सुनते हैं आ गया है नया साल इन दिनों कुछ की बदल गयी है देखो चाल इन दिनों जो हाथ मिलाते थे अदब से करें आदाब अब पूछते नहीं हमारा हाल इन दिनों सुनते हैं आ गया है नया साल इन दिनों।।
क्या बात है मचा है क्यो बवाल इन दिनों पूंजीपती ही देखो मालामाल इन दिनों सड़कों पे उतरते हैं क्यों दम तोड़ते किसान क्यो कर रहे किसान को बेहाल इन दिनों सुनते हैं आ गया है नया साल इन दिनों।।
सबका ही सो गया भविष्य काल इन दिनों सुनते हैं इक नया कोरोनाकाल इन दिनों मरते रहें मजदूर साहबान क्या करें मखमल की सेज पर करें धमाल इन दिनों सुनते हैं आ गया है नया साल इन दिनों।।
दीपक जला दिये हैं पीटे थाल इन दिनों खुलते न थे जो हाथ ठोंके ताल इन दिनों क्या क्या न किया हमने तुम पे करके भरोसा लेकिन हुए हैं देख लो कंगाल इन दिनों सुनते हैं आ गया है नया साल इन दिनों।।
तपसी भी झेलते दिखे जंजाल इन दिनों उलझे हैं सुन्दरी के रूप जाल इन दिनों साधू हो या फ़कीर या हो औलिया कोई किरदार पर ही उठ रहे सवाल इन दिनों सुनते हैं आ गया है नया साल इन दिनों।।
इस ठंड में खुद का रखो ख्याल इन दिनों चादर फटी पुरानी रख संभाल इन दिनों कपड़े खरीदने की भी हिम्मत नहीं रही नये साल में ओढ़े पुराना शाल इन दिनों सुनते हैं आ गया है नया साल इन दिनों।।
नफ़रत को छोड़ दिल में प्यार पाल इन दिनों शादी हुई रख बीबी को खुशहाल इन दिनों जो हैं कुंवारे ऐ खुदा! तू थाम उनका हाथ हल्दी से पीले मेंहदी से कर लाल इन दिनों सुनते हैं आ गया है नया साल इन दिनों।।
‘एहसास’ है, बचा है बस कंकाल इन दिनों कम हो गया उमर का अब इक साल इन दिनों अब हो गयी है महंगी सब्जी दाल इन दिनों ज़िन्दा हैं और जी रहे हर हाल इन दिनों सुनते हैं आ गया है नया साल इन दिनों।।
ऋषि दयानन्द सरस्वती जी का सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ देश देशान्तर में प्रसिद्ध ग्रन्थ है। ऋषि दयानन्द ने इस ग्रन्थ को क्यों लिखा? इसका उत्तर उन्होंने स्वयं इस ग्रन्थ की भूमिका में दिया है। उन्होंने लिखा है कि ‘मेराइसग्रन्थकेबनानेकामुख्यप्रयोजनसत्य–सत्यअर्थकाप्रकाशकरनाहै, अर्थात्जोसत्यहैउसकोसत्यऔरजोमिथ्याहैउसकोमिथ्याहीप्रतिपादनकरनासत्यअर्थकाप्रकाशसमझाहै।वहसत्यनहींकहाताजोसत्यकेस्थानमेंअसत्यऔरअसत्यकेस्थानमेंसत्यकाप्रकाशकियाजाये।किन्तुजोपदार्थजैसाहै, उसकोवैसाहीकहना, लिखनाऔरमाननासत्यकहाताहै।जोमनुष्यपक्षपातीहोताहै, वहअपनेअसत्यकोभीसत्यऔरदूसरेविरोधीमतवालेकेसत्यकोभीअसत्यसिद्धकरनेमेंप्रवृत्तरहताहै, इसलियेवहसत्यमतकोप्राप्तनहींहोसकता।इसीलिएविद्वान्आप्तोंकायहीमुख्यकामहैकिउपदेशयालेखद्वारासबमनुष्चोंकेसामनेसत्यासत्यकास्वरूपसमर्पितकरदें, पश्चात्वेस्वयम्अपनाहितअहितसमझकरसत्यार्थकाग्रहणऔरमिथ्यार्थकापरित्यागकरकेसदाआनन्दमेंरहें।’ इसी क्रम में ऋषि दयानन्द ने भूमिका में ही यह भी कहा है कि ‘मनुष्यकाआत्मासत्यासत्यकाजाननेवालाहैतथापिअपनेप्रयोजनकीसिद्धि, हठ, दुराग्रहऔरअविद्यादिदोषोंसेसत्यकोछोड़असत्यमेंझुकजाताहै।परन्तुइसग्रन्थ (सत्यार्थप्रकाश) मेंऐसीबातनहींरक्खीहैओरनकिसीकामनदुखानावाकिसीकीहानिपरतात्पर्यहै, किन्तुजिससेमनुष्यजातिकीउन्नतिऔरउपकारहो, सत्यासत्यकोमनुष्यलोगजानकरसत्यकाग्रहणऔरअसत्यकापरित्यागकरें, क्योंकिसत्योपदेशकेविनाअन्यकोईभीमनुष्यजातिकीउन्नतिकाकारणनहींहै।’
ऋषिदयानन्दनेसत्यार्थप्रकाशग्रन्थकीरचनासत्यसत्यअर्थकाप्रकाशकरनेकेलिएकीहै।यहइसलियेआवश्यकहुईहैकिउनकेसमयमेंसंसारमेंअनेकानेकमत–मतान्तरप्रचलितथेजिसमेंसत्यकोअसत्यवअसत्यकोसत्यमानाजाताथा।आवश्यकताथीकिसत्यवअसत्यदोनोंकोमनुष्योंकेसम्मुखप्रस्तुतकियाजायेजिससेलोगसत्यवअसत्यकोजानकरसत्यकाग्रहणऔरअसत्यकात्यागकरअपनीआत्मावजीवनकीउन्नतिकरसकें।ऐसाकरनाइसलिएआवश्यकथाक्योंकिसत्यकेज्ञान, इसकेग्रहणवधारणसहितसत्यकेआचरणवपालनकरनेसेहीमनुष्यकीउन्नतिऔरऐसानकरनेसेपतनहोताहै। असत्य के प्रसार से मनुष्य सहित समाज व देश को भी हानि होती है। अतः सत्य का उद्घाटन करने तथा असत्य को भी जन साधारण को बताने के लिये ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश की रचना की थी। इसको इस प्रकार भी कह सकते हैं कि ऋषि दयानन्द ने अविद्या का नाश कर विद्या की वृद्धि करने के लिये इस ग्रन्थ की रचना की जिससे सभी समुदायों व सम्प्रदायों के लोग लाभान्वित हो सकें और अपने अपने जीवन की उन्नति कर सकें। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में चैदह समुल्लासों में अपनी समस्त सामग्री को प्रस्तुत किया है। 10 समुल्लास पूर्वार्द्ध में हैं जिनमें वैदिक मान्यताओं को प्रस्तुत कर उनका मण्डन किया गया है। यह सभी मान्यतायें उन्हें स्वीकार्य थी और ऐसा ही सबको करना चाहियें क्योंकि यह मान्यतायें ईश्वर के ज्ञान वेदों पर आधारित हैं। ईश्वर ने ही अपने सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता तथा सर्वशक्तिमतता से इस सृष्टि को बनाया है तथा वही इसका पालन पोषण कर रहा है। ईश्वर को सृष्टि बनाने व चलाने का पूरा पूरा ज्ञान है। अतः उसका प्रदान किया हुआ वेदज्ञान सर्वांश में सत्य तथा अविद्या आदि दोषों से सर्वथा मुक्त है। सत्यार्थप्रकाश के उत्तरार्ध के चार समुल्लास में स्वदेशीय तथा नास्तिक, बौद्ध व जैन मतों की समीक्षा सहित ईसाई व यवन मत की प्रमाणों के साथ परीक्षा व समीक्षा की गई है। इससे यह लाभ होता है कि साधारण मनुष्य इसे पढ़कर सत्य को प्राप्त हो सकते हैं और वह अपने विवेक व हिताहित का विचार कर असत्य का त्याग और सत्य का ग्रहण कर अपने जीवन को सार्थक व सुखी कर सकते हैं। सत्यार्थप्रकाश की समाप्ति पर ऋषि दयानन्द ने परिशिष्ट रूप में ‘स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश’ के अन्तर्गत वेदों पर आधारित अपने 51 सत्य सिद्धान्तों को संक्षिप्त परिभाषा देकर प्रस्तुत किया है। इसमें मनुष्य, ईश्वर, वेद, धर्म, अधर्म, जीव, ईश्वर-जीव सम्बन्ध, अनादि पदार्थ, सृष्टि का प्रवाह से अनादि होना, सृष्टि, सृष्टि रचना का प्रयोजन, बन्धन, मुक्ति, मुक्ति के साधन आदि कुल 51 विषयों को परिभाषित किया गया है।
