धर्म-अध्यात्म “भौतिकवाद से हमारी मानवीय संवेदनायें घटती हैं जिन्हें आध्यात्मिकता से सन्तुलित कर जीवन को सुखी बना सकते हैं”

“भौतिकवाद से हमारी मानवीय संवेदनायें घटती हैं जिन्हें आध्यात्मिकता से सन्तुलित कर जीवन को सुखी बना सकते हैं”

मनमोहन कुमार आर्य, भौतिकवाद आध्यात्मवाद का विलोम शब्द है। पृथिवी, अग्नि, जल, वायु और आकाश को भौतिक पदार्थ कहते हैं। इसमें ईश्वर व जीवात्मा सम्मिलित…

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समाज अब “मोमो चैलेंज” गेम बना बच्चों की मौत का सौदागर 

अब “मोमो चैलेंज” गेम बना बच्चों की मौत का सौदागर 

अनिल अनूप  लुधियाना, 9 सितंबर .मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी), उच्च शिक्षा विभाग, ने स्कूल शिक्षा विभाग को सलाह दी है कि ऑनलाइन गेम ‘मोमो…

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कविता ज्वार उठाना होगा, मस्तक कटाना होगा

ज्वार उठाना होगा, मस्तक कटाना होगा

कवि आलोक पाण्डेय समर की बेला है वीरों अब संधान करो, शत्रु को मर्दन करने को, त्वरित अनुसंधान करो | मातृभू की खातिर फिर लहू…

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कविता महीने के चार दिन वो खुद से लड़ती है

महीने के चार दिन वो खुद से लड़ती है

लेखक : आदर्श गौतम महीने के चार दिन वो खुद से लड़ती है, खुद को अकेला समझती है, तकलीफ में रहती है, रोती है, बिलखती…

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राजनीति सर्वोच्च न्यायालय और तुष्टीकरण

सर्वोच्च न्यायालय और तुष्टीकरण

बिपिन किशोर सिन्हा ऐसा लगता है कि जब से कांग्रेस ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ अवमानना की नोटिस दी…

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कविता हिंदी भाषा के हृदय का दर्द

हिंदी भाषा के हृदय का दर्द

मैं भारत से हिन्दी बोल रही हूँ अपने ह्रदय की पीड़ा खोल रही हूँ मेरी आवाज कोई नही यहाँ सुनता है अंग्रेजी भाषा का जाल…

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राजनीति जातिवाद के दलदल में फंसी हमारी राजनीति

जातिवाद के दलदल में फंसी हमारी राजनीति

डॉ. वेदप्रताप वैदिक अजा जजा अत्याचार निवारण कानून को लेकर कभी अनुसूचित जाति-जनजाति द्वारा और कभी सवर्णों द्वारा बार-बार भारत बंद का जो नारा दिया…

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समाज क्यों बनती हाई प्रोफ़ाइल लड़कियां काल गर्ल

क्यों बनती हाई प्रोफ़ाइल लड़कियां काल गर्ल

-अनिल अनूप   कई समय से कालगर्ल के धंधे के बारे में जानने की जिज्ञासा थी कि क्यों हाई सोसाइटी में रहने वाली लड़कियां इसे…

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कविता है ज्ञान औ अज्ञान में  !

है ज्ञान औ अज्ञान में  !

(मधुगीति १८०८२७ ब) रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’ है ज्ञान औ अज्ञान में, बस भेद एक अनुभूति का; एक फ़ासला है कर्म का, अनुभूत भव की द्रष्टि का ! लख परख औ अनुभव किए, जो लक्ष हृदयंगम किए; परिणिति क्रिया की पा सके, फल प्राप्ति परिलक्षित किए ! जो मिला वह कुछ भिन्न था, सोचा था वह वैसा न था; कुछ अन्यथा उर लग रहा, पर प्रतीति सुर दे रहा ! आभोग का सागर अगध, उपलब्धि की गागर गहन; जिमि ब्रह्म में मिल फुरके मन, जग बोध करता सहज क्षण ! जो अजाने को जानता, उसका जगत पहचानता; ‘मधु’ के रचयिता रासता, उनकी प्रभा सब भासता !    

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कविता प्रकृति का समीकरण

प्रकृति का समीकरण

डॉ. छन्दा बैनर्जी प्रकृति ने हमें मौके दिए हैं हर बार लेकिन , हम बुद्धिजीवी कहलाने वालों ने उसी प्रकृति पर प्रहार किये है बार-बार…

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राजनीति डूसू चुनाव : मुद्दों पर धनबल और बाहुबल हावी

डूसू चुनाव : मुद्दों पर धनबल और बाहुबल हावी

नीरज कुमार हर साल की तरह इस साल भी दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) चुनाव सितम्बर महीने में हो रहे हैं | छात्र राजनीति में कम से…

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राजनीति गाड़ियों के अतिक्रमण से कब मिलेगी सड़कों को मुक्ति ?

गाड़ियों के अतिक्रमण से कब मिलेगी सड़कों को मुक्ति ?

 बरुण कुमार सिंह हम बात सुव्यवस्थित शासन प्रणाली की बात करते हैं तो उसमें बहुत सारी बातें देखने को आती हैं जिसमें केवल सुधार…

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