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भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देकर भी देश की अर्थव्यवस्था को दी जा सकती है गति

 

देश में संस्कृति की अर्थव्यवस्था पर आज तक ग़ौर नहीं किया गया है और इस तरह के  मुद्दे पर देश में शायद सारगर्भित चर्चा भी नहीं की गई हैं। वैसे तो भारत की संस्कृति हज़ारों सालों से सम्पन्न रही है। लेकिन, हाल ही के इतिहास में ऐसा लगता है कि जैसे भारतीय संस्कृति का दायरा सिकुड़ता चला गया है। देश की संस्कृति जो इसका प्राण है को अनदेखा करके यदि आर्थिक रूप से आगे बढ़ेंगे तो केवल शरीर ही आगे बढ़ेगा और प्राण तो पीछे ही छूट जाएँगे। अतः भारत की जो अस्मिता, उसकी पहिचान है उसे साथ में लेकर ही आगे बढ़ने की आज ज़रूरत है। 

 संस्कृति की अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलू

भारत की जो सांस्कृतिक विविधता एवं सम्पन्नता है उसको सबसे आगे लाकर हम भारत को एक सांस्कृतिक महाशक्ति के रूप में परिवर्तित कर सकते हैं। यह हमारा उद्देश्य एवं आकांक्षा  होनी चाहिए। भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं में मुख्य रूप से शामिल किया जा सकता है – संगीत, नृत्य, फ़ाइन-आर्ट्स, खाद्य संस्कृति, सिनेमा, सांस्कृतिक पर्यटन (जिसमें हेरिटेज, साइट्स, म्यूजीयम, आदि शामिल है) एवं धार्मिक पर्यटन, आदि।

 संस्कृति की अर्थव्यवस्था को आँकना  

विश्व के कई देश अपनी संस्कृति की अर्थव्यवस्था का आँकलन कर चुके हैं और लगातार इस ओर अपना पूरा ध्यान दे रहे हैं। भारत में अभी इस क्षेत्र में ज़्यादा काम नहीं हुआ है क्योंकि हमारी विरासत बहुत बड़ी है एवं बहुत बड़े क्षेत्र में फैली हुई है। दुनिया भर में इसे सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग (CCI – Cultural Cretive Industry) का नाम दिया गया है। UNESCO भी सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग को वैज्ञानिक तरीक़े से आँकने का प्रयास कर रहा है। दुनिया भर में अलग-अलग देशों में इस उद्योग को आँकने के पैमाने उपलब्ध हैं। परंतु, भारत में अभी तक इस क्षेत्र में कुछ ज़्यादा काम नहीं हुआ है। UNESCO के एक आँकलन के अनुसार, विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में 4 प्रतिशत हिस्सा CCI से आता है। अमेरिका जैसे देशों की जीडीपी में तो CCI का योगदान बहुत अधिक है। एक आँकलन के अनुसार, दुनिया भर में सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग एशिया पेसिफ़िक, उत्तरी अमेरिका, यूरोप एवं भारत में विकसित अवस्था में पाया गया है। इस उद्योग में विश्व की एक प्रतिशत आबादी को रोज़गार उपलब्ध हो रहा है। भारत में चूँकि इसके आर्थिक पहलू का मूल्याँकन नहीं किया जा सका है अतः देश में इस उद्योग में उपलब्ध रोज़गार एवं देश के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान सम्बंधी पुख़्ता आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

 भारत में सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग का आकार आँकने के लिए यदि हम चाहें तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दूसरे देशों द्वारा अपनाए जा रहे पैरामीटर का उपयोग कर सकते हैं अथवा इन पैरामीटर में हमारे देश की परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन या संशोधन कर इन्हें उपयोग कर सकते हैं, ताकि हमारे देश की अर्थव्यवस्था में इस उद्योग के योगदान को मूर्त रूप में आँका जा सके एवं इसके योगदान को और कैसे बढ़ाया जा सकता है इस सम्बंध में नीतियाँ बनाई जा सकें।

 मूर्त एवं अमूर्त सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था

संस्कृति की अर्थव्यवस्था को दो भागों में बाँटा जा सकता है। एक अमूर्त सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था, जिसमें सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग के विभिन्न घटकों का ज्ञान शामिल है, जिसका आकड़ों में मूल्याँकन करना बहुत मुश्किल है एवं दूसरे मूर्त सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था, जिसे आँका जाना आसान है, ऊपर आँकड़ों के माध्यम से जितनी भी जानकारी दी गई है, वह मूर्त सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था का ही हिस्सा ही। 

 सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग से निर्यात

अभी हाल ही में दुनिया भर के देशों में सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग के क्षेत्र में  एक अनुसंधान जारी है। इस अनुसंधान के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया जा रहा है कि दुनिया के विभिन्न देशों में सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग से कितना निर्यात किया जाता है तथा निर्यात की दृष्टि से कौन कौन से देश अग्रणी देशों की श्रेणी में हैं। इस दृष्टि से विभिन्न देशों की प्रोफ़ायल भी बनाई जा रही है। भारत से भी सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग के क्षेत्र से निर्यात होता है, इसमें शामिल हैं, क्राफ़्ट, संगीत, सिनेमा, एनिमेशन, फ़ैशन, योगा, आदि। एनिमेशन उद्योग तो भारत में काफ़ी फल फूल रहा है एवं तेज़ गति से आगे बढ़ रहा है।

संस्कृति की अर्थव्यवस्था के विकास हेतु सुझाव

संस्कृति की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहिले तो देश में एक निर्देशिका बनायी जानी चाहिए। देश में किस-किस प्रकार की आर्ट्स उपलब्ध है, कहाँ-कहाँ उपलब्ध है, किस-किस के पास उपलब्ध है, यह सारी जानकारी सूचीबद्ध की जानी चाहिए। सूचीबद्ध करने के बाद, इस कला को विकसित करने एवं इसका वैज्ञानिक तरीक़े से प्रस्तुतीकरण करने के लिए सम्बंधित कलाकार के कौशल विकास की ज़रूरत होगी। हमारे देश में ऐसी कई कलाएँ हैं जो वैसे तो कई सदियों से चली आ रही हैं परंतु अब अदृश्य होती जा रहीं हैं, इन लुप्त हो रही कलाओं को पुनर्जीवित भी किया जाना चाहिए। अतः इस प्रकार की कलाओं की भी सूची बनाई जानी चाहिए। हमारी सांस्कृतिक संरचना को पुनर्जीवित करने के लिए बहुत बड़े निवेश की आवश्यकता भी हो सकती है। इसके बाद हम अपनी सांस्कृतिक विविधता एवं सांस्कृतिक सम्पन्नता को आर्थिक उन्नति में परिवर्तित कर सकते हैं। हमारा देश सांस्कृतिक रूप से एक सम्पन्न देश है केवल हमें इसका उचित तरीक़े से दोहन करने की आवश्यकता है। अमेरिका के फ़्लॉरेन्स ओरेगन की सांस्कृतिक पहिचान पहिले बहुत ज़्यादा नहीं थी परंतु वहाँ के विशिष्ट कलाकारों एवं नागरिकों ने अपनी पैंटिंग्स को स्थानीय चेम्बर ओफ़ कामर्स के सहयोग से एक सलीक़े से प्रस्तुत किया। अब वहाँ पर सैलानी वहाँ की पेटिंग्स की ओर आकर्षित होकर फ़्लॉरेन्स ओरेगन घूमने के लिए जाते हैं। इस प्रकार इस शहर की एक सांस्कृतिक पहिचान विकसित हो गई है। भारत में भी एतिहासिक महत्व के कई नगर हैं जिनका उनके सांस्कृतिक एवं रचनात्मक कार्यों के अनुरूप विकास किया जा सकता है, ताकि विदेशों से सैलानी इन नगरों की ओर आकर्षित हो सकें।

 भारत में खाद्य संस्कृति भी अपने आप में एक बहुत विस्तृत क्षेत्र है। हर देश की अपनी-अपनी खाद्य संस्कृति होती है। भारत तो इस मामले में पूरे विश्व में सबसे धनी देश है। हमारे यहाँ पुरातन काल से देश के हर भाग की, हर प्रदेश की, हर गाँव की, हर जाति की अपनी-अपनी खाद्य संस्कृति है, इसको हम पूरे विश्व में प्रमोट कर सकते हैं।