ऋषिदयानन्दकोसत्यार्थप्रकाशग्रन्थलिखनेकीआवश्यकताइसलिएहुईक्योंकिसभीमत–मतान्तरएकदूसरेकाविरोधकरतेथेऔरप्रायःसभीमेंअसत्यवअविद्यासेयुक्तमान्यतायें, कथनवसिद्धान्तविद्यमानथे।बहुतसीआवश्यकज्ञानपूर्णबातोंकामत–मतान्तरोंकीशिक्षाओंमेंअभावभीथा।इसआवश्यकताकोऋषिनेसत्यार्थप्रकाशग्रन्थलिखकरपूराकियाहै।सत्यार्थप्रकाशकेप्रथमसमुल्लासमेंईश्वरकेएकसौसेअधिकनामोंकीव्याख्याहै।दूसरेसमुल्लासमेंबालशिक्षातथाभूतप्रेतनिषेद्धकावर्णनकियागयाहै।तृतीयसमुल्लासमेंअध्ययन–अध्यापन, गुरुमन्त्रव्याख्या, प्राणायाम, सन्ध्यावअग्निहोत्र, उपनयन, ब्रह्मचर्यउपदेश, पठनपाठनकीविशेषविधि, ग्रन्थोंकेप्रमाणवअप्रमाणकाविषयतथास्त्रीवशूद्रोंकेअध्ययनवअधिकारआदिकाविषयविस्तारसेप्रस्तुतकियाहै। चतुर्थ समुल्लास में समावर्तन, विवाह, गुण-कर्म-स्वभाव के अनुसार वर्णव्यवस्था, स्त्री पुरुष व्यवहार, पंचमहायज्ञ, पाखण्डियों के लक्षण, गृहस्थधर्म, पण्डित के लक्षण, मूर्ख मनुष्यों के लक्षण, पुनर्विवाह, नियोग आदि विषयों का सयुक्तिक प्रमाणिक विवरण है। पांचवे समुल्लास में वानप्रस्थ तथा संन्यास आश्रम पर प्रकाश डाला गया है। छठे समुल्लास में राजधर्म, दण्ड व्यवस्था, राजपुरुषों के कर्तव्यों, युद्ध, देश की रक्षा, कर ग्रहण तथा व्यापार आदि का वर्णन है। सातवें समुल्लास में ईश्वर, ईश्वर स्तुति, प्रार्थना, उपासना सहित ईश्वरीय ज्ञान, ईश्वर के अस्तित्व, जीव की स्वतन्त्रता तथा वेदों के विषयों पर वैदिक मान्यताओं को प्रस्तुत कर युक्ति एवं तर्कों के साथ उनका पोषण किया गया है। सत्यार्थप्रकाश के आठवें समुल्लास में सृष्टि की उत्पत्ति, सृष्टि के उपादान कारण प्रकृति, मनुष्यों की आदि सृष्टि के स्थान का निर्णय, आर्य मलेच्छ व्याख्या तथा ईश्वर के द्वारा जगत को धारण करने का विषय प्रस्तुत किया गया है। ग्रन्थ के नवम् समुल्लास में विद्या तथा अविद्या एवं बन्ध व मोक्ष विषय को प्रस्तुत किया गया है। दसवें समुल्लास में आचार व अनाचार तथा भक्ष्य व अभक्ष्य पदार्थों की सारगर्भित व्याख्या की गई है। इन दस समुल्लासों में जो ज्ञान है, ऐसा ज्ञान संसार के किसी ग्रन्थ में नहीं मिलता। इस कारण यह ग्रन्थ संसार का दुर्लभ, महत्वपूर्ण एवं प्रामाणिक ग्रन्थ है जिसमें मनुष्य के लिए जानने योग्य उन सभी बातों का जो अन्यत्र उपलब्ध नहीं होती, उन सबका प्रामाणिक वर्णन किया गया है। सत्यार्थप्रकाश के उत्तरार्द्ध के चार समुल्लासों में संसार के प्रायः सभी मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त बातों को प्रस्तुत कर उनकी समीक्षा व विद्या के आधार सत्यासत्य का विवेचन किया गया है। इसका कारण जन साधारण को सत्य व असत्य का ज्ञान कराना व सत्य का ग्रहण करने में सहायता करना है। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के लेखन व प्रचार से ही मत-मतान्तरों की अविद्या कुछ कम व कुछ दूर हुई है। वर्तमान में सत्यार्थप्रकाश का पाठक ईश्वर, जीव तथा प्रकृति के सत्यस्वरूप सहित इनके गुण, कर्म व स्वभावों से भी परिचित है। सृष्टि उत्पत्ति का प्रयोजन तथा सृष्टि के उपादान तथा निमित्त कारण का भी हमें ज्ञान है। उपासना की आवश्यकता तथा उपासना की विधि सहित उपासना से होने वालें लाभों का ज्ञान भी सत्यार्थप्रकाश को पढ़कर प्राप्त होता है। सत्यार्थप्रकाश के अध्ययन से गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित वैदिक वर्ण व्यवस्था सहित जन्मना जाति प्रथा की निरर्थकता का बोध भी होता है। विवाह क्यों किया जाता है व विवाह में वर वधु का चयन करते समय किन बातों को ध्यान में रखना चाहिये, इसका ज्ञान भी सत्यार्थप्रकाश कराता है। सत्यार्थप्रकाश से जिन विषयों का ज्ञान होता है उनका उल्लेख लेख में किया जा चुका है। इसका पूरा ज्ञान तो सत्यार्थप्रकाश को एकाग्रता से पढ़कर ही किया जा सकता है। सत्यार्थप्रकाश की प्रमुख विशेषता यह भी है इसमें विद्या तथा अविद्या एवं बन्धन व मोक्ष का विस्तार से वर्णन किया गया है। ऐसा वर्णन संसार के किसी ग्रन्थ व मत-पन्थों के ग्रन्थों में उपलब्ध नहीं होता। बन्धन व मोक्ष का वर्णन पूर्णतः तर्क एवं युक्तियों पर आधारित है। अतः सत्यार्थप्रकाश धर्म संबंधी सभी विषयों पर वेद प्रमाणों सहित वेदानुकूल ऋषियों के वचनों एवं तर्क तथा युक्तियों के द्वारा विषय का प्रतिपादन करता है। सत्यार्थप्रकाश के सभी विचार व सिद्धान्त अकाट्य हैं। आज का भारत मध्यकाल की तुलना में अति विकसित एवं ज्ञान विज्ञान सम्पन्न है। इस उन्नति में ऋषि दयानन्द एवं सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का उल्लेखनीय योगदान है। यदि ऋषि दयानन्द न आते और ज्ञान व विज्ञान से युक्त सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, ऋग्वेद आंशिक तथा यजुर्वेद सम्पूर्ण वेदभाष्य आदि ग्रन्थों का लेखन न करते तो आज का संसार ज्ञान विज्ञान व सामाजिक व राजनीतिक दृष्टि से जितना विकसित आज है, उतना विकसित सम्भवतः न होता। संसार से अविद्या दूर करने में सत्यार्थप्रकाश ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और जो अविद्या शेष है, वह भी सत्यार्थप्रकाश सहित वेदों के प्रचार से ही दूर होगी। इसके लिये हम ऋषि दयानन्द व उनके ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश का अभिनन्दन करते हुए ऋषि को सादर नमन करते हैं।
वर्ष 2020 में देश में कई क्षेत्रों, यथा कृषि, उद्योग, श्रम, टैक्स, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन, आदि में ऐसे क्रांतिकारी सुधार कार्यक्रम लागू किए गए जो पिछले कई दशकों से केवल विचाराधीन थे। देश में लागू किए गए इन आर्थिक सुधार कार्यक्रमों के अच्छे परिणाम, देश में कोरोना महामारी के बाद आर्थिक प्रगति की तेज़ हो रही गति के रूप में, देखने को मिल रहे हैं। देश में हाल ही के समय में प्रारम्भ किए आर्थिक सुधारों के चलते अब तो पूरा विश्व ही भारत की ओर टकटकी लगाए है कि किस प्रकार भारत से व्यापारिक दृष्टि से जुड़ा जाय। इन क्रांतिकारी आर्थिक सुधार कार्यक्रमों का असर विशेष रूप से कृषि के क्षेत्र में तो साफ़ साफ़ दिखाई देने लगा है जैसे कृषि उत्पादों के निर्यात में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि दृष्टिगोचर है और इन आर्थिक सुधार कार्यक्रमों का लाभ भारत के किसानों को भी मिलना शुरू हो गया है। आज भारत, दवाईयों के साथ साथ कृषि उत्पाद भी विश्व के कई देशों तक पहुंचा रहा है एवं अब तो चीन जैसे देश भी चावल आदि खाद्य पदार्थों के लिए भारत की ओर देख रहे हैं।
