शिकागो संभाषण – भारत के विश्वगुरु बनने का मार्ग
Updated: September 10, 2018
प्रवीण गुणगानी स्वामी विवेकानंद जी ने भारत को व भारतत्व को कितना आत्मसात कर लिया था, यह कविवर रविन्द्रनाथ टैगोर के इस कथन से समझा…
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ऐसे डॉक्टरों की डिग्रियां छीन लें
Updated: September 10, 2018
डॉ. वेदप्रताप वैदिक किसी भी राष्ट्र को संपन्न और शक्तिशाली बनाने के लिए सबसे जरुरी दो चीजें होती हैं। शिक्षा और चिकित्सा। हमारे नेताओं ने…
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कहाँ जाने का समय है आया !
Updated: September 10, 2018
(मधुगीति १८०८०१ अ) कहाँ जाने का समय है आया, कहाँ संस्कार भोग हो पाया; सृष्टि में रहना कहाँ है आया, कहाँ सृष्टि से योग हो पाया ! सहोदर जीव कहाँ हर है हुआ, समाधि सृष्ट कहाँ हर पाया; समादर भाव कहाँ आ पाया, द्वैत से तर है कहाँ हर पाया ! बीज जो बोये दग्ध ना हैं हुए, जीव भय वृत्ति से न मुक्त हुए; भुक्त भव हुआ कहाँ भव्य हुए, मुक्ति रस पिया कहाँ मर्म छुए ! चित्त चितवन में कहाँ है ठहरा, वित्त स्वयमेव कहाँ है बिखरा; विमुक्ति बुद्धि है कहाँ पाई, युक्ति हो यथायथ कहाँ आई ! नयन स्थिर चयन कहाँ कीन्हे, कहाँ मोती हैं हंसा ने बीने; कहाँ ‘मधु’ उनकी शरण आ पाया, पकड़ हर चरण कमल कब पाया ! रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’
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“भौतिकवाद से हमारी मानवीय संवेदनायें घटती हैं जिन्हें आध्यात्मिकता से सन्तुलित कर जीवन को सुखी बना सकते हैं”
Updated: September 10, 2018
मनमोहन कुमार आर्य, भौतिकवाद आध्यात्मवाद का विलोम शब्द है। पृथिवी, अग्नि, जल, वायु और आकाश को भौतिक पदार्थ कहते हैं। इसमें ईश्वर व जीवात्मा सम्मिलित…
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अब “मोमो चैलेंज” गेम बना बच्चों की मौत का सौदागर
Updated: September 10, 2018
अनिल अनूप लुधियाना, 9 सितंबर .मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी), उच्च शिक्षा विभाग, ने स्कूल शिक्षा विभाग को सलाह दी है कि ऑनलाइन गेम ‘मोमो…
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ज्वार उठाना होगा, मस्तक कटाना होगा
Updated: September 10, 2018
कवि आलोक पाण्डेय समर की बेला है वीरों अब संधान करो, शत्रु को मर्दन करने को, त्वरित अनुसंधान करो | मातृभू की खातिर फिर लहू…
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महीने के चार दिन वो खुद से लड़ती है
Updated: September 10, 2018
लेखक : आदर्श गौतम महीने के चार दिन वो खुद से लड़ती है, खुद को अकेला समझती है, तकलीफ में रहती है, रोती है, बिलखती…
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सर्वोच्च न्यायालय और तुष्टीकरण
Updated: September 10, 2018
बिपिन किशोर सिन्हा ऐसा लगता है कि जब से कांग्रेस ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ अवमानना की नोटिस दी…
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हिंदी भाषा के हृदय का दर्द
Updated: September 10, 2018
मैं भारत से हिन्दी बोल रही हूँ अपने ह्रदय की पीड़ा खोल रही हूँ मेरी आवाज कोई नही यहाँ सुनता है अंग्रेजी भाषा का जाल…
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जातिवाद के दलदल में फंसी हमारी राजनीति
Updated: September 8, 2018
डॉ. वेदप्रताप वैदिक अजा जजा अत्याचार निवारण कानून को लेकर कभी अनुसूचित जाति-जनजाति द्वारा और कभी सवर्णों द्वारा बार-बार भारत बंद का जो नारा दिया…
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क्यों बनती हाई प्रोफ़ाइल लड़कियां काल गर्ल
Updated: September 8, 2018
-अनिल अनूप कई समय से कालगर्ल के धंधे के बारे में जानने की जिज्ञासा थी कि क्यों हाई सोसाइटी में रहने वाली लड़कियां इसे…
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है ज्ञान औ अज्ञान में !
Updated: September 8, 2018
(मधुगीति १८०८२७ ब) रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’ है ज्ञान औ अज्ञान में, बस भेद एक अनुभूति का; एक फ़ासला है कर्म का, अनुभूत भव की द्रष्टि का ! लख परख औ अनुभव किए, जो लक्ष हृदयंगम किए; परिणिति क्रिया की पा सके, फल प्राप्ति परिलक्षित किए ! जो मिला वह कुछ भिन्न था, सोचा था वह वैसा न था; कुछ अन्यथा उर लग रहा, पर प्रतीति सुर दे रहा ! आभोग का सागर अगध, उपलब्धि की गागर गहन; जिमि ब्रह्म में मिल फुरके मन, जग बोध करता सहज क्षण ! जो अजाने को जानता, उसका जगत पहचानता; ‘मधु’ के रचयिता रासता, उनकी प्रभा सब भासता !
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