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सलाद-बाउल प्रारुप में देश की विभिन्न संस्कृतियाँ सलाद के घटकों की तरह पास-पास में रहते हुए अपनी खासियतें बरकरार रखती हैं। अब यह प्रारूप राजनीतिक रूप से अधिक सही एवम् सम्माननीय माना जाता है, क्योंकि यह हर विशिष्ट संस्कृति को अभिव्यक्ति देता है। इस विचारधारा के हिमायतियों का दावा है कि परिपाचनवाद आप्रवासियों को उनकी संस्कृति से विच्छिन्न कर देता है, जब कि यह समझौतावादी विचारधारा उनके और उनकी बाद की पीढ़ियों के लिए अपने मेजबान राष्ट्र के प्रति निष्ठा को सर्वोपरि रखते हुए अपने वतन की संस्कृति के साथ जुड़े रहने की राह हमवार कर देती है। मेजबान और मूल राष्ट्र तथा निष्ठा और सुविधावाद के बीच इस किस्म का नाजुक सन्तुलन कायम रखा जा सकता है या नहीं, यह तो देखने की बात होगी।

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‘अपने ही लोगों ‘ के सामने घुटने टेकने को मजबूर है सरकार

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केंद्र सरकार को चाहिए कि वो नक्सलवाद के उन्मूलन की दिशा में गंभीरता से सोचे, सिर्फ बैठकें कर लेने और मीडिया के सामने बयानबाजी कर देने से इस समस्या का समाधान नहीं होने वाला है । ठोस कार्रवाई वक्त की मांग है। देश के मंत्रीगण – राजनेता और आला – अधिकारी किसी बड़े नक्सली हमले के बाद शहीदों के शवों पर श्रद्धाञ्जलि के नाम पर फूलों का बोझ ही तो बढ़ाने जाते हैं ? और नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए लम्बी – चौड़ी मगर खोखली बातें करते हैं । लेकिन जब नक्सलवाद के खिलाफ ठोस रणनीति या कार्रवाई करने का समय आता है तो हमारे नेता ” गांधीवादी राग ” अलापने लगते हैं।

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