भारत के कृषि क्षेत्र पर तो कोरोना महामारी का असर लगभग नहीं के बराबर रहा है क्योंकि कृषि क्षेत्र में वित्तीय वर्ष 2020-21 की द्वितीय तिमाही में भी 3.4 प्रतिशत की विकास दर दर्ज की गई है, जो कि प्रथम तिमाही में दर्ज की गई विकास दर के बराबर है। केंद्र सरकार द्वारा इस संदर्भ में लिए गए कई आर्थिक निर्णयों के चलते भारत में न केवल कृषि उत्पादन लगातार तेज़ गति से बढ़ रहा है बल्कि कृषि उत्पादों का निर्यात भी अब बहुत तेज़ी से वृद्धि दर्ज कर रहा है। अप्रेल-सितम्बर 2019 के बीच 6 माह के दौरान भारत से कृषि उत्पादों का निर्यात 37397 करोड़ रुपए का रहा था जो अप्रेल-सितम्बर 2020 के बीच 6 माह के दौरान, 43.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करते हुए, बढ़कर 53626 करोड़ रुपए का हो गया है। वृद्धि दर में यह एक लम्बी छलांग है। कृषि उत्पादों के निर्यात में विशेष रूप से शामिल रहे उत्पादों में मूंगफली में क़रीब 35 प्रतिशत, चीनी में 104 प्रतिशत, गेहूं में 206 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है तथा बासमती और ग़ैर बासमती चावल का भी निर्यात में बड़ा हिस्सा रहा है। अभी हाल ही में अप्रेल-अक्टोबर 2020 के आंकड़े भी जारी किये गए है और इस दौरान कृषि उत्पाद के निर्यात और आगे बढ़कर 70,000 करोड़ रुपए के ऊपर पहुंच गए हैं, जिसका सीधा सीधा लाभ देश के किसानों को मिल रहा है।
पुराने एवं घिसेपिटे 1500 क़ानूनों, जिनकी आज के आर्थिक परिप्रेक्ष्य में कोई अहमियत ही नहीं रह गई थी, को रद्द कर दिया गया है ताकि देश के नागरिकों के साथ साथ विदेशी व्यवसाईयों को भी भारत में व्यापार एवं व्यवसाय करने में आसानी हो। इन्हीं कारणों के चलते कोरोना महामारी के काल में भी भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में रिकार्ड वृद्धि दर्ज की गई है एवं दिनांक 4 दिसम्बर 2020 को विदेशी मुद्रा भंडार 57930 करोड़ अमेरिकी डॉलर के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया है। इससे विश्व के अन्य कई देशों की भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्वास की झलक मिलती है। विदेशी निवेशकों के साथ साथ अब भारतीय निवेशकों को भी देश में अपने निवेश को बढ़ाने की आवश्यकता है। अभी तक तो देश में पूंजी निवेश के मामले में केंद्र सरकार एवं कुछ राज्य सरकारों का ही योगदान रहा है परंतु केवल सरकारों के भरोसे कब तक अर्थव्यवस्था को बल प्रदान किया जा सकता है, जबकि भारत में केंद्रीय राजस्व का सकल घरेलू उत्पाद से प्रतिशत अन्य देशों की तुलना में बहुत ही कम है अतः सरकारों के लिए पूंजीगत ख़र्चे को बढ़ाने की भी अपनी सीमायें हैं। इसलिए देशी निवेशकों के भी, निवेश की दृष्टि से, आगे बढ़ने का समय अब आ गया है। विशेष रूप से रोज़गार का सृजन करने वाले क्षेत्रों यथा, कपड़ा उद्योग, लेदर उद्योग, फ़ुटवेयर उद्योग, फ़ार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, आटोमोबाईल, डायमंड उद्योग, फ़ूड प्रॉसेसिंग उद्योग, आदि में ऐसा वातावरण निर्मित किए जाने की आवश्यकता है ताकि इन क्षेत्रों में देशी निवेशक अपना निवेश बढ़ाएं। देश में बचत एवं निवेश की दर में भी कमी देखने में आ रही है जिसके चलते भी विकास दर में कमी आ सकती है अतः बचत की दर को भी बढ़ाया जाना आवश्यक होगा। इस संदर्भ में निजी कम्पनियों को तो कुछ वर्षों के लिए अपने लाभ की पूरी राशि को ही निवेश के तौर पर इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि देश में ही निवेश बढ़ सके।
अपने शोध कार्य के चलते, भारत फ़ार्मा के क्षेत्र में अब वैश्विक स्तर पर अपनी धाक जमा चुका है। परिणामतः कोरोना वायरस की वैक्सीन के मामले में भी भारत पूरे विश्व के लिए एक उम्मीद की किरण के तौर पर उभर रहा है। भारत आज 100 से अधिक देशों को भारत में ही निर्मित दवाईयों का निर्यात कर रहा है। इसी प्रकार, कृषि, ऊर्जा, स्पेस, रक्षा, यातायात एवं निर्माण के क्षेत्र में भी भारत में शोध कार्य पर निवेश बढ़ाने की ज़रूरत है। यूं देखा जाय तो भारत में शोध कार्य पर ख़र्च की जाने वाली राशि अन्य देशों की तुलना में बहुत ही कम है। शोध कार्य से नवोन्मेश जन्म लेता है एवं उत्पादकता में सुधार में सहायक होता है। इस प्रकार देश के उत्पाद वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनते हैं। अब समय आ गया है कि देश में कम्पनियों को अपने अपने क्षेत्र में शोध कार्य पर ख़र्च किए जाने की सीमा निर्धारित करनी चाहिए ताकि इन कम्पनियों में नवोन्मेश को प्रोत्साहन मिल सके। विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को प्रोत्साहन देकर उनके शोध कार्यों को भी भारत में स्थानांतरित करवाया जाए तो देश में ही शोध कार्य करने हेतु माहौल तैयार किया जा सकता है।
उत्पादकता की स्थिति तो यह है कि चीन में खेती योग्य ज़मीन भारत की तुलना में केवल आधी ही इस्तेमाल की जाती है जबकि उत्पादन भारत से दुगुना पैदा किया जाता है। इतना ज़्यादा अंतर है भारत एवं चीन में कृषि उत्पादकता के क्षेत्र में। अतः आर्थिक क्षेत्र में किए जाने वाले सुधार कार्यक्रमों को अब विराम नहीं दिया जा सकता है, इन्हें अविरल जारी रखना ही होगा। कई विदेश रेटिंग संस्थान भी भारत से अब आशा करने लगे हैं कि भारत इन आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को आगे भी जारी रखेगा एवं अब देश में विभिन राज्य भी आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को लागू करने की ओर आगे बढ़ेंगे। इन अंतरराष्ट्रीय रेटिंग संस्थानों का तो यह भी सोचना है कि अभी हाल ही में भारत सरकार द्वारा विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में किए गए सुधार कार्यक्रमों के बाद भारत की आर्थिक विकास दर मध्यम काल में बहुत तेज़ गति पकड़ने वाली है। फ़िच रेटिंग संस्थान ने अभी हाल ही में कहा है कि कृषि क्षेत्र में किए गए क्रांतिकारी सुधार कार्यक्रमों, जिसके अंतर्गत किसानों को अपने कृषि उत्पादों को बाज़ार में बेचने की छूट प्रदान की गई है एवं श्रम क्षेत्र में किए गए सुधार कार्यक्रम जिसके अंतर्गत श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित किए जाने का प्रयास किया गया है, के चलते भारत की विकास दर में आगे आने वाले समय में भारी वृद्धि देखने को मिल सकती हैं।
