Category: विविधा

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देवभूमि कश्मीर का अहिंदुकरण

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कश्मीरी हिन्दुओं को पुनः कश्मीर में बसाने के लिये व पाकिस्तान से आये शरणार्थी हिन्दुओं को वहां के सामान्य नागरिक अधिकार दिलवाने के लिये अनेक कठोर उपाय करने होंगे।अलगाववादियों व आतंकवादियों के कश्मीर व पीओके आदि के सभी ठीकानों व प्रशिक्षण केंद्रों को नष्ट करना होगा। बंग्ला देशी ,म्यंमार, पाकिस्तान,अफगानिस्तान आदि के मुस्लिम घुसपैठियों व आतंकियों को कठोरता से बाहर निकालना होगा। वहां के आतंकियो के स्लीपिंग सेलो व ओवर ग्राउंड वर्कर्स को भी चिन्हित करके उनको बंदी बनाना होगा।

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व्यग्र न हों – मोदी पर विश्वास रखें

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जैसा कि इस आलेख के प्रथम पक्ष में ही मैंने चाणक्य का उद्धरण देकर बताया कि हमें स्वयं को साधकर सटीक समय पर अपना सर्वोत्तम करना होगा. आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है. और आज के समय की सबसे दुखद परिस्थिति यही है कि हमारी पीढ़ी कुछ अधिक व्यग्र है, वह कुछ अधिक ही हावी होनें के प्रयास में भी रहती है किंतु इस क्रम में आगे बढ़ते हुए वह स्वनियंत्रण को ही खो बैठती है जो इस समय की मूल ही नहीं अपितु परम आवश्यक आवश्यता रहती है. हम देख रहें हैं कि पाकिस्तान द्वारा हमारें सैनिकों के साथ पाशविक आचरण के बाद मीडिया पर और विशेषतः सोशल मीडिया द्वारा नरेंद्र मोदी नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर जिस तरह का बदला लेनें का मानसिक दबाव बना दिया गया है. लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित किसी भी सरकार के लिए ऐसा जनदबाव खतरनाक साबित हो सकता है, वो तो अच्छा है कि मोदी सरकार और उसके विभिन्न भाग व अंग इस जनदबाव के समक्ष भी अपनें विवेक व दायित्वबोध को यथा स्थान, यथा समय व यथा संतुलन समायोजित किये हुए है.

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कश्मीर का बिना शर्त भारत में पूर्ण विलय , फिर अनुच्छेद 370 का क्या औचित्य…❔

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इस अनुच्छेद का अधिकांश लाभ सामान्य जनता को नही केवल वहां के सत्ताधारियों व अलगाववादियों को ही मिल रहा है । इसके कारण अलगाववादियों, आतंकियों एवं भारतीय ध्वज व संविधान का अपमान करने वालो पर कठोर कार्यवाही भी नही हो पाती । सन 2002 में पूरे देश मे लोकसभा क्षेत्रो का पुनर्गठन हुआ था पर इस विवादित अनुच्छेद के चलते यह जम्मू-कश्मीर में नही हो सका। क्या ऐसे में भारतीय संसद की भूमिका वहां अप्रसांगिक नही हो गई ? अतः यह विचार करना होगा कि अनुच्छेद 370 के होते वहां के सामान्य नागरिको को क्या लाभ हुआ और अगर देश के अन्य कानून वहां लागू होते तो उन्हें कितना लाभ होता ?

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गरीबों को मिल सकेगे सस्ते घर

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एंटी भू माफिया अभियान के बाद एक के बाद सफेदपोश नेताओं व बाबुओं के चेहरे से नकाब उतर सकता हैं । यही कारण है कि अपने आप को बचाने के लिए अब सभी लोग महागठबंधन की बात करने लग गये हैं। ईवीएम की आलोचना होने लग गयी हे लोग अपनी गलतियों को सुधारने का प्रयास नहीं कर रहे हैं अपितु ओर अधिक गलतियां लगातार कर रहे है। यदि कहीं प्रदेशभर के विपक्ष ने नोटबंदी की तरह एंटी भू- माफिया अभियान का भी विरोध करना शुरू कर दिया तो यह दल अगले चुनावों में एक - एक सीट ही नहीं वोट के लिए भी तरस जायेंगे।

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“यह कैसा विधान…. पत्थरबाज भी नही आते बाज…”⁉

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विश्व के सभी देश अपने अपने नागरिकों के महत्व को समझते है और उसकी रक्षा के साथ साथ उसके समस्त मौलिक अधिकारों को यथा संभव सुरक्षा प्रदान करने के लिए संकल्पित है। परंतु हम सत्तर वर्ष के अपने स्वतंत्र राष्ट्र में इतने बौने हो गए है कि सैनिको का मान-मर्दन होता रहें और हम चिंता व निंदा करके केंडिल मॉर्च से अपने अपने दायित्व से मुक्त हों कर मीडिया में श्रद्धांजलियां देते हुए छपते रहना चाहते है । आज के सोशल मीडिया ने तो इस चलन की बाढ़ आती जा रही है ,यह कैसी राष्ट्रपरायणता है जो मानवीय संवेदनाओं से भी प्रचार की होड़ करवाती है । क्या पीड़ित हृदयो में आंसुओ का अकाल हो गया है या ह्र्दय ही इतना कठोर होता जा रहा है कि हमारी सुरक्षा में लगे इन सैनिकों को आक्रोशित हों कर भी आत्मग्लानि में जीने को विवश होना पड़ें ?

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