“क्या हमें अपना व अपने अतीत और भविष्य का पता है?”
Updated: September 21, 2018
मनमोहन कुमार आर्य, हम इस जन्म में मनुष्य योनि में उत्पन्न हुए हैं। हम क्या हैं, यह अधिकांश मनुष्यों को ज्ञात नहीं है। कारण यह…
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अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करता संघ
Updated: September 21, 2018
प्रमोद भार्गव देश के सबसे बड़े और प्रभावशाली सांस्कृतिक संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ‘ ने ‘भविष्य का भारत-संघ का दृश्टिकोण‘ विषय के तारतम्य में अपना…
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संघ की दस्तक सुनें
Updated: September 20, 2018
ललित गर्ग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का तीन का ‘भविष्य का भारत’ विषयक विचार अनुष्ठान अनेक दृष्टियों से उपयोगी एवं प्रासंगिक बना। दिल्ली के विज्ञान भवन…
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अब इंसान ही इंसान को डसने के काम आयेगा
Updated: September 20, 2018
बंद कर दिया है सांपों को सपेरे ने यह कह कर अब इंसान ही इंसान को डसने के काम आयेगा पल्ला झाड़ लेती है पुलिस…
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लुप्तप्राय हो रहे हैं पुरातन संसाधन
Updated: September 20, 2018
अनिल अनूप लोकजीवन में देसी परिवहन के साधनों में ‘बैलगाड़ी’ हमारी परम्परा एवं किसानी संस्कृति का ऐसा मजबूत आधार रही है, जिसके बिना किसान के…
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“आर्यसमाज से जुड़े श्री ओम् प्रकाश गैरोला को सभी बैंको की राष्ट्रीय स्तर की संयुक्त हिन्दी निबंध प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार”
Updated: September 20, 2018
मनमोहन कुमार आर्य, श्री ओम् प्रकाश गैरोला हमारे 40 वर्षों से अधिक समय से एक घनिष्ठ एवं प्रिय मित्र हैं। हम दोनों एक साथ जनवरी,…
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कितना प्रभावी होगा हाथी-पंजे का साथ
Updated: September 20, 2018
जावेद अनीस मध्यप्रदेश में कांग्रेस इस बार वापसी के इरादे से विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी करती हुई दिखाई पड़ रही है, सूबे में पार्टी…
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एक गजल कशिश ए मोहब्बत पर
Updated: September 19, 2018
आर के रस्तोगी कशिश ए मोहब्बत में हर एक चोट खाई हमने हुए जो तुमसे दूर तो सब दूरियां मिटाई हमने करीब थे इतने कि…
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अखिलता की विकल उड़ानों में !
Updated: September 19, 2018
रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’ अखिलता की विकल उड़ानों में, तटस्थित होने की तरन्नुम में; उपस्थित सृष्टा सामने होता, दृष्टि आ जाता कभी ना आता !…
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न रख इतना नाजुक दिल
Updated: September 19, 2018
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ इश्क़ किया तो फिर न रख इतना नाज़ुक दिल माशूक़ से मिलना नहीं आसां ये राहे मुस्तक़िल तैयार मुसीबत को न कर सकूंगा दिल मुंतकिल क़ुर्बान इस ग़म को तिरि ख़्वाहिश मिरि मंज़िल मुक़द्दर यूँ सही महबूब तिरि उल्फ़त में बिस्मिल तसव्वुर में तिरा छूना हक़ीक़त में हुआ दाख़िल कोई हद नहीं बेसब्र दिल जो कभी था मुतहम्मिल गले जो लगे अब हिजाब कैसा हो रहा मैं ग़ाफ़िल तिरे आने से हैं अरमान जवाँ हसरतें हुई कामिल हो रहा बेहाल सँभालो मुझे मिरे हमदम फ़ाज़िल नाशाद न देखूं तुझे कभी तिरे होने से है महफ़िल कैसे जा सकोगे दूर रखता हूँ यादों को मुत्तसिल
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राष्ट्रीय—एकता एक चिंतन
Updated: September 19, 2018
शिवदेव आर्य, किसी भी राष्ट्र के लिये राष्ट्रीय एक ता का होना अत्यन्त आवश्यक है। राष्ट्रीय एकता राष्ट्र को सशक्त व संगठित बनाये रखने की…
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“सृष्टि को बनाने व पालन करने वाला ईश्वर कैसा है?”
Updated: September 19, 2018
मनमोहन कुमार आर्य, हम इस संसार में उत्पन्न हुए और जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जन्म के समय हमने जब पहली बार आंखे खोली तो…
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