भारत की वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने भी कहा है कि देश में आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को जारी रखा जाएगा ताकि विदेशी निवेशक भारत की ओर अपना रूख बनाए रख सकें। भारत ने तो कोरोना महामारी को भी अपने लिए एक अवसर के तौर पर ही देखा है एवं इस दौरान भी कई क्रांतिकारी आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को लागू कर दिया जो कि देश में कई दशकों से केवल विचाराधीन थे।
जम्मू कश्मीर में कमल नहीं खिला है ,बल्कि राष्ट्रवाद मुखरित हुआ है । डीडीसी चुनावों ने यह स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि जम्मू कश्मीर की जनता लोकतंत्र और भारत के साथ है । डीडीसी चुनाव परिणामों से उन देश विरोधी शक्तियों को जवाब मिला है जो कुछ समय पूर्व ही यह कह रही थीं कि जम्मू कश्मीर में तिरंगा उठाने वाला कोई नहीं मिलेगा। जम्मू कश्मीर की देशभक्त जनता ने इन शक्तियों को बता दिया है कि जम्मू कश्मीर में तिरंगा उठाने वाले, भारत माता की जय बोलने वाले और ‘वंदेमातरम’ कहकर गौरवान्वित होने वाले लोग ही अधिक हैं। वास्तव में पिछले लंबे काल से जम्मू कश्मीर की जनता को भारत से काटकर और उसे अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए प्रयोग करने की जिस प्रकार की योजनाएं मुफ्ती और शेख परिवार अपना रहा था, उससे अब वहां के लोगों को मुक्ति मिलने का मार्ग साफ दिखाई देने लगा है। लोगों को पता चल गया है कि कौन लोग थे जो उन्हें भारत से काट रहे थे ? यही कारण है कि डीडीसी चुनावों में कश्मीर के लोगों ने गुपकार गैंग को पूर्णतया नकार दिया है। यदि एक – एक दल की सीटों पर विचार किया जाए तो भाजपा सबसे अधिक सीटें लेकर सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में उभरी है। 280 में से 109 सीट लेकर गुपकार गैंग 7 राजनीतिक पार्टियों का एलायंस बनाकर भी घाटे में रहा है । एलायन्स बनाकर चुनाव में उतरने की मुफ्ती महबूबा और शेख परिवार की रणनीति से ही पता चल जाता है कि वह चुनाव से पूर्व ही यह समझ चुके थे कि जनता उन्हें नकार चुकी है और उनमें से कोई भी अकेले अपने दम पर सम्मानजनक सीटें प्राप्त नहीं कर पाएगा। पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस केवल अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए ही चुनाव में उतरी थीं। इन दोनों राजनीतिक दलों के नेता जिस प्रकार की देश विरोधी भाषा का प्रयोग कर रहे थे और चीन व पाकिस्तान को लाभ पहुंचाने के लिए भारत का विरोध करने तक की स्थिति में आ गए थे , उससे पता चल रहा था कि कि उनके पैर उखड़ चुके थे और इसी कारण उनकी बौखलाहट बढ़ती जा रही थी। कांग्रेस ने 280 में से केवल 26 सीटें लेकर जैसे – तैसे अपनी नाक बचाई है।धारा 370 को संविधान में असंवैधानिक रूप से स्थापित कराने वाली कांग्रेस धारा 370 को फिर से बहाल करने का शोर तो मचा सकी लेकिन जम्मू कश्मीर की जनता ने उसे पूर्णतया नकार दिया। मानो जनता ने उसे उसके पाप का फल दे दिया कि तेरे कारण ही कश्मीर का स्वर्ग नरक बन गया। वास्तव में यह बहुत ही दुखदायक बात थी कि कांग्रेस ने कश्मीर की केसर को बारूद में बदलकर वहां की सियासत और विरासत दोनों को ही खूनी बना दिया। धारा 370 और मुस्लिम तुष्टीकरण के आधार पर कश्मीर के मतदाताओं को मूर्ख बनाने वाली कांग्रेस को शायद अपनी ऐसी फजीहत की स्वयं भी अपेक्षा नहीं होगी। अपनी इस अप्रत्याशित फजीहत पर कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने यह कहकर सफाई दी है कि कांग्रेस जम्मू और कश्मीर घाटी के अलग-अलग मुद्दों के बीच फँसकर रह गई है। बेचारे अभिषेक मनु सिंघवी यह कैसे कह सकते हैं कि जम्मू कश्मीर में कांग्रेस का नेतृत्व और उसकी नीतियां पराजित हुई हैं और कश्मीर को हमारी भूलों का स्मारक बनाने वाली कांग्रेस को उसके किए का फल मिला है।
किये का फल भोगना पड़ता रहा हमेश । उत्कर्ष व अपकर्ष का आता समय विशेष ।।
कांग्रेस सहित सारा सेकुलर विपक्ष चाहे प्रधानमंत्री मोदी को कितना ही फेंकू और झूठ बोलने वाला कह ले, लेकिन सच यह है कि अपनी बात को जनता के गले उतारने में प्रधानमंत्री मोदी सफल हुए हैं। कश्मीर की जनता ने उनकी बात पर विश्वास किया है और उनमें यह भरोसा भी व्यक्त किया है कि उनके रहते ही कश्मीर से पत्थर बाज भाग सकते हैं और केंद्र से कश्मीर के विकास के लिए जाने वाला पैसा वास्तव में लोगों को मिल सकता है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में आस्था व्यक्त करके कश्मीर के मतदाताओं ने एक तो यह स्पष्ट किया है कि वे देश की मुख्यधारा में रहने के लिए पूर्णतया तैयार हैं। दूसरे उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वह पाकिस्तान या किसी भी पड़ोसी शत्रु देश के हाथों की कठपुतली बनकर अपने भविष्य को बर्बाद करना नहीं चाहते । तीसरे, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि उनके नौजवान भटके हुए नहीं हैं बल्कि भटकाये गए थे और अब वे नौजवान प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में नया कश्मीर बनता हुआ देखना चाहते हैं। चौथे, उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि जितने भी सेकुलर राजनीतिक दल हैं उन्होंने मुस्लिमों को केवल मूर्ख बनाया है और उनकी मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति मुस्लिमों के लिए बहुत घातक सिद्ध हुई है। पांचवें उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि कश्मीर के स्थानीय राजनीतिक दल केवल खानदानी विरासत को लेकर आगे बढ़ते रहे और अपने स्वयं के सियासी लाभ के दृष्टिगत केंद्र सरकार और भारत दोनों को मूर्ख बना बनाकर कश्मीर के नाम पर अपनी तिजोरी भरते रहे । उन्होंने सियासत को तिजारत में बदल दिया। कश्मीर के राजनीतिक दल पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व में सारे सांप बिच्छू एक साथ बैठे। पर जनता ने उन सबको पहचान लिया कि इनमें से कौन सा सांप है और कौन सा बिच्छू है ? और यदि यह सारे एक साथ बैठे हैं तो केवल ‘मोदीभय’ के कारण ऐसा कर रहे हैं। क्योंकि सारे इन भ्रष्टाचारी,पापाचारी और देशविरोधियों के काले कारनामे अब जनता के सामने उजागर होने लगे हैं। अपने पाप को छुपाने के लिए यह सारे के सारे अपने मूल सांप धर्म और बिच्छू धर्म को भूलकर जनता के सामने जिस प्रकार का प्रदर्शन कर रहे थे, उसको जनता ने भली प्रकार पहचान लिया और इन्हें बता दिया कि तुम्हारी वास्तविक औकात क्या है? वास्तव में किसी भी देश में लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब उसके मतदाता जागरूक हों ।यदि मतदाता सोए हुए हैं या किन्हीं भी स्थानीय मुद्दों में बहककर राष्ट्रीय मुद्दों को गौण कर अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं तो ऐसे देश या समाज के लिए लोकतंत्र बोझ बन जाता है। जब देश के राष्ट्रवादी लोगों के साथ स्थानीय मुद्दों को उपेक्षित कर राष्ट्रहित में मतदाता अपने मत का प्रयोग करना सीख जाता है तब उस देश में स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बलवती करने में सहायता मिलती है । देश लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाकर शांतिपूर्वक आगे बढ़ता है । ऐसे परिपक्व राजनीतिक निर्णय से मतदाता पत्थरबाजों को भी हवा में उड़ा देते हैं और देश की सेना से लड़ने वाले हर तथाकथित भटके हुए नौजवान को भी बंदूक की बजाए कलम हाथ में पकड़ा देते हैं और उससे कह देते हैं कि वास्तविक रूप से लोकतांत्रिक शक्ति हमारे मत में समाविष्ट है, इसलिए हमारे द्वारा चुनी हुई सरकार के आदेशों का पालन कर देश की मुख्यधारा के साथ रहना सीखो।
डॉ. वेदप्रताप वैदिक भारत के किसानों ने विपक्षी दलों पर जबर्दस्त मेहरबानी कर दी है। छह साल हो गए और वे हवा में मुक्के चलाते रहे। अब किसानों की कृपा से उनके हाथ में एक बोथरा चाकू आ गया है, उसे वे जितना मोदी सरकार के खिलाफ चलाते हैं, वह उतना ही उनके खिलाफ चलता जाता है। अब विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी किसानों की बजाय भारत के राष्ट्रपति के पास पहुंच गए। कहते हैं कि किसान-आंदोलन के पक्ष में उन्होंने दो करोड़ हस्ताक्षरवाला ज्ञापन राष्ट्रपति को दिया है। दो करोड़ तो बहुत कम हैं। उसे 100 करोड़ भी कहा जा सकता था। यदि दो करोड़ लोगों ने उस पर सचमुच दस्तखत किए हैं तो राहुलजी उनमें से कम से कम दो लाख लोगों को तो दिल्ली ले आते। उनकी बहन प्रियंका को पुलिस ने पकड़ लिया। उस पर उनकी आपत्ति ठीक हो सकती है लेकिन इसीलिए आप यह कह दें कि भारत का लोकतंत्र फर्जी है, बनावटी है, काल्पनिक है, बिल्कुल बेजा बात है। भारत का लोकतंत्र, अपनी सब कमियों के बावजूद, आज भी दुनिया का सबसे बड़ा और बहुत हद तक अच्छा लोकतंत्र है। राहुल का यह कहना हास्यास्पद है कि मोदी का जो भी विरोध करे, उसे आतंकवादी घोषित कर दिया जाता है। वैसे सिर्फ कहलवाना ही है तो विदूषक कहलवाने से बेहतर है— आतंकवादी कहलवाना लेकिन भारत में आज किसकी आजादी में क्या कमी है ? जो भी जो चाहता है, वह बोलता और लिखता है। उसे रोकनेवाला कौन है ? जो अखबार, पत्रकार और टीवी चैनल खुशामदी हैं, डरपोक हैं, कायर हैं, लालची हैं— वे अपना ईमान बेच रहे हैं। वे खुद दब रहे हैं। उन्हें दबाए जाने की जरुरत नहीं है। उन्हें दबाया गया था, आपात्काल में, राहुल की दादी के द्वारा। पांच-सात साल के राहुल को क्या पता चला होगा कि काल्पनिक लोकतंत्र कैसा होता है ? जहां तक पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र का सवाल है, युवराज की हिम्मत नहीं कि इस सवाल को वह कभी छू भी ले। नरसिंहराव-काल को छोड़ दें तो पिछले 50 साल में कांग्रेस तो एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनकर रह गई है। उसमें अब भी बड़े योग्य और प्रतिभाशाली नेता हैं लेकिन उनकी हैसियत क्या है ? यही कांग्रेसी-कोरोना देश के सभी दलों में फैल गया है। पार्टियों के आतंरिक लोकतंत्र का खात्मा ही बाह्य लोकतंत्र के खात्मे का कारण बनता है।
एक देश का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह कितना युवा है। 15-24 वर्ष के बीच के सभी युवा, आमतौर पर कॉलेज जाने वाले छात्र होते हैं। उनके करियर विकल्प में इंजीनियर, डॉक्टर, शिक्षक, खेल, रक्षा और कुछ उद्यमी शामिल हैं। विशेष रूप से भारत के संदर्भ में, राजनीति को कैरियर विकल्प के रूप में बहुत कम लिया जाता हैं। इस प्रकार दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को परिभाषित करने और नेतृत्व करने के लिए राजनीति में युवा प्रतिभाशाली दिमागों की भारी कमी है। यह स्थान उन लोगों द्वारा लिया गया है जिनके पास आपराधिक आरोप, निरक्षर धन और बाहुबल हैं, जो सुपर पावर नेशन की लीग का हिस्सा बनने के भारत के दृष्टिकोण को खतरे में डाल रहे हैं।
वर्तमान समय में युवा और उनके परिवार भूमंडलीकरण की घटनाओं के कारण निजी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नौकरी से अधिक संतुष्ट हैं। हार्दिक पटेल और कन्हैया कुमार जैसे युवा सक्रिय राजनीति में बहुत कम प्रतिशत हिस्सा लेते हैं, हालांकि सरकार की ओर से इन मामलों में बहुत कम प्रतिक्रिया हुई। सरकार को कॉलेज की राजनीति को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करना चाहिए और छात्र संघों को पहचानना चाहिए, ताकि छात्र बाद के चरणों में राजनीति की सक्रिय भागीदारी कर सकें।
‘चम्पारण सत्याग्रह’ इस बात का उदाहरण है की युवा किस प्रकार देश की राजनीति को बदल सकते हैं | इस सत्याग्रह में गाँधी जी के आह्वाहन पर ‘बाबू राजेंद्र प्रसाद’ जैसे युवा सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में उभरे| गाँधी जी ने युवाओं को प्रमुखता के साथ स्वंतंत्र आन्दोलन से जोड़ा जिसके परिणाम स्वरुप ‘सरदार वल्लभ भाई पटेल’, ‘जवाहर लाल नेहरु’, ‘सरोजिनी नायडू’, आदि जैसे महान नेता भारत को प्राप्त हुए | वहीँ युवा भगत सिंह की दूरदर्शी क्रांतिकारिता और समाजवादी उद्देश्य आज भी देश के युवाओं हेतु प्रेरणा स्रोत है |
मध्ययुगीन काल और औपनिवेशिक युग के दौरान युवाओं के पास राजनीति में प्रत्यक्ष हिस्सा लेने के लिए कम विकल्प थे, इसके बावजूद उस समय ऐसे युवा राजनीति में आगे बढे जो आगे चलकर महान नेता बने लेकिन स्वतंत्रता के बाद भारत के संविधान ने मानदंड निर्धारित किए, उन्हें भारतीय नागरिक होना चाहिए और एमएलए और एमपी के लिए न्यूनतम आयु 25 वर्ष, ग्राम पंचायत सरपंच के लिए 21 वर्ष होनी चाहिए। इस प्रकार एक बार उनकी शिक्षा पूरी होने के बाद वे सीधे राजनीति में भाग ले सकते हैं।
राजनीति में भी बदलाव लाना जरुरी है जिससे इसमें जुझारू व पढाई में अव्वल युवाओं का समावेश भी संभव हो | कॉलेज राजनीति में अपराधीकरण को रोकना होगा तथा अनुचित व्यय पर नियंत्रण करना होगा | कॉलेज की राजनीति में राजनैतिक दलों का हस्तछेप सीमित करना होगा तथा विद्यार्थियों का राजनैतिक लाभों हेतु लामबंदीकरण रोकना होगा |
युवाओं के राजनैतिक विकास के लिए स्वायत्त व स्वतंत्र कॉलेज राजनीति के साथ साथ बचपन से ही आदर्श नेता के गुण स्थापित करने होंगे, इसमें स्कूलों द्वारा विचार विमर्श तथा तर्क वितर्क की क्षमता का विकास शामिल होना चाहिए | बच्चों को शिक्षा द्वारा अपनी आस-पास की समस्याओं का विश्लेषण करने की योग्यता देनी होगी | युवाओं में राजनीतिक कौशल विकास हेतु पंचायतों व नगर पालिकाओं को बड़ी भूमिका निभानी होगी| इस स्तर पर प्रशिक्षण द्वारा युवाओं को भविष्य की राजनीति हेतु तैयार किया जा सकता है |
कानूनी मानदंडों के अलावा, राजनीति में युवाओं की भागीदारी से संबंधित युवा मामलों पर संसदीय समिति उन पहलुओं पर गौर करे जो युवाओं को करियर विकल्प के रूप में राजनीति करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। ‘मन की बात ’जैसी सरकारी पहलें युवाओं को जोड़ने और देश के सामने आने वाली समस्याओं के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए गुंजाइश प्रदान करती हैं और युवाओं को खुले में शौच और भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए ‘स्वच्छ भारत’, विस्सल ब्लोअर जैसे समाधान का हिस्सा बनाया जा सकता है। अन्ना के लोकपाल आंदोलन, दिल्ली सामूहिक बलात्कार उत्पीड़न, समान रूप से युवाओं में राजनीतिक जागरूकता पैदा करते हैं।
हालांकि, इन सभी के बावजूद, वर्तमान युवाओं का मानना है कि राजनीति उनके लिए नहीं है। यह बड़े पैमाने पर वर्तमान राजनीति की छवि के कारण है – लगातार भ्रष्टाचार जैसे 2 जी, कोयला घोटाले; संसदीय कार्यवाही में धन, चुनावों में धन और बाहुबल का उपयोग, गठबंधन सरकारों का लगातार पतन, सत्ता का लालच, राजनीति और गिरफ्तारी का अनैतिक खेल – ये सभी युवाओं को सोच की राजनीति से डरते हैं और उन्हें दूर रखते हैं, यहां तक कि माता-पिता भी इस विकल्प के लिए आगे नहीं आते हैं। अपने बच्चों को राजनीति में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना उनके लिए खतरे की घंटी है। पर वर्तमान समय चिंताजनक स्तिथि को दर्शाता है जहाँ युवाओं का राजनीति में भाग गिरता जा रहा है | आज हमारी संसद में 35 वर्ष से कम उम्र के मात्र 20% नेता ही है और उनमे से 70 से 90 प्रतिशत केवल पारिवारिक संबंधों द्वारा ही राजनीति में आये हैं |
युवा भागीदारी सकारात्मक बदलाव ला सकती है – वे युवा और अभिनव हैं जो आमतौर पर प्रकृति में कड़ी मेहनत करते हैं, उन्हें मेक इन इंडिया से संबंधित नीति निर्माण, बच्चों के खिलाफ अपराध, भ्रष्टाचार, महिला सशक्तिकरण आदि में आमंत्रित किया जा सकता है। वे स्टार्टअप इंडिया और स्वच्छ भारत अभियान के ब्रांड एंबेसडर हो सकते हैं।। वर्तमान समय में युवाओं को नशीली दवाओं, मानव तस्करी जैसी बुरी शक्तियों से अलग किया जा रहा है, वे इन समस्याओं का समाधान हो सकते हैं।
वर्तमान में भारत के युवाओं और बच्चों में कुल जनसंख्या का लगभग 55% हिस्सा है। भारत युवा राष्ट्र है और दुनिया में सबसे तेजी से विकास करने वाला राष्ट्र है। जनसांख्यिकी लाभांश का लाभ उठाने के लिए हमें समावेशी विकास की आवश्यकता है – युवा राजनीति एक ऐसा अछूता क्षेत्र है, जिस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए और नीति निर्माण में योगदान करने के लिए उन्हें नया करना चाहिए। सबसे बड़ी युवा आबादी वाले राष्ट्र को वर्तमान गतिशील नेतृत्व के बाद राष्ट्रीय भवन के नेताओं में विराम नहीं देना चाहिए। पूर्व ब्रितानी प्रधानमंत्री के उपर्युक्त विचार दर्शाते हैं की युवावस्था वह समय है जब व्यक्ति के पास महान परिवर्तनों को लाने की शक्ति होती है |
युवा उस वायु के सामान है जो अपने वेग से समाज , राजनीति और दुनिया को बदलने की क्षमता रखती है | युवाओं में वह ओज होता है जो उन्हें नए विचारों के प्रति सजग रखता है और उनके पास अतीत से सीखने की काबिलियत भी होती है | जब युवा राजनीति में आते हैं तो नव परिवर्तन की धारा बहती है और नयी सोच का निर्माण होता है | जब युवा पुनः राजनीति में लौटेंगे तो निश्चित ही देश विकास के मार्ग पर चल निकलेगा | युवाओं से यही आशा है की वे दुष्यंत कुमार के वाक्य अपने ह्रदय में उतार कर राजनीति में प्रवेश करेंगे और नव देश का निर्माण करेंगे |
हमारा यह संसार 1.96 अरब वर्षों से अधिक समय पूर्व बना था। तब से यह जीवों के आवागमन व ग्रहों व उपग्रहों के नियमपूर्वक गतिमान होने से चल रहा है। सृष्टि में प्रथम मनुष्य वा स्त्री पुरुष अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न हुए थे। सभी मनुष्यों सहित आंखों से दृश्य व अदृश्य भौतिक सृष्टि, प्राणी जगत व वनस्पति जगत आदि एक सर्वशक्तिमान, सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वव्यापक, अनादि, नित्य तथा सर्वज्ञ सत्ता से ही बना व संचालित है। परमात्मा न होता तो यह संसार कौन बनाता? अर्थात् तब यह संसार बन नहीं सकता था। प्रकृति व जीवों की सत्ता न होती तो भी यह संसार अस्तित्व में नहीं आ सकता था। तब परमात्मा किस पदार्थ से किसके लिये यह संसार बनाता? तब संसार की न तो आवश्यकता होती और न प्रकृति व जीवों के होने से इस सृष्टि की उत्पत्ति का होना सम्भव एवं आवश्यक था। परमात्मा ने प्रकृति नामी उपादान कारण से जीवों को सुख व कल्याण प्रदान करने के लिये ही अपनी असीम