 किसी समाज का यदि अपनी संस्कृति के प्रति रुझान नहीं है तो उस समाज की संस्कृति का स्तर नीचे गिरता जाता है। यही स्थिति देश की संस्कृति पर भी लागू होती है। जैसे भारत में एक समय पर नृत्य कला इतनी सम्पन्न थी कि लगभग सभी राजे-रजवाड़े एवं सभी समारोहों, धार्मिक समारोह मिलाकर, में नृत्य के बिना कार्य प्रारम्भ एवं सम्पन्न नहीं होता था। परंतु, आज यह कला हम लगभग भूल गए हैं। संगीत, नृत्य, काव्य, साहित्य, मिलकर देश की विभिन्न कलाओं को मूर्त रूप देता है। संस्कृति के अमूर्त रूप को जब तक मूर्त रूप नहीं दिया जाता तब तक आर्थिक पक्ष इसके साथ नहीं जुड़ पाएगा। हमारे देश में घुँघरू को ही लें, इसके भी कई रूप है, कथक नृत्य के लिए अलग हैं, भरतनाट्यम नृत्य  के लिए अलग है, कचिपूडी नृत्य के लिए अलग है। इस प्रकार, कला के इस क्षेत्र में  भारत में बहुत ही सूक्ष्म ज्ञान उपलब्ध है। परंतु, इस प्रकार के ज्ञान को मूर्त रूप देने की ज़रूरत है। आज नृत्य करने वालों एवं घुँघरू बनाने वालों की देश में कोई पूछ नहीं हैं। इस प्रकार तो हम हमारी अपनी कला को भूलते जा रहे है। देश में बुनकर आगे नहीं बढ़ पा रहे है। इनकी कला को जीवित रखने के लिए जुलाहों को आगे बढ़ाने की ज़रूरत है। इस प्रकार की कला को आगे बढ़ाने के लिए न केवल देश की विभिन्न स्तर की सरकारों को बल्कि निगमित सामाजिक जवाबदारी (CSR) के अंतर्गत विभिन्न कम्पनियों को तथा समाज को भी आगे आना चाहिए। विभिन्न कम्पनियाँ निगमित सामाजिक जवाबदारी के अंतर्गत सामान्यतः केवल शिक्षा एवं खेल के क्षेत्र में ही कार्य कर रही हैं, अतः इन्हें अपना दायरा कला के क्षेत्र में भी बढ़ाना चाहिए।

उदाहरण के तौर पर हमारे देश में कुछ बड़े त्योहारों को ही ले लीजिए, जैसे, गणेश उत्सव, ओणम, दुर्गा पूजा, दीपावली एवं होली, आदि ये भी सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। इन्हें कैसे व्यवस्थित किया जा सकता है ताकि देश के नागरिकों में इन त्योहारों के प्रति उत्साह में और भी बढ़ोतरी हो और इन त्योहारों को मनाने का पैमाना बढ़ाया जा सके और इन त्योहारों पर विदेशी पर्यटकों को भी देश में आकर्षित किया जा सके। हालाँकि, हमारे देश में पर्यटन उद्योग भी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, परंतु यह सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग का हिस्सा नहीं है। पर्यटन उद्योग में दूसरे कई पहलू भी जुड़ जाते हैं जैसे होटल उद्योग, इन्फ़्रस्ट्रक्चर उद्योग, वाहन उद्योग, आदि। पर्यटन उद्योग एवं इससे जुड़े दूसरे उद्योग अपने आप में ही आकार में काफ़ी बड़े हैं एवं इनके विकास के लिए नीतिया भी अलग से बनाई जा रही हैं

संस्कृति को एक उद्योग का दर्जा दिया जाना चाहिए। सरकारों, कम्पनियों और समाज को इसमें मिलकर निवेश करने की ज़रूरत है। उदाहरण के तौर पर कई देशों में म्यूजीयम ही देख लीजिए, कुछ इतने आकर्षक रूप से बनाए गए हैं कि विदेशों से भी लोग इन म्यूजीयम को देखने चले आते हैं जबकि हमारे देश के म्यूजीयम में फ़ुटफाल तुलनात्मक रूप से बहुत कम है। इसलिए कहा जा सकता है कि संस्कृति को मूर्त रूप देने के लिए निवेश की आवश्यकता होगी। इंफ़्रास्ट्रक्चर को विकसित करना होगा, इससे फ़ुटफ़ॉल बढ़ेगा और देश में पर्यटन भी बढ़ेगा।     

 

हर देश की अपनी विशेष संस्कृति है और हर देश को इसे मूर्त रूप देने एवं इसे आगे बढ़ाने के लिए अलग अलग रणनीति की आवश्यकता होगी। विकसित देशों ने अपनी संस्कृति की अर्थव्यवस्था को मूर्त  रूप देने में बहुत सफलता पाई है, इसमें वैल्यू एडिशन कर इसे बहुत ही अच्छे तरीक़े से मार्केट किया है, इसीलिए अमेरिका एवं ब्राज़ील जैसे देशों के सकल घरेलू उत्पाद में सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योग का काफ़ी अच्छा योगदान है। भारत में अभी तक संस्कृति की अर्थव्यवस्था पर ज़्यादा ध्यान ही नहीं दिया गया है। हमें, हमारे देश में विभिन कलाओं का ज्ञान अमूर्त रूप में तो उपलब्ध है परंतु उसे विकसित कर मूर्त रूप प्रदान करने की ज़रूरत है एवं इन भारतीय कलाओं से पूरे विश्व को अवगत कराये जाने आवश्यकता है, ताकि विश्व का भारत के प्रति आकर्षण बढ़े। आज के इस डिजिटल युग में तो यह बहुत ही आसानी से किया जा सकता है। कला के अमूर्त रूप को यदि हम डिजिटल स्पेस में ले जाकर स्थापित कर सकें तो इसे विश्व में मूर्त रूप दिया जा सकता है। इस महान कार्य में देश में लगातार प्रगति कर रहे स्टार्टअप उद्योग की भी मदद ली जा सकती है।   

 

दिनांक 26 अक्टोबर 2019 को राज्य सभा टीवी ने अपने देश-देशांतर कार्यक्रम में संस्कृति की अर्थव्यवस्था विषय पर एक विशेष पैनल चर्चा का आयोजन किया था। उक्त लेख इसी पैनल चर्चा पर आधारित है।

 

मीडिया में रिया चालीसा का ही जाप क्यों?

