Category: विविधा

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‘नोटबंदी’ के बाद ‘बत्ती बंदी’ यानी बड़ा फैसला…

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अब बात करें राज्य सरकारों की तो, केन्द्र की भांति राज्य सरकार इस पर फैसला खुद लेगी,लेकिन माना जा रहा है कि केन्द्रीय फैसले के बाद राज्यों पर इसे लागू करने का दबाव रहेगा। दरअसल खासकर भाजपा शासित राज्यों पर इसका सीधा असर आएगा। हालांकि,पहले बहुत सारे मंत्री 'लालबत्ती' होने के पक्ष में बयान देते रहे हैं,तो अब इसे छोड़ने से उनके दिल में कसक तो रहेगी,पर इसे जनहित में सही समय पर लिया गया स्वस्थ निर्णय मानना इनकी भी मजबूरी है। यदि फैसले की खिलाफत की तो सम्भव है कि,पीएम ऐसे मंत्रियों को पुराने नोट की तरह अनुपयोगी कर दें।

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उत्तराखंड में जल संकट :चुनोतियाँ व समाधान की दिशा में प्रयास

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वास्तव में पेयजल संकट आगामी भविष्य के लिए एक चुनोतिपूर्ण विषय है । इस जटिल समस्या के निवारण के लिए हमें केवल सरकारी नीतियों के भरोशे न बैठकर जनता को भी जागरूक करना होगा जिससे हम प्रकृति द्वारा प्रदत्त इस मूल्यवान संसाधन को अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए संजोकर रख पाएं। गाँवो से शहरो की तरफ होने वाले तीव्र पलायन के कारण शहरो पर अतरिक्त जनसंख्या दवाब बढ़ रहा है इस जनसंख्या दवाब के कारण शहरो में पेयजल की किल्लत साफ़ नज़र आती है । उत्तराखंड के अनेक इलाके ऐसे है जहाँ पानी भरने के लिए लोगो को घण्टों भर लाइन में रहना पड़ता है यह समस्या केवल शहरो में ही नही बल्कि उत्तराखंड के अनेक पहाड़ी गाँवो की भी है जहा आज भी महिलाए किलोमीटर दूर पैदल चलकर पानी लाकर अपनी आवश्यकताओ को पूरा करती है ।

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गांधीवाद की परिकल्पना-7

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नैतिक मूल्यों के आधार बनाकर भी गांधीवाद का एक धूमिल चित्र भारत में गांधीवादियों ने खींचने का प्रयास किया है। गांधीजी भारतीय राजनीति को धर्महीन बना गये। वह उसे संप्रदाय निरपेक्ष नहीं बना सके, अपितु उसे इतना अपवित्र करन् दिया है कि वह सम्प्रदायों के हितों की संरक्षिका सी बन गयी जान पड़ती है। इससे भारतीय राजनीति पक्षपाती बन गयी। जहां पक्षपात हो वहां नैतिक मूल्य ढूंढऩा 'चील के घोंसले में मांस ढूढऩे के बराबर' होता है। नैतिक मूल्य, नीति पर आधारित होते हैं नीति दो अक्षरों से बनी है-नी+ति। जिसका अर्थ है एक निश्चित व्यवस्था। नीति निश्चित व्यवस्था की संवाहिका है, ध्वजवाहिका है और प्रचारिका है।

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गांधीवाद की परिकल्पना- 5

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गांधीजी को लोकतंत्र का प्रबल समर्थक भी कहा जाता है। उनके चहेते शिष्य जवाहरलाल ने इस बात का बहुत बढ़-चढक़र प्रचार किया। जबकि उस समय की परिस्थिति गत साक्ष्य यह सिद्घ कर रहे हैं कि गांधीजी का लोकतंत्र में नही अपितु अधिनायकवाद में दृढ़ विश्वास था। अब संक्षिप्त चर्चा इस पर करते हैं। भारतीय समाज में ऐसे व्यक्ति को बुद्घिमान माना जाता है जो देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार उचित निर्णय लेने में सक्षम और समर्थ होता है तथा अपने कार्य को निकालने में सफल होता है। गांधीजी भारतीय समाज व संस्कृति के इस तात्विक सिद्घांत को पलट देना चाहते थे।

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गरीबों के हित में दवा नीति का बनना

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नामी-गिरामी कंपनियों की दवाओं की कीमत काफी अधिक होती हैं। जबकि उन्हीं रासायनिक सम्मिश्रणों वाली दवाएं अगर जेनरिक श्रेणी की हों तो वे काफी कम कीमत में मिल सकती हैं। ये दवाएं वैसा ही असर करती हैं जैसा ब्रांडेड दवाएं। समान कंपोजीशन यानी समान रासायनिक सम्मिश्रण होने के बावजूद इनके निर्माण पर बहुत कम खर्च आता है। इनके प्रचार-प्रसार पर बेहिसाब धन भी नहीं खर्च किया जाता, इसलिए भी इनकी कीमतें काफी कम होती हैं। लेकिन दवा बाजार पर निजी कंपनियों के कब्जे का जो पूरा संजाल है, उसमें जेनरिक दवाओं की उपलब्धता इतनी कम है कि उसका लाभ बहुत-से जरूरतमंद लोग नहीं उठा पाते।

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