सामथ्र्य से इस संसार की रचना की है और वही इसका पालन कर रहा है व आगे भी करेगा। हमें इस सत्य रहस्य पर विश्वास करना चाहिये। यह ज्ञान हमें ईश्वरीय ज्ञान वेद और ऋषि परम्परा व उनके ग्रन्थों से ही प्राप्त हुआ है। ऋषि दयानन्द जी का ‘सत्यार्थप्रकाश’ ग्रन्थ भी हमें इस सृष्टि के अनेक रहस्यों से परिचित कराता है। सृष्टि की उत्पत्ति का विचार करने तथा वेदादि ग्रन्थों का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि वेद ईश्वरीय ज्ञान है जो ईश्वर से सृष्टि की आदि व आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा को उनके हृदय में स्थित परमात्मा ने अन्तर्यामी स्वरूप से प्रदान किये थे। ऐसा होना असम्भव नहीं है। ईश्वर वर्तमान में भी जीवों को सत्कर्म करने की प्रेरणा और दुष्ट कर्मों का त्याग करने की आत्मा में प्रेरणा करता है। इसी कारण से परोपकार व पुण्य कार्यों को करने में उत्साह व प्रसन्नता तथा चोरी, जारी, हत्या आदि कार्य करने में आत्मा में भय, शंका व लज्जा उत्पन्न होती है। यह परमात्मा की ओर से ही होता व किया जाता है। वेदों के अध्ययन और ऋषि परम्परा से प्राप्त ज्ञान से विदित होता है कि सृष्टि के आरम्भ में आदि व प्रथम सृष्टि के ऋषियों व मनुष्यों को परमात्मा से वेदों का ज्ञान प्राप्त हुआ था। यह ज्ञान पूर्ण ज्ञान है। सभी विषयों का बीज रूप में ज्ञान वेदों में विद्यमान है। मनुष्य वेदों का अध्ययन कर सभी विषयों में अपना ज्ञान बढ़ा सकता है। ऐसा ही हुआ भी है। आज संसार में जो ज्ञान विज्ञान उपलब्ध है वह प्रथम वेदों के द्वारा उत्पन्न होकर समय समय पर सृष्टि में उत्पन्न मनुष्यों ने उसे अपने चिन्तन, मनन व ध्यान, प्रयोगों व विचार गोष्ठी आदि क्रियाओं को करके बढ़ाया है।
मनुष्यों को ईश्वर का परिचय सर्वप्रथम किसने कराया? इसका एक ही उत्तर है कि परमात्मा का परिचय स्वयं परमात्मा ने सृष्टि के आदि में चार ऋषियों को ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद का ज्ञान देकर कराया था। वेदों में ईश्वर का सत्यस्वरूप व गुण, कर्म व स्वभाव विस्तार व प्रायः पूर्णता से प्राप्त होते हैं। सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों में अपनी बुद्धि से बिना परमात्मा की सहायता से भाषा व ज्ञान को उत्पन्न व ईश्वरेतर किसी सत्ता से प्राप्त करने की क्षमता व सामर्थ्य नहीं होती। परमात्मा ज्ञानवान सत्ता है। वह सर्वज्ञ एवं अपने असीम ज्ञान से इस सृष्टि की रचना करने वाले हैं। सर्वशक्तिमान होने से उनके लिए मनुष्यों को अमैथुनी सृष्टि तथा प्रसव व्यवस्था से उत्पन्न करना तथा ज्ञान व कर्म की क्षमता से युक्त अल्पज्ञ चेतन जीवात्मा में ज्ञान देना असम्भव नहीं है। परमात्मा अपने सभी कार्य सहज भाव से जैसे हम श्वास प्रश्वास लेते व छोड़ते तथा आंखे खोलते व बन्द करते हैं, करता है। परमात्मा ने ईश्वर विषयक जो ज्ञान दिया है वह चारों वेदों से प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है। ईश्वर का वेदों में जो सत्यस्वरूप वर्णन व गुण, कर्म व स्वभाव ज्ञात होते हैं उनके अनुसार ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य व पवित्र है। वही सृष्टिकर्ता है। सृष्टिकर्ता होने व अपने परोपकार के गुणों व स्वभाव के कारण वह सब जीवों का उपासनीय है। ईश्वर ही मनुष्यादि जीवों के सभी कर्मों का द्रष्टा, साक्षी व फल प्रदाता है। हमारे ज्ञान व कर्मों के आधार पर ही हमें परमात्मा से जन्म मिलता है। हम वेदों का ज्ञान प्राप्त कर व उसके अनुसार आचरण व ईश्वर प्राप्ति की साधना कर ईश्वर को प्राप्त होकर उत्तम परम गति आनन्द से युक्त मोक्ष को प्राप्त हो सकते हैं। यह शिक्षा भी हमें मोक्ष व वेदों के ज्ञानी ऋषियों के ग्रन्थों से प्राप्त होती है। मोक्ष प्राप्त होने पर जीवात्मा को आवागमन वा जन्म व मरण से अवकाश मिल जाता है। वह 31 नील 10 खरब तथा 40 अरब वर्षों तक बिना जन्म व मरण लिये मुक्तावस्था में ईश्वर के सान्निध्य में रहकर उसके आनन्दस्वरूप का भोग करते हुए पूर्ण प्रसन्न तथा आनन्दित रहते हैं। यह स्थिति ही सब जीवों को प्राप्त करनी योग्य है। अतीत में अधिकांश ऋषियों सहित ऋषि दयानन्द ने इस स्थिति को प्राप्त किया है, यह बात अनुमान से जानी जाती है। अतः सभी मनुष्यों को वेद, उपनिषद, दर्शन, सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रन्थों का अध्ययन कर सत्ज्ञान, सत्कर्मों, उपासना, देवयज्ञ अग्निहोत्र, परोपकार व दान आदि कर्मों को प्राप्त होकर मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी बनना चाहिये।
संसार के अधिकांश लोग ईश्वर के अस्तित्व को तो मानते हैं परन्तु सभी को ईश्वर के सत्यस्वरूप सहित उसके गुण, कर्म व स्वभाव का ठीक ठीक यथार्थ ज्ञान नहीं है। इसका कारण उन लोगों व उनके मतों के आचार्यों की वेदों सहित ऋषियों के उपनिषद एवं दर्शन आदि ग्रन्थों से दूरी है। यह सभी मत विगत 500 से 2500 वर्षों के मध्य अस्तित्व में आये हैं। इस काल में अविद्या अपनी चरम सीमा पर थी। इसी कारण से विगत दो तीन हजार वर्ष पुराने ज्ञान व ग्रन्थों में ईश्वर व सत्य विद्याओं का सत्य व यथार्थस्वरूप विदित नहीं होता। वेद संसार में सबसे प्राचीन ग्रन्थ है। इस मान्यता व विचार को पश्चिमी विद्वान भी स्वीकार करते हैं। प्रो. मैक्समूलर ने भी ऋग्वेद को संसार की सबसे पुरानी पुस्तक स्वीकार किया है। इस आधार वेद ही संसार के आदि ग्रन्थ सिद्ध होते हैं। वेदों की अनेक विशेषतायें हैं। इसमें ज्ञान तो उत्तम कोटि का है ही, इसका भाषा भी संसार की भाषाओं में सर्वोत्तम है। वेदों की भाषा मनुष्यकृत न होकर ईश्वरकृत भाषा है इसीलिए यह सर्वोत्तम है। वैदिक भाषा संस्कृत का व्याकरण एवं शब्द कोष आदि यथा अष्टाध्यायी, महाभाष्य, निरुक्त, निघण्टु आदि भी विश्व में अन्य भाषाओं के व्याकरणों से उत्तम व श्रेष्ठ हैं। देवनागरी लिपि ही वेदों के लिपि है। इस लिपि में संसार की सभी ध्वनियों को पूर्ण स्पष्टता व निर्दोष रूप में अभिव्यक्त करने की क्षमता है। अन्य भाषाओं में यह क्षमता नहीं है। संस्कृत में ईश्वर व अग्नि आदि के लिये एक सौ से अधिक पर्यायवाची शब्द हैं। अन्य संज्ञाओं के लिए भी संस्कृत भाषा में अनेकानेक पर्यायवाची शब्द उपलब्ध होते हैं। यह विशेषता अंग्रेजी व अन्य भाषाओं में नहीं है। इस कारण वेद सर्वप्राचीन होने सहित ज्ञान व भाषा की दृष्टि से भी सर्वोत्तम हैं। सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि के मनुष्यों वा ऋषियों को अन्तर्यामी सर्वज्ञ व सर्वव्यापक परमात्मा से वेदज्ञान प्राप्त हुआ था। अतः इसका उत्कृष्ट व सर्वोत्तम होना सत्य व सिद्ध है। यह सर्वथा सत्य एवं यथार्थ तथ्य है कि सृष्टि के आरम्भ में ही मनुष्यों को ईश्वर के अस्तित्व, उसके सत्य स्वरूप तथा उसके गुण, कर्म व स्वभाव का ज्ञान चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद से प्राप्त हुआ था। संसार के लोगों को इस तथ्य को जानना चाहिये और वेदों का अध्ययन कर इसमें निहित ज्ञान से लाभ उठाते हुए धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त होना चाहिये। ऐसा करना ही उनके हित व स्वार्थ की दृष्टि से भी उचित है। यदि कोई मनुष्य वेदों से ईश्वर का सत्यस्वरूप जानना चाहे और वह वेदादि शास्त्रों का अध्ययन न कर सके तो वह ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना के आठ मन्त्रों का उनके अर्थ सहित पाठ कर लें तो भी वह 5 मिनट में ईश्वर के यथार्थस्वरूप से परिचित हो सकता है।
जिहादी शक्ति यदि ताड़का हैं तो मसीही पूतना। जैसे पूतना ने माता के वेष में हमारे सांस्कृतिक नायक श्रीकृष्ण के प्राण लेने का षड्यंत्र रचा था वैसे ही तमाम चर्च, उसमें काम करने वाले पादरी और मदर्स-सिस्टर्स सेवा और ममता की आड़ में हमारे भोले-भाले, निर्धन-वंचित वनवासियों को लुभाकर उनका धर्मांतरण करते हैं। उन्होंने पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक धर्मांतरण का यह धंधा चला रखा है। पहले सौ वर्षों में उन्होंने अफ़्रीकन देशों को धर्मांतरित किया और बीसवीं-इक्कीसवीं शताब्दी उन्होंने एशियाई देशों मुख्यतया भारत के अलग-अलग धर्मावलंबियों को ईसाई धर्म में धर्मांतरित करने का लक्ष्य तय कर रखा है। भारत में उन्हें ख़ूब सफलता भी मिली। वे जानते थे कि धर्म पर प्राण न्योछावर करने वाला मरना स्वीकार करेगा, पर अपने धर्म, अपनी परंपरा और संस्कृति को नहीं छोड़ेगा। इसलिए वे शिक्षा, सेवा, चिकित्सा की आड़ में रूप बदलकर आए और उन्हें लुभाया जो साधनहीन थे, वंचित थे, अभावग्रस्त थे। और फिर धीरे-धीरे उनके मन में विभाजन के विष-बीज बोए। उनका यह कार्य आज भी निर्बाध ज़ारी है। मोदी सरकार ने जिन चार हजार से भी अधिक एनजीओज को प्रतिबंधित किया है, उनमें से कई धर्मांतरण के इस धंधे में बराबर के हिस्सेदार थे। यों ही नहीं मोदी सरकार का नाम सुनते ही उनके पेट में मरोड़ने आने लगती हैं, उनका दिमाग़ बजबजाने लगता है, ज़ुबान कड़वी हो जाती है। और जिन लोगों को लगता है कि मोदी सरकार ने क्या किया उन्हें इन मसीही पादरियों से एक बार मिलना चाहिए। बड़ी आयोजना और धूर्त्तता से चर्च और पश्चिम प्रेरित एनजीओज द्वारा भोले-भाले, साधनरहित गरीबों-वंचितों-वनवासियों को तरह-तरह के प्रलोभन देकर, शिक्षा-चिकित्सा की आड़ लेकर हिंदू धर्म से ईसाई संप्रदायों में मतांतरित किया जाता है। इस मतांतरण के लिए ईसाई मान्यता वाले देशों एवं वैश्विक स्तर की मसीही संस्थाओं द्वारा पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। नव मतांतरित व्यक्तियों-समूहों के समक्ष अपने नए संप्रदाय यानी ईसाई धर्म के प्रति निष्ठा प्रदर्शित करने का अतिरिक्त दबाव बना रहता है। हिंदू मतों, हिंदू संस्थाओं या साधु-संतों पर किया गया हमला उन्हें वहाँ न केवल स्थापित करता है, अपितु नायक जैसी हैसियत प्रदान करता है। इसलिए ये नव मतांतरित लोग अधिक कट्टर एवं धर्मांध होते हैं। इन मासूम और भोले-भाले वंचितों-वनवासियों-गरीबों के बीच मतांतरण को बढ़ावा देने वाली शक्तियाँ इस प्रकार के साहित्य वितरित करती हैं, इस प्रकार के विमर्श चलाती हैं कि धीरे-धीरे उनमें अपने ही पुरखे, अपनी ही परंपराओं, अपने ही जीवन-मूल्यों, अपने ही विश्वासों के प्रति घृणा की भावना परिपुष्ट होती चली जाती हैं। उन्हें पारंपरिक प्रतीकों, पारंपरिक पहचानों, यहाँ तक कि अपने अस्तित्व तक से घृणा हो जाती है। उन्हें यह यक़ीन दिलाया जाता है कि उनकी वर्तमान दुरावस्था और उनके जीवन की सभी समस्याओं के लिए उनकी आस्था, उनकी परंपरा, उनकी पूजा-पद्धत्ति, उनका पुराना धर्म, उनके भगवान जिम्मेदार हैं। और उन सबका समूल नाश ही उनके अभ्युत्थान का एकमात्र उपाय है। उन्हें उनकी दुरावस्थाओं से उनका नया ईश्वर, उनकी नई पूजा पद्धत्ति ही उबार सकती है। ग़लत ईश्वर जिसकी वे अब तक पूजा करते आए थे का विरोध उनका नैतिक-धार्मिक दायित्व है। यह उन्हें उनके नए ईश्वर का कृपा-पात्र बनाएगा। कभी सेवा के माध्यम से, कभी शिक्षा के माध्यम से, कभी साहित्य के माध्यम से, कभी आर्य-अनार्य के कल्पित ऐतिहासिक सिद्धांतों के माध्यम से नव मतांतरितों के रक्त-मज्जा तक में इतना विष उतार दिया जाता है कि सनातन परंपराओं के प्रतीक और पहचान भगवा तक से उन्हें आत्यंतिक घृणा हो जाती है। यह घृणा कई बार इस सीमा तक बढ़ जाती है कि वे हिंदू साधु-संतों और उनके सहयोगियों पर प्राणघातक हमले कर बैठते हैं। दुर्भाग्य है कि आज कुछ मैकॉले प्रणीत शिक्षा के सह-उत्पाद, औपनिवेशिक मानसिकता के गुलाम काले अंग्रेज और पश्चिमीकरण को आधुनिकीकरण का पर्याय मान बैठे कुछ अँग्रेजीदा लोगों की देखा-देखी कुछ भोले-भाले लोग भी क्रिसमस पर बधाई देने लगे हैं, क्रिसमस ट्री लगाने लगे हैं और सपने में संता के आने का स्वप्न सँजोने लगे हैं। आश्चर्य है कि जिन तथाकथित आधुनिक-आधुनिकओं को शिवलिंग पर दूध-जल चढ़ाना जल और दूध की बर्बादी लगती है, पेड़-पौधों की पूजा-अर्चना अंधविश्वास लगता है, भगवान के अवतरण पर घर-द्वारा को सजाना पिछड़ापन लगता है, उन्हें सांता का चॉकलेट और उपहार लेकर बच्चों के सपनों में आना बड़ा वैज्ञानिक और तार्किक लगता है। बाज़ार आज त्योहारों पर भी हावी हैं। बाज़ार की सहायता से क्रिसमस और न्यू ईयर को भारत में भी एक महोत्सव की तरह प्रस्तुत-प्रचारित किया जाता है। जबकि भारत की संस्कृति से इन त्योहारों का कोई सरोकार नहीं रहा है। प्रणय कुमार