-ः ललित गर्ग:-
भारत में एक नई आर्थिक सभ्यता और एक नई जीवन संस्कृति करवट ले रही है, तब उसके निर्माण में प्रभावी एवं सशक्त भूमिका के लिये जिम्मेदार इलैक्ट्रोनिक एवं प्रिंट मीडिया शायद दिशाहीन है। एक सौ तीस करोड़ की आबादी का यह देश- कोरोना एवं अन्य जटिल समस्याओं से जूझ रहा है, इन समस्याओं एवं अन्य समस्याओं से लड़ते भारत की बहुत सी तस्वीरें बन एवं बिगड़ रही है, तब पिछले लम्बे समय से अभिनेता सुशान्त सिंह राजपूत की मृत्यु को लेकर देश के न्यूज चैनलों में जो ‘प्राइम टाइम युद्ध’ छिड़ा हुआ है एवं प्रिंट मीडिया में बस इसी की चर्चाओं का अंबार लगा है- वह सहज ही दर्शा रहा है कि लोकतंत्र के चैथे पायदान पर कैसे धुंधलकें एवं गैर जिम्मेदार होने के तगमें जड़ रहे हैं। क्या दिखाने एवं छापने के लिये केवल ‘रिया’ ही है? क्या इतनी बड़ी आबादी के देश में यह एक मुद्दा है? सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि खबरों के बाजार में प्रतियोगिता का स्तर किस हद तक गिर गया है।
आम आदमी में आशाओं एवं सकारात्मकता का संचार करने के अनेक मुद्दे हैं, नये औद्योगिक परिवेश, नये अर्थतंत्र, नये व्यापार, नये राजनीतिक मूल्यों, नये विचारों, नये इंसानी रिश्तों, नये सामाजिक संगठनों, नये रीति-रिवाजों और नयी जिंदगी को संगठित एवं निर्मित करने की अनेक हवायें एवं आयाम देश में निर्मित हो रहे हैं, लेकिन मीडिया में उनकी चर्चा न होकर केवल सुशांत एवं रिया पर खबरों एवं विचारों का केन्द्रित होना हमारे मीडिया के गुमराह एवं दिग्भ्रमित होने की स्थितियों को ही उजागर कर रहा है। एक पक्ष सुशान्त मामले की मुख्य आरोपी सुश्री रिया चक्रवर्ती को अपराधी सिद्ध करने पर तुला हुआ है तो दूसरा पक्ष उसे नायिका के रूप मे पेश कर रहा है। दोनों ही पक्ष उत्तेजना को खबर मान बैठे हैं। यह कैसा विरोधाभास है कि एक बेहद संक्रमित एवं जटिल दौर में मीडिया अपनी रचनात्मक भूमिका निभाने से भाग रहा है? जब मामला न्यायालय में विचाराधीन है एवं सीबीआई जैसी सर्वोच्च एजेन्सी जांच में जुटी है, तब मीडिया क्यों अपनी शक्ति को व्यर्थ गंवा रही है। न्यूज चैनलों में गजब का असन्तुलित युद्ध छिड़ा है। मीडिया ने इस बार अपनी सकारात्मक भूमिका का सही अर्थ ही खो दिया है। यद्यपि बहुत कुछ उसे उपलब्ध हुआ है। कितने ही नए रास्ते बने हैं। फिर भी किन्हीं दृष्टियों से वह भटक रहा है। यह विडम्बनापूर्ण ही है कि जब ‘लोकसभा’ के अध्यक्ष श्री ओम बिरला संसदीय समितियों से कहते हैं कि वे उन विषयों पर विचार न करें जो न्यायालय के विचाराधीन हैं और दूसरी तरफ न्यूज चैनल ऐसे विषय की परत-दर-परत समीक्षा कर रहे हैं? जबकि मीडिया को आत्मनिर्भर भारत की एक ऐसी गाथा लिखने में अपनी सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए, जिससे राष्ट्रीय चरित्र बने, राष्ट्र सशक्त हो, न केवल भीतरी परिवेश में बल्कि दुनिया की नजरों में भारत अपनी एक स्वतंत्र हस्ती और पहचान लेकर उपस्थित हो।
मीडिया का कार्य लोगों को जागृत, सजग और जागरूक करने का होता है, उसकी बड़ी जिम्मेदारी है राष्ट्र निर्माण में निष्पक्ष भूमिका का निर्वाह करने की। आम जनता राजनेताओं से अधिक मीडिया पर भरोसा करती रही है, क्योंकि उसी ने आजादी दिलाने में सक्रिय भूमिका निभाई। उसने बिना किसी राजनीतिक दबाव, जाति, धर्म, भाषा, प्रांत के भेदभाव को सत्य को बल दिया। हमारा मीडिया एक जिम्मेदार मीडिया रहा है मगर अब किसी को अपराधी या पाक-साफ करार देने का हक उसे कैसे मिल सकता है? जबकि पूरा मामला जांच के दायरे में है और न्यायालय में अभी पेश होना है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक जांच एजेंसियां अपनी तफ्तीश पूरी करके किसी ठोस नतीजे पर न पहुंचें तब तक मामले से जुड़ा हर व्यक्ति सन्देह के घेरे में रहता है मगर न्यूज चैनलों पर एक तरफ रिया चक्रवर्ती को बेगुनाह साबित करने की कोशिशें हो रही है, तो दूसरी तरफ उन्हें गुनहगार घोषित करने की बात हो रही है। पूरे मामले में हम एक नागरिक के मौलिक अधिकारों की अनदेखी कर रहे हैं।
मीडिया परख का एक आइना है, उसको यदि कल्पना के पंख दिये जाए और सच को देखने की आंख दी जाये तो इसकी आसमानी ऊंचाइयां एवं पाताली गहराइयां स्वयं में एक अन्तहीन समीकरण है। हर भारतीय की गहरी चाह है कि सशक्त भारत निर्माण की दृष्टि से जिन मूल्यों एवं मानकों के लिये मीडिया की सुबह हुई थी, उन मूल्यों को मीडिया कितनी सुरक्षा एवं समृद्धि दे पाया है और उन्हें जी पाया है, एक अन्वेषण यात्रा शुरु की जाने की अपेक्षा है। महत्वपूर्ण बात है कि मीडिया अपनी जिम्मेदारियों को अधिक संभाले। व्यक्ति एवं समाज की हर ईकाई तक पहुंच कर उनकी उपलब्धियों, समस्याओं एवं जीवनशैली की समीक्षा करें, लेकिन अपने स्वार्थ या टीआरपी के चक्कर में केवल किसी रिया में न अटकें। सवाल रिया को अपराधी या निरपराध मानने का नहीं है बल्कि हकीकत की तह तक पहुंचने का है, असलियत निकाल कर बाहर लाने का है मगर न्यूज चैनलों ने इस मामले को अपनी-अपनी नाक का सवाल बना लिया है और वे पक्ष व विपक्ष में धुआंधार विवेचना किये जा रहे हैं। इससे भारत की न्याय एवं जांच व्यवस्था की ही धज्जियां उड़ रही हैं जो कहती है कि केवल कानूनी प्रावधानों से ही किसी भी व्यक्ति को अपराधी घोषित किया जा सकता है। अतः रिया चक्रवर्ती के पक्ष या विपक्ष में अभियान चला कर हम केवल कानून का ही मजाक बनाने की कोशिश कर रहे हैं। जांच एजेंसियों की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे सुशान्त मामले के मीडिया प्रचार के मोह से दूर रहें और अपना कार्य पूरी निष्पक्षता के साथ करें और दुनिया को सच बतायें लेकिन दीगर सवाल यह भी है कि इस देश में रोजाना सैकड़ों आत्महत्याएं होती हैं, सैकड़ों अपराधों के चलते देश बेहाल बना हुआ है, शोषण एवं आर्थिक अपराधों ने देश की अस्मिता एवं अस्तित्व पर प्रश्न खड़े किये है, बेरोजगारी बढ़ रही है, कोरोना का कहर इंसानी जीवन पर मंडरा रहा है, अनेक जांबाज सैनिक सीमाओं की रक्षा करते हुए स्वयं का बलिदान देते हैं, अनेक साहसी नया इतिहास बना रहे हैं, अनेक प्रतिभाओं ने भारत का मस्तक ऊंचा किया है, जबकि फिल्म अभिनेता तो लोगों का केवल मनोरंजन करता है। एक आम नागरिक की जान की कीमत का सही लेखा-जोखा मीडिया की जिम्मेदारी में कब शामिल होगा?
कोरोना महासंकट हो या सीमाओं पर उठापटक इन जटिल स्थितियों के बीच भी हमने देखा है कि कुछ चैनलस् ने जिस आत्मविश्वास से इन संकटों के बीच मीडिया कवरेज किया़, उससे अधिक आश्चर्य की बात यह देखने को मिली कि उन्होंने देश का मनोबल गिरने नहीं दिया। उनसे यह संकेत बार-बार मिलता रहा है कि हम अन्य विकसित देशों की तुलना में कोरोना से अधिक प्रभावी एवं सक्षम तरीके से लडे हैं और उसके प्रकोप को बांधे रखा है। मीडिया की सकारात्मकता एवं साहस के कारण ही ऐसा बार-बार प्रतीत हुआ कि हम दुनिया का नेतृत्व करने की पात्रता प्राप्त कर रहे हैं। हम महसूस कर रहे हैं कि निराशाओं के बीच आशाओं के दीप जलने लगे हैं, यह शुभ संकेत हैं। लेकिन कुछ चैनल ही क्यों? सभी अपनी भूमिका इसी तरह क्यों नहीं निभा रहे हैं, क्यों रिया चालीसा का जाप कर रहे हैं?
आज देश के मीडिया की समृद्धि से भी ज्यादा उसकी साख जरूरी है। विश्व के मानचित्र में भारत का मीडिया अपनी साख सुरक्षित रख पाया तो सिर्फ इसलिए कि उसके पास विरासत से प्राप्त ऊंचा चरित्र है, ठोस उद्देश्य है, सृजनशील निर्माण के नए सपने हैं और कभी न थकने वाले क्रियाशील आदर्श हैं। साख खोने पर सीख कितनी दी जाए, संस्कृति नहीं बचती- यह बात मीडिया को समझनी होगी। मीडिया के भीतर नीति और निष्ठा के साथ गहरी जागृति की जरूरत है। नीतियां सिर्फ शब्दों में हो और निष्ठा पर संदेह की परतें पड़ने लगें तो भला उपलब्धियों का आंकड़ा वजनदार कैसे होगा?

बूढा पीपल हैं कहाँ,गई कहाँ चौपाल !!

— डॉo सत्यवान सौरभ,

अपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल !
बूढा पीपल हैं कहाँ,गई कहाँ चौपाल !!

रही नहीं चौपाल में, पहले जैसी बात !
नस्लें शहरी हो गई, बदल गई देहात !!

जब से आई गाँव में, ये शहरी सौगात !
मेड़ करें ना खेत से, आपस में अब बात !!

चिठ्ठी लाई गाँव से, जब यादों के फूल !
अपनेपन में खो गया, शहर गया मैं भूल !!

शहरी होती जिंदगी, बदल रहा हैं गाँव !
धरती बंजर हो गई, टिके मशीनी पाँव !!

गलियां सभी उदास हैं, सब पनघट हैं मौन !
शहर गए गाँव को, वापस लाये कौन !!

चिठ्ठी लाई गाँव से, जब यादों के फूल !
अपनेपन में खो गया, शहर गया मैं भूल !!

बदल गया तकरार में, अपनेपन का गाँव !
उलझ रहें हर आंगना, फूट-कलह के पाँव !!

पत्थर होता गाँव अब, हर पल करे पुकार !
लौटा दो फिर से मुझे, खपरैला आकार !!

खत आया जब गाँव से, ले माँ का सन्देश !
पढ़कर आंखें भर गई, बदल गया वो देश !!

लौटा बरसों बाद मैं, बचपन के उस गाँव !
नहीं रही थी अब जहाँ, बूढी पीपल छाँव !!

✍ सत्यवान सौरभ

भारतीय भाषाएँ : दशा, दिशा और भविष्य

राहुल देव

सारी भारतीय भाषाएं अपने जीवन के सबसे गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ी हैं। यह संकट अस्तित्व का है, महत्व का है, भविष्य का है। कुछ दर्जन या सौ लोगों द्वारा बोली जाने वाली छोटी आदिवासी भाषाओं से लेकर 45-50 करोड़ भारतीयों की विराट भाषा हिंदी तक इस संकट के सामने अलग-अलग अंशों में लेकिन लगभग अटल और अपरिहार्य दिखते लोप के सामने निरुपाय खड़ी दिखती हैं। भाषाओं का यह संकट अपने दीर्घावधि निहितार्थों और बहुआयामी प्रभावों में भारतीय सभ्यता का संकट बन जाता है। कारण सीधा है। भाषा और संस्कृति,राष्ट्र, राष्ट्बोध और राष्ट्रीयता का गर्भनाल जैसा संबंध है। भाषा इनकी गर्भनाल है। भाषा के बिना किसी समाज/समूह की संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। संस्कृति की सबसे बड़ी, सबसे प्रभावी और शक्तिशाली वाहिका भाषा ही होती है। भाषा में ही संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण उपादान, उसकी चिन्तन-आध्यात्मिक-ज्ञान-साहित्य-शास्त्रीय-लोक संपदा निर्मित, संचारित और प्रवाहित होती है। संस्कृति के अन्य रूप- साहित्य, ललित कलाएं, गीत संगीत, स्थापत्य, वेशभूषा, खानपान, पर्व त्यौहार, सामाजिक रीतियां, परंपराएं, लोकाचार आदि मुख्यतः भाषा के कारण और माध्यम से ही प्रकट होते हैं।100 साल पहले 1918 में चेन्नई में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति स्थापित करने वाले महात्मा गांधी और उसके 40 साल बाद भारत के संविधान निर्माताओं ने भाषा संबंधी प्रावधान बनाते समय इसकी दूर-दूर तक कल्पना नहीं की थी कि जिन महान उद्देश्यों, राष्ट्रनिर्माण के जिन सपनों को सामने रखकर उन्होंने यह पुरुषार्थ किए थे, भारतीय राष्ट्र और उसके भविष्य का जो चित्र उन्होंने अपने सामने रखा था उसका साकार रूप 70 साल में ही इतना अलग, इतना विकृत हो जाएगा।  लेकिन हमारी आंखों के सामने आज जो दृश्य है और निकट भविष्य में आकार लेता दिखाई दे रहा है वह इतना विकराल है, गहरे संस्कृतिमूलक आयामों में राष्ट्र निर्माताओं की कल्पना के इतना विपरीत है कि विश्वास नहीं होता। ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दासता से मुक्त अपनी मौलिक अंतःप्रेरणा और साभ्यतिक आभा के आलोक में भारत एक बार फिर चमचमाकर खड़ा होगा, अपना नवनिर्माण करेगा वह सपना आज अंग्रेज़ी के ऐसे भाषायी साम्राज्यवाद की जकड़ में है जो दिनोंदिन मज़बूत होती जा रही है। १५० वर्षों के प्रयासों के बाद भी १५% भारतीयों की कार्यभाषा बन सकी, अपने भक्तों के सम्मोहन से प्राण वायु पाती अंग्रेज़ी इस देश की ८५% प्रतिभा, उद्यमिता के उच्चतम विकास के आगे पत्थर की दीवार की तरह खड़ी है। अंग्रेजी़ न जानने के कारण उच्च शिक्षा, ऊंचे अवसरों, रोज़गारों से वंचित करोड़ों युवा प्रतिभाएं आज रोज़ कुंठित, अपमानित होने, अपने आत्मसम्मान, आत्मविश्वास को तिल तिल कर मरते देखने, पिछड़ जाने के लिए अभिशप्त हैं। अंग्रेज़ी से वंचित होना दोयम दर्जे का भारतीय होना है। केवल किसी भारतीय भाषा में जीने-काम करने वाला व्यक्ति अंग्रेज़ी वालों के सामने दीन हो जाता है। इस आत्मदैन्य को अपनी बातचीत में अधिक से अधिक अंग्रेज़ी शब्दों, अभिव्यक्तियों को ढूंसता हिन्दुस्तानी ही आज प्रतिनिधि हिन्दुस्तानी है। वर्तमान से अब ज़रा भविष्य में चलते हैं। सन २०५० की कल्पना कीजिए। तब तक हमारा भारत विश्व की एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन चुका होगा। भारतीय प्रतिभा, उद्यमशीलता और हमारी बुनियादी लोकतांत्रिकता विश्वमंच पर भारत का अटल उदय सुनिश्चित कर चुके हैं। चरम गरीबी, कुपोषण, भुखमरी, शैक्षिक-आर्थिक पिछड़ापन बड़ी हद तक मिट चुके होंगे। आम भारतीयों का जीवन स्तर, सुविधाएं काफी ऊपर आ चुके होंगे। देश के ५०-६०% भाग का शहरीकरण हो चुका होगा। आधुनिक सुख सुविधाएं, तकनीकें यंत्र, साधन गांव-गांव तक पहुंच चुके होंगे। सारा देश डिजिटल जीवन पद्धति को बहुत बड़ी हद तक अपना चुका होगा। ब्रॉडबैंड और उसके माध्यम से मिलने वाली अनंत सेवाएं आम हो चुके होंगे। अब कल्पना के घोड़े दौड़ाइए और सोचिए – उस भारत के अधिकतर नागरिक अपने जीवन के सारे प्रमुख काम किस भाषा में कर रहे होंगे? पूरे देश में शिक्षा, प्रशासन, व्यापार, शोध, पत्रकारिता, स्वास्थ्य, न्याय जैसे हर बड़े क्षेत्र में किस भाषा का प्रमुखता से उपयोग हो रहा होगा? वह देश भारत होगा, भिंडिया या सिर्फ़ इंडिया?  उस इंडिया में संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हमारी बड़ी 22 और 16 सौ से अधिक छोटी भाषाओं-बोलियों की स्थिति क्या होगी? कहां होंगी वे? होंगी भी कि नहीं?  मेरा अपना आकलन है कि रहेंगी तो जरूर लेकिन गरीबों की गरीब भाषाएं बनकर। हाशियों की भाषा बन कर। गालियों की भाषा बन कर। गीत-संगीत, मनोरंजन, फिल्में ये भाषाओं में बचे रहेंगे हालांकि इनमें भी तब तक आधी से ज्यादा अंग्रेजी प्रवेश कर चुकी होगी। आज बनने वाली हिंदी फिल्मों में आधी से ज्यादा के शीर्षक अब अंग्रेजी के होते हैं। उनके संवादों में हिंदी नहीं हिंग्लिश ज्यादा होती है। पूरी तरह अंग्रेजी में बनने वाली  फिल्में और नेटफ्लिक्स जैसे आधुनिक मंचों पर भारतीय अंग्रेजी धारावाहिक आम हो चले हैं। यह प्रक्रिया बढ़ती ही जाएगी। भाषाई अखबारों, फिल्मों और धारावाहिकों का विस्तार हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों का आंखों देखा विवरण भी अब हिंदी व भाषाओं में होने लगा है। इस विस्तार पर मुग्ध भाषायी मीडिया और साहित्यकार  अपनी भाषाओं पर किसी तरह के संकट की बात को अरण्य रोदन कह देते हैं। यह दूरदृष्टिहीनता है। भविष्य देखना है तो बच्चों की ओर देखना चाहिए। बच्चों की जो पीढ़ियां अधिकाधिक अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर बड़ी होंगी वे क्या भाषाई अखबारों, साहित्य, पुस्तकों, टीवी समाचारों की पाठक- दर्शक होंगी? हिंदी के कितने लेखकों, पत्रकारों, राजभाषा अधिकारियों के बच्चे हिंदी माध्यम में पढ़ते हैं? इसलिए आज यह जो विस्तार दिख रहा है अगले 20-25 साल का खेल है। उसके बाद ऊपर से नीचे तक अंग्रेजी का ही वर्चस्व हर क्षेत्र में दिखेगा। संसार में लगभग 6000 भाषाओं के होने का अनुमान है। भाषा शास्त्रियों की भविष्यवाणी है कि 21वीं सदी के अंत तक इनमें केवल 200 भाषाएं जीवित बचेंगी।  इनमें भारत की सैकड़ों भाषाएं होंगी। भारत की आदिवासी भाषाओं में 196 तो अभी यूनेस्को के अनुसार ही गंभीर संकटग्रस्त भाषाएं हैं। संकटग्रस्त भाषाओं की इस वैश्विक सूची में भारत सबसे ऊपर है। यूनेस्को का भाषा एटलस 6000 में से 2500 भाषाओं को संकटग्रस्त बताता है। यूनेस्को के पूर्व महानिदेशक कोचिरो मत्सूरा ने  कहा था “एक भाषा की मृत्यु उसे बोलने वाले समुदाय की अमूर्त विरासत, परंपराओं और वाचिक अभिव्यक्तियों का नष्ट हो जाना है।” भारत की अनुमानित 1957 में कम से कम 1416 लिपिहीन मातृभाषाएं हैं। ये सब आसन्न संकट में हैं। पर भारत के प्रभु और बुद्धिजीवी वर्ग तथा सामान्य जन को इन छोटी भाषाओं की तो क्या अपनी बड़ी भाषाओं की भी चिन्ता और उनके संकट को देखने समझने, बचाने में कोई रुचि नहीं है।ये वे विशाल, १० लाख से ज्यादा जनसंख्या वाली भाषाएँ हैं जिन्हें भारत के 90% लोग बोलते बरतते हैं। किसी भी समाज में भाषा के नियामक-निर्णायक तत्व क्या हैं? भाषा और समावेशी, समतामूलक, लोकतांत्रिक विकास का क्या संबंध है? भाषा और शिक्षा का क्या संबंध है? भाषा का राष्ट्र, राष्ट्र भाव और राष्ट्र निर्माण से क्या संबंध है? राष्ट्र बोध के केंद्रीय महत्व के इन बिंदुओं पर स्वतंत्रता के बाद भारत में सिर्फ एक बार 1967 में उच्चतम स्तर पर समग्रता से विचार मंथन हुआ था राष्ट्रीय उच्चतर अध्ययन संस्थान, शिमला में। उसके बाद उस तरह का कोई विचार कुंभ भाषाओं की बदलती स्थितियों, चुनौतियों और भविष्य पर हुआ हो ऐसा मेरी जानकारी में नहीं है। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं है कि विरल भाषिक समृद्धि और विविधताओं के भारत के पास 70 साल में भी अपनी कोई भाषा नीति नहीं है,  न ही उसको बनाने का कोई गंभीर प्रयास किया गया है। अब भी अगर वह नहीं बनाई गई तो अपनी इस अमूल्य और आधारभूत सांस्कृतिक संप्रभुता से दो-तीन पीढ़ियों में ही वंचित होकर हम पश्चिम, मुख्यतः अमेरिका के सांस्कृतिक, बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक उपनिवेश बन जाएंगे। भाषा मनुष्य की श्रेष्ठतम संपदा है। सारी मानवीय सभ्यताएं भाषा के माध्यम से ही विकसित हुई हैं। आदिम समाज तो हो सकते हैं लेकिन आदिम भाषाएं नहीं होतीं। संचार के वाचिक और लिखित माध्यम रूप में यह एक समाज के भावनात्मक जीवन और संस्कृति का सर्वोत्तम उद्घोष है। एक सांस्कृतिक संस्थान होने के कारण यह अपने बोलने बरतने वालों को एक जन्मसिद्ध अधिकार के रूप में पहचान और अद्वितीयता देती है। जातीयता का एक प्रबल कारक होती है। समाज के सभी क्षेत्रों में- प्रबंधन, प्रशासन, वैज्ञानिक सूचनाओं, शिक्षा और शोध का माध्यम हो या ज्ञान निर्माण का, भाषा विकास का सबसे शक्तिशाली उपकरण है। भाषा के विकास को हम उन भूमिकाओं से परिभाषित कर सकते हैं जिन्हें वह अपने समुदाय में निभाती है और  जिन क्षेत्रों में वह प्रमुखता से इस्तेमाल की जाती है। किसी समुदाय में कोई भाषा कितनी प्रतिष्ठा पाती है यह सीधा इस बात पर निर्भर करता है कि वह भाषा अपने समुदाय की कितनी तरह की अभिव्यक्ति-आवश्यकताओं को पूरा करती है – जैसे व्यापार, अर्थतंत्र, तकनीकी, नवाचार, शोध, मौलिक वैज्ञानिक चिंतन,  उद्यमिता, प्रबंधकीय निर्णय आदि। एक बहुभाषी और बहुजातीय समाज में उसकी आधिकारिक भाषा/भाषाएँ सभी सभी वर्गों को तभी स्वीकार्य होती हैं जब वे शिक्षा, आजीविका, व्यवसाय, शोध, तकनीक, नवाचार, विकास और प्रशासनात्मक, प्रबंधकीय निर्णय प्रक्रियाओं की प्रमुख भाषा होती है। भाषाओं के संकट से भी बड़ा संकट है उसको न देख पाना।  कमोबेश यह समस्या सारे भाषा समूहों के साथ है। लेकिन हिंदी वालों के साथ तो रोग की हद तक है। बड़े-बड़े हिंदी के विद्वान और पत्रकार प्रतिप्रश्न करते हैं कि जब हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ रही है, हिंदी में सबसे ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं, हिंदी फिल्म और टीवी उद्योग बढ़ रहा है तब हिंदी के सामने संकट कैसे हो सकता है? संक्षिप्त उत्तर यह है। अब हम वाचिक युग में नहीं लिखित और डिजिटल युग में हैं। इसलिए भाषा का बोली रूप उसे बनाए रखने और बढ़ाने के लिए अपर्याप्त है। यह देखने की बजाय कि हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं को समझने-बोलने वालों की संख्या कितनी बढ़ रही है जो हमें देखना चाहिए वह यह है कि उस भाषा को अपनी इच्छा से पढ़ने-लिखने और सभी गंभीर कार्य क्षेत्रों में व्यवहार करने वाले लोग बढ़ रहे हैं या घट रहे हैं? उस भाषा माध्यम के विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या घट रही है या बढ़ रही है? ज्ञान ग्रहण, ज्ञान निर्माण, भविष्य निर्माण, न्याय,विज्ञान, प्रशासन, व्यापार, प्रबंधन, शोध आदि जीवन के निर्णायक क्षेत्रों में उस भाषा का प्रयोग घट रहा है या बढ़ रहा है? सबसे बड़ा प्रश्न जिसे पूछते ही आपके सामने अपनी भाषा का भविष्य साकार खड़ा हो जाएगा यह है – आपकी भाषा की मांग कितनी है? है कि नहीं? घट रही है या बढ़ रही है? इस कसौटी पर हिंदी सहित सारी भारतीय भाषाओं को कसें तो उत्तर बिल्कुल साफ है। आज देश के छोटे से छोटे गांव में गरीब से गरीब व्यक्ति अपने बच्चों के लिए सिर्फ एक भाषा मांग रहा है – अंग्रेजी। किसी भी भारतीय भाषा की मांग नहीं है भारत में। इस बाजार युग में जिस चीज की मांग नहीं है वह कैसे चलेगी, कैसे बचेगी?  अभी देश के 30 से 40% बच्चे अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। भले ही कितनी अधकचरी अंग्रेजी वहां पढ़ाई जाती हो, खुद शिक्षकों को ठीक से आती हो या नहीं, यह निर्विवाद रूप से सबका अनुभव है कि जो बच्चा बचपन से एक बार अंग्रेजी माध्यम में पढ़़ गया वह कभी अपने परिवार और परिवेश की, विरासत की भाषा का नहीं होता। उसमें अपनी मातृभाषा/परिवेश भाषा से प्रेम,  लगाव, गर्व की जगह एक हेयभाव और नापसंदगी पैदा होती जाती है जो आयु के साथ बढ़ती ही रहती है। अपनी भाषा से यह दूरी उसे भाषा से परिचित तो बनाए रखती है लेकिन उसमें कुछ भी गंभीर पढ़ने वाला और काम करने वाला नहीं रहने देती। भारत के हर मध्यवर्गीय परिवार की यही स्थिति है। 10 साल पहले के एक सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार भारत की सभी भाषा-माध्यम विद्यालयों में प्रवेश दर हर साल घट रही थी। सिर्फ दो भाषाएं अपवाद थीं- अंग्रेजी और हिंदी। अंग्रेजी में यह वार्षिक वृद्धि दर 250% से अधिक थी। हिंदी में लगभग 35%। अब जब हिंदीभाषी राज्यों में भी सरकारें हिंदी-माध्यम विद्यालय बंद या बदल कर उन्हें अंग्रेजी-माध्यम करती जा रही है तो हिंदी का भविष्य स्पष्ट है। ठीक यही चीज़ हर प्रदेश में हो रही है।यूनेस्को के कहने पर विश्व के श्रेष्ठ भाषाविदों ने किसी भी भाषा की जीवंतता और संकटग्रस्तता नापने के लिए 9 कसौटियां निर्धारित की हैं। पहली है, एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी के बीच उस भाषा का अंतरण, जाना कितना हो रहा है? दूसरी कसौटियों में प्रमुख हैं ज्ञान विज्ञान के आधुनिक क्षेत्रों में उस भाषा में काम हो रहा है या नहीं,  घट रहा है या बढ़ रहा है? वह भाषा नई तकनीक और आधुनिक माध्यमों को कितना अपना रही है? उस भाषा के विविध रूपों का दस्तावेजीकरण कितना और किस स्तर का है? उस समाज की महत्वपूर्ण राजकीय/अराजकीय संस्थाओं की उस भाषा के बारे में नीतियां और रुख़ कैसे हैं? अंतिम लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण कसौटी है उस भाषा समुदाय का अपनी भाषा के प्रति रुख़ क्या है, भाव क्या है? इनमें से किसी भी कसौटी पर किसी भी भारतीय भाषा को तोल लीजिए तुरंत समझ में आ जाएगा कि भविष्य के संकेत संकट की ओर इशारा करते हैं या विकास-विस्तार की ओर।एक बार फिर २०५० पर चलते हैं। उस वैश्विक महाशक्ति, आधुनिक, वैश्वीकृत, संपन्न-सबल इंडिया में जब हर नागरिक अपने जीवन का हर महत्वपूर्ण काम सिर्फ अंग्रेजी में कर रहा होगा, उसमें भारत, भारतीयता और भारतीय सभ्यता ने ५०००-६००० वर्ष की अपनी अविच्छिन्न यात्रा में जो समूची साहित्यिक-सांस्कृतिक-ज्ञान-लौकिक-आध्यात्मिक संपदा अर्जित की है वह इस संपदा की निर्मात्री भाषाओं के बिना कैसे जीवंत और जीवित रहेगी, अगली पीढ़ियों तक कैसे पहुंचेगी? क्या अंग्रेज़ी यह कर सकती है? रंगरूप में भारतीय लेकिन दिलो-दिमाग, जीवन शैली, सोच-संस्कार से अमेरिका के उन नकलची नागरिकों का भारत-बोध, अपनी साभ्यतिक ऊंचाईयों-विरासत की स्मृति, सांस्कृतिक संप्रभुता का अहसास कैसा होगा?  कम से कम मुझे स्पष्ट दिखता है कि समूची भारतीय सभ्यता लोप, विस्मृति और भयानक हाशियाकरण की कगार पर खड़ी है। उसके पास शायद सिर्फ दो पीढ़ियों का समय है बचने के लिए। यानि हमारी और हमारे बच्चों की पीढ़ी आज अगर चाहे, राजसत्ता को बुद्धि आ जाए, समूचा राष्ट्र संकल्पबद्ध हो, राष्ट्रीय और निजी महत्व के हर क्षेत्र में भारतीय भाषाओं को स्थापित करने में जुटे तो इस प्रक्रिया को हम रोककर उलट सकते हैं। वरना शैशव से ही अंग्रेजी/अंग्रेज़ियत में पली, पढ़ी और बढ़ी पीढ़ियां चाहेंगी भी तो इस संपदा और सभ्यता को पुनर्जीवित करना उनके लिए असंभव नहीं तो असंभव जैसा जरूर होगा। यहां महत्वपूर्ण हो जाती है प्रत्येक भाषा में काम करने,, लिखने वाले साहित्यकारों-लेखकों-विद्वानों- बुद्धिजीवियों-शिक्षाविदों, मीडिया, पत्रकारों और संपूर्ण नागर समाज की भूमिका। यही वे वर्ग हैं जो अपने अपने क्षेत्रों में, अपने भाषा समाज में एक विमर्श उत्पन्न करते हैं, चिंतन को आगे बढ़ाते हैं, महत्वपूर्ण चिंताओं,संकटों और सरोकारों के प्रति समाज को जागरूक करते हैं।कमाल यह है कि ऐसे अभूतपूर्व प्राणांतक संकट से देश का लगभग समूचा नियंता प्रभु वर्ग, नीति निर्माता, बुद्धिजीवी, शिक्षाविद, राजनीतिक दल, संसद, विधानसभाएं, सरकारें, मीडिया और व्यापक नागर समाज अनभिज्ञ और इसलिए उदासीन दिखते हैं।  इस विराट सभ्यतामूलक संकट का मुख्य कारण, उस का सबसे बड़ा स्रोत सीधा और स्पष्ट है – अंग्रेज़ी । और उसके प्रति हमारा शर्मनाक दासतापूर्ण और शर्मनाक सम्मोहन।  भारतीय चरित्र इजराइली चरित्र जैसा नहीं है जिसने 2000 साल से मृत पड़ी हिब्रू को आज वैज्ञानिक शोध, नवाचार और आधुनिक ज्ञान निर्माण की श्रेष्ठतम वैश्विक भाषाओं में एक बना दिया है। जिसके बल पर 40 लाख की जनसंख्या वाला इजरायल एक दर्जन से ज्यादा विज्ञान के नोबेल पुरस्कार जीत चुका है। सारे इस्लामी देशों की शत्रुता के बावजूद अपनी पूरी अस्मिता, धमक और शक्ति के साथ अजेय बना विश्व पटल पर विराजमान है। विश्व गुरु बनने के सपने देखता भारत चाहे तो इजराइल से प्रेरणा ले सकता है।

वेदाध्ययन व वेद प्रचार से अविद्या दूर होकर विद्या वृद्धि होती है

-मनमोहन कुमार आर्य

                मनुष्य एक ज्ञानवान प्राणी होता है। मनुष्य के पास जो ज्ञान होता है वह सभी ज्ञान स्वाभाविक ज्ञान नहीं होता। उसका अधिकांश ज्ञान नैमित्तिक होता है जिसे वह अपने शैशव काल से माता, पिता व आचार्यों सहित पुस्तकों व अपने चिन्तन, मनन, ध्यान आदि सहित अभ्यास व अनुभव के आधार पर अर्जित करता है। मनुष्य एक एकदेशी व अल्पज्ञ प्राणी होता है। अतः इसका ज्ञान सीमित होता है। स्वप्रयत्नों से उपार्जित सभी ज्ञान प्रामाणित नहीं होता। ज्ञान की प्रामाणिकता की पुष्टि उसके वेदानुकूल होने पर होती है। प्राप्त ज्ञान के सत्य व असत्य की परीक्षा के लिए बने सिद्धान्तों का उपयोग करके की जाती है। सत्य ज्ञान का सृष्टिक्रम के अनुकूल तथा तथ्यों पर आधारित व तर्क एवं युक्तियों से सिद्ध होना आवश्यक होता है। तर्क ही एक प्रकार से ऋषि व विद्वान होता है जिसकी सहायता से हम किसी बात के तर्कसंगत व सत्य होने की परीक्षा कर उसे स्वीकार या अस्वीकार करते हैं। यही विधि देश-देशान्तर में सर्वत्र अपनाई जाती है।

                धर्म व मत-पन्थों की मान्यताओं के सन्दर्भ में भी सत्य की परीक्षा करने के सिद्धान्त लागू होते हैं। पांच हजार वर्ष हुए महाभारत युद्ध के बाद इतिहास में ज्ञान के सत्यासत्य होने की परीक्षा का प्रयोग ऋषि दयानन्द ने किया था और उन्होंने सभी धर्म व समाज विषयक मान्यताओं की समीक्षा व परीक्षा कर सत्य को प्राप्त कर उसे देश की जनता व समाज से साझा किया था। उन्होंने वेदाध्ययन, अपने ज्ञान व अनुभव के आधार पर जिन सत्य सिद्धान्तों को जाना था, उसका उन्होंने देश देशान्तर में प्रचार भी किया। इसका परिणाम यह हुआ कि देश से अविद्या दूर होने के साथ विद्या की वृद्धि व ज्ञान का प्रकाश हुआ। आज हम आधुनिक भारत व अपने समाज को मध्यकालीन समाज से कोसों दूर पाते हैं। मध्यकाल में हमारा देश व समाज धार्मिक एवं सामाजिक अन्धविश्वासों, पाखण्डों, अनेकानेक सामाजिक कुरीतियों से आबद्ध हो गया था जिससे देश व समाज को ऋषि दयानन्द ने ही बाहर निकाला था। आज का समाज ज्ञान व विज्ञान से युक्त तथा विद्या से भी आंशिक रूप से युक्त होने सहित अज्ञान व अविद्या से भी युक्त है। आज के समाज का बहुत बड़ा भाग ज्ञान व विद्या प्राप्त करने के साधनों से दूर है और जिन मनुष्यों को ज्ञान प्राप्ति के अवसर मिलते भी हैं, वह सभी लोग अपने हित व स्वार्थों के कारण उस ज्ञान विज्ञान व विद्या के सिद्धान्तों को जानने का प्रयत्न नहीं करते और न ही उन्हें अपनाते हैं। अपने स्वार्थों पर विजय प्राप्त किये बिना हम सत्य व सत्य ज्ञान से युक्त आचरण को प्राप्त नहीं कर सकते। सत्य को जानना, प्राप्त करना, सत्य का आचरण करना व दूसरों से करवाना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। इसे प्राप्त होकर ही मनुष्य दुःखों से सर्वथा दूर तथा कल्याण को प्राप्त होते हंै। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हम अपने पूर्वज ऋषि व मुनियों के जीवन सहित राम, कृष्ण एवं दयानन्द आदि महापुरुषों के जीवन में भी देखते हैं। इन महापुरुषों से प्रेरणा ग्रहण कर हम अपने जीवन को अविद्या व दुःखों से मुक्त करने सहित जीवन को उत्तम व श्रेष्ठ कर्मों से युक्त बनाकर हम जीवन को सफल कर सकते हैं।

                मनुष्य जीवन के उद्देश्य पर विचार करते हैं तो यह विद्या की प्राप्ति ही सिद्ध होता है। बिना विद्या के मनुष्य पशुओं के समान अज्ञान से युक्त ही होता है। ज्ञान व विद्या मनुष्य को मनुष्यता व देवत्व प्रदान करते हैं। जो मनुष्य सत्य ज्ञान विद्या से विहीन होता है वह अच्छा व उत्तम मनुष्य नहीं कहा जा सकता। ज्ञान विज्ञान युक्त मनुष्य जो सत्य व श्रेष्ठकर्मों का आचरण करता है वही मनुष्य प्रशंसनीय एवं यशस्वी होता है तथा देश व समाज में आदर व सम्मान पाता है। अतः विद्या प्राप्ति में सभी मनुष्यों को तत्पर रहना चाहिये। यह जान लेने के पश्चात यह प्रश्न होता है कि विद्या प्राप्ति के साधन क्या हैं? इसका उत्तर है कि हमें शब्द, अर्थ, इनका परस्पर संबंध जानने के साथ संस्कृत आदि भाषाओं के व्याकरण को जानकर वेद एवं वैदिक साहित्य का अध्ययन करना होता है। वेद एवं वैदिक साहित्य का अध्ययन कर ही विद्या की प्राप्ति होती है। आधुनिक विज्ञान तो हम विज्ञान की पुस्तकों में पढ़ सकते हैं परन्तु उससे मनुष्य सभ्य, शिष्ट, संस्कारी तथा सज्जन प्रकृति व स्वभाव का बनता हो, यह आवश्यक नहीं है। मनुष्य को सुसंस्कृतज्ञ व संस्कारी बनाने के लिये उसका वेद एवं वैदिक साहित्य का अध्ययन करना आवश्यक होता है। ऐसा ही प्राचीन काल से होता आया है। यही कारण था कि वेदाध्ययन से ही हमारे देश में ऋषि परम्परा चली और लोग ऋषियों से ज्ञान विज्ञान व आचरण की शिक्षा लेकर सभ्य व संस्कारी मनुष्य बनते थे जिससे देश व समाज में एक सुखद एवं समरसता का वातारण बनता था। समाज अन्धविश्वासों तथा कुरीतियों से रहित होता था और सर्वत्र सुख व शान्ति का वातावरण हुआ करता था। आज भी यदि वेदों के सत्य अर्थों का प्रचार हो और सभी मनुष्य व सम्प्रदाय सत्य को स्वीकार कर वेदों की शरण में आ जाये, तो हमारी पृथिवी स्वर्ग का धाम बन सकती है, ऐसा वैदिक समाज शास्त्री विद्वान स्वीकार करते हैं। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये ही ऋषि दयानन्द ने अपना जीवन वेद, वैदिक साहित्य, वेद के सत्यार्थ, ईश्वर व जीवात्मा के यथार्थ स्वरूप को जानने, ईश्वर की उपासना की सत्य एवं कारगर विधि, मनुष्य के भिन्न भिन्न अवस्थाओं में कर्तव्य आदि को जानने व उनके प्रचार में लगाया था। उसे जान लेने के बाद उन्होंने विश्व के कल्याण के उद्देश्य से ही इन विचारों व मान्यताओं का देश-देशान्तर में प्रचार प्रसार किया और इसी के लिये उन्होंने अपने जीवन का बलिदान भी किया। अतः जीवन की उन्नति व सफलता के लिये सभी मनुष्यों को इसी मार्ग को अपनाना चाहिये। इसी पर चलकर उन्हें धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। सभी मनुष्य सुख व शान्ति से जीवन व्यतीत करते हुए स्वस्थ एवं बलवान होकर दीर्घायु को प्राप्त कर मोक्षगामी वा मोक्ष के निकट व निकटतर हो सकते हैं। यही मानवमात्र के लिये अभीष्ट व प्राप्तव्य है।

                वेदों से अविद्या दूर होती है इस बात को जानने के लिये यह जानना आवश्यक है कि वेद मनुष्य रचित रचना व ज्ञान न होकर सृष्टि के आरम्भ में सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा द्वारा अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न चार ऋषियों को दिया गया ज्ञान है। परमात्मा सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान तथा इस सृष्टि का कर्ता व धर्ता है। अतः परमात्मा को इस सृष्टि के बारे में समस्त व पूर्ण ज्ञान है। ऐसा ही ज्ञान की दृष्टि से पूर्ण ज्ञान वेदों में मिलता है। वेदों का ज्ञान भ्रान्तियों से रहित व सभी भ्रान्तियों को दूर करने वाला होता है। यह ज्ञान ईश्वर ने चार ऋषियों को किस विधि से दिया और उन ऋषियों ने इसका शेष मनुष्यों तक प्रचार किस प्रकार से किया, इसे ऋषि दयानन्द के विश्व प्रसिद्ध महनीय ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश को पढ़कर जाना जा सकता है। वेदों की तरह ही सत्यार्थप्रकाश भी अविद्या को दूर करने वाला ग्रन्थ है। गुजरात प्रान्त में जन्में और संस्कृत के शीर्ष विद्वान होकर भी ऋषि दयानन्द ने अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश की हिन्दी में रचना व प्रचार कर देश की सामान्य जनता के प्रति परोपकार का महान कार्य किया है। यदि यह ग्रन्थ हिन्दी में न होता तो इससे देश के करोड़ों लोगों को जो लाभ हुआ है वह न होता। इससे एक सामान्य व साधारण मनुष्य भी धर्म विषयक गहन तत्वों को जान सकता है व असत्य को छोड़कर सकता है। सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन कर मनुष्य की सभी भ्रान्तियां दूर हो जाती हैं। आत्मा सत्य ज्ञान से प्रकाशित हो जाता है। ईश्वर व जीवात्मा का ठीक ठीक यथार्थ ज्ञान होता है।

                ज्ञान व विज्ञान के क्षेत्र में सबसे अधिक महत्व ईश्वर व जीवात्मा का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना ही है। यह ज्ञान मत-मतान्तरों के अविद्यायुक्त ग्रन्थों से नहीं होता। इस आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति मनुष्य को वेद, उपनषिद, दर्शन तथा सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों से ही होती है। मनुष्य की अविद्या दूर हो जाने पर वह सत्कर्मों व सत्याचरण में प्रवृत्त होता है। सत्याचरण व ईश्वर की सत्य विधि से उपासना ही मनुष्य का एकमात्र सत्य धर्म होता है। यह भी ज्ञातव्य है कि संसार में धर्म एक ही है और वह सत्य वैदिक मान्यताओं व सिद्धान्तों का नाम है। वेद के सभी सिद्धान्त एवं मान्यतायें असत्य व अज्ञान से रहित तथा सद्ज्ञान व विद्या से युक्त हैं। वेदों का अध्ययन कर तथा वेदानुकूल योगदर्शन के अभ्यास से मनुष्य ध्यान व समाधि को प्राप्त होकर ईश्वर का प्रत्यक्ष व साक्षात्कार तक कर सकता है। ईश्वर का साक्षात्कार होने पर ही मनुष्य की समस्त अविद्या दूर होती है। वह जन्म व मरण के चक्र से मुक्त होकर ईश्वर के सान्निध्य में निवास करने की अवस्था मोक्ष को प्राप्त होता है। यही वेदाध्ययन या वेदप्रचार का महत्व है। ईश्वर व आत्मा का ज्ञान, वेद विहित यौगिक विधि से जीवनयापन व इससे प्राप्त सुख व कल्याण अन्यथा प्राप्त नहीं होता। वैदिक जीवन शैली वा जीवन पद्धति ही संसार में श्रेष्ठतम जीवन शैली है। इसी की शरण में आकर मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति होती है। इसी कारण से वैदिक संस्कृति को प्रथम विश्ववारा संस्कृति कहा जाता है। संसार में विश्व के सभी लोगों की वरणीय एक ही संस्कृति वैदिक संस्कृति है जो मनुष्य का पूर्ण विकास कर उसे जन्म व मृत्यु के बन्धनों से मुक्त कर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति कराती है। यह लाभ वेदाध्ययन व वेदप्रचार से अविद्या दूर होने पर प्राप्त होता है। इसीलिये हमने आज इसे अपने लेख का विषय बनाया। हम आशा करते हैं कि पाठक इस लेख की विषय-वस्तु से लाभ को प्राप्त होंगे। ओ३म् शम्

धर्मनिरपेक्ष शब्द को हटाने की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की शरण

अशोक प्रवृद्ध

भारत विभाजन के पश्चात आज तक के काल में केंद्र की सता में सतासीन सरकारों के आचरण के अवलोकन से यह सिद्ध होता है कि भारत की सरकारें धर्मनिरपेक्षता का सिर्फ ढिंढोरा ही पीटती है, और धर्म निरपेक्षता के नाम पर बहुसंख्यक हिंदुओं के हितों की बलि देकर मुसलमानों और ईसाईयों के हितों को अधिक हवा दे अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीति को बढ़ावा दे रही है। सरकारें सच्चे अर्थों में धर्मनिरपेक्षता का पालन न करके पार्टी भक्ति और कुर्सी भक्ति के कारण हिंदुओं के हितों को तिलांजली दे रही है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि सरकार किसी धर्म विशेष का प्रचार नही करेगी और न ही उसे विशेष संरक्षण देगी, जबकि भारत विभाजन के पूर्व की विदेशी शासक व बाद की सरकारें ऐसा ही कर रही है, और बहुसंख्यक हिंदू जाति के हितों पर कुठाराघात करके मुसलमानों व ईसाईयों को प्रोत्साहित करने हेतु राष्ट्रविरोधी तत्वों को बढ़ावा दे रही है। यह राष्ट्रीय नेताओं के दोहरे मानदण्ड और दोहरे आचरण का द्योत्तक है। 

उल्लेखनीय है कि हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता के अर्थ और इसे सरकारी नीतियों में किस सीमा तक लागू किया जाना अपेक्षित है, इस विषय पर लम्बे समय से बहस होती रही है, लेकिन इसका समुचित उत्तर व समाधान अब तक निकाला नहीं जा सका है। इसके विरोधियों का मानना है कि धर्मनिरपेक्ष शब्द अपने आप में ही बहुत गलत है, धर्म से निरपेक्ष कोई नहीं हो सकता। सरकार के परिप्रेक्ष्य में इसे देखा जाए तो वह व्यक्ति के आत्मिक और जागतिक कल्याण के लिए जितने भी उपाय कर सकती है, वह सारे उपाय धर्म की श्रेणी व परिभाषा में आते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो कोई भी सरकार अपने आप में धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकती। इसके विपरीत धर्म को व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला मानने वालों की भी कमी नहीं है। समय -समय पर इसे हटाने की मांग को लेकर विभिन्न मंचों से आवाजें उठती रही हैं, लेकिन इस पर कोई स्पष्ट निर्णय लेने से सभी कतराते रहे हैं। भाजपा की स्पष्ट बहुमत की मोदी सरकार आने के बाद भारत के बहुसंख्यकों में यह आश बंधी थी कि इस पर निर्णय लेने का अब उचित समय आ गया है, लेकिन मोदी सरकार के द्वारा भी इस पर  सकारात्मक कदम उठाने के कोई संकेत अब तक नहीं मिल सके हैं, जिससे बहुसंख्यक जनता नाउम्मीद होती जा रही है। ऐसी तंग तबाह परिस्थितियों में भारत की बहुसंख्यक जनता की ओर से पेशे से अधिवक्ता दो बन्धुओं, बलराम सिंह और करुणेश कुमार शुक्ला ने अपने अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका विगत जुलाई माह में दायर की है, जिसमें संविधान की प्रस्तावना में बाद में जोड़े गए दो शब्द समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष को हटाने की मांग करते हुए कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय  यह घोषित करे  संविधान के प्रस्तावना में दिये गये समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा गणतंत्र की प्रकृति बताते हैं, और ये सरकार की संप्रभु शक्तियों और कामकाज तक सीमित हैं, ये आम नागरिकों, राजनैतिक दलों और सामाजिक संगठनों पर लागू नहीं होता। इसके साथ ही याचिका में जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 29ए (5) में दिये गये शब्द समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष को भी रद्द करने की मांग की गई है।

दायर याचिका में कहा गया है कि ये दोनों शब्द मूल संविधान में नहीं थे। इन्हें 42वें संविधान संशोधन के जरिये 3 जनवरी 1977 को जोड़ा गया। जब ये शब्द प्रस्तावना में जोड़े गए उस समय देश में आपातकाल लागू था। इस पर सदन में बहस नहीं हुई थी, ये बिना बहस के पास हो गया था। कहा गया है कि संविधान सभा के सदस्य केटी शाह ने तीन बार धर्मनिरपेक्ष (सेकुलर) शब्द को संविधान में जोड़ने का प्रस्ताव दिया था लेकिन तीनों बार संविधान सभा ने प्रस्ताव खारिज कर दिया था। बीआर अंबेडकर ने भी प्रस्ताव का विरोध किया था। केटी शाह ने पहली बार 15 नबंवर 1948 को सेकुलर शब्द शामिल करने का प्रस्ताव दिया जो कि खारिज हो गया। दूसरी बार 25 नवंबर 1948 और तीसरी बार 3 दिसंबर 1948 को शाह ने प्रस्ताव दिया लेकिन संविधान सभा ने उसे भी खारिज कर दिया। याचिका में कहा गया है कि अनुच्छेद 14,15 और 27 सरकार के धर्मनिरपेक्ष होने की बात करता है यानि सरकार किसी के साथ धर्म, भाषा,जाति, स्थान या वर्ण के आधार पर भेदभाव नहीं करेगी। लेकिन अनुच्छेद 25  इस्लाम और ईसाईयत को मानने वाले नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है जिसमें व्यक्ति को अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानने और उसका प्रचार करने की आजादी है। कहा गया है कि लोग धर्मनिरपेक्ष नहीं होते, सरकार धर्मनिरपेक्ष होती है। याचिका में जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में 15 जून 1989 को संशोधन कर जोड़ी गई धारा 29ए (5) से भी सेकुलर और सोशलिस्ट शब्द हटाने की मांग है। इसके तहत राजनैतिक दलों को पंजीकरण के समय यह घोषणा करनी होती है कि वे धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत का पालन करेंगे। कहा गया है कि जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 कहती है कि धर्म के आधार पर वोट नहीं मांगेगे लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि धर्म के आधार पर संगठन नहीं बना सकते। याचिका में 2017 के सुप्रीम कोर्ट के अभिराम सिंह के फैसले में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के अल्पमत के फैसले का हवाला दिया गया है जिसमें कहा गया है कि संविधान को यह पता है कि पूर्व में जाति, धर्म, भाषा, आदि के आधार पर भेदभाव और अन्याय हुआ है। इसकी आवाज उठाने के लिए संगठन बना सकते हैं तथा चुनावी राजनीति में इस आधार पर लोगों को संगठित कर सकते हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि वह एक राजनैतिक पार्टी बनाना चाहता है लेकिन वह धारा 29ए(5) के तहत घोषणा नहीं करना चाहता। याचिका में मांग की गई है कि न्यायालय घोषित करे कि सरकार को लोगो को समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत का पालन करने के लिए बाध्य करने का अधिकार नहीं है। हमारा मानना है कि सरकार को पंथनिरपेक्ष रहकर काम करना चाहिए अर्थात सरकार अपने प्रत्येक निर्णय में यह आभास कराना चाहिए कि उसके सामने कोई हिंदू मुसलमान सिख या ईसाई नहीं है, बल्कि वह जाति , धर्म ,लिंग के पक्षपात से दूर रहकर कार्य करने को अपना धर्म मानती है। ऐसे में सरकार का भी अपना धर्म है और उसे अपना धर्म पहचानते हुए धर्मनिरपेक्ष ना रहकर धर्मसापेक्ष शासन चलाना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि भारतवर्ष प्राचीन काल से ही सदा सभी समुदायों के हितचिंतकों में अग्रणी रहा है, यहाँ के शासकों ने किसी के साथ भी बिना कारण कोई अहितकर कार्य कभी नहीं किया। मुसलमानों के शासनकाल में भी भारत के जिन भागों पर मुसलमानों का अधिकार हो गया अथवा एक बार अधिकार हटने पर दोबारा अधिकार हो गया वे सभी मुस्लिम शासक इस्लाम को पोषक रहे और हिंदुओं को भय और लोभ के कारण मुसलमान बनाते रहे। अंग्रेजों का राज्य भी ईसाई मत पोषक राज्य था। भारत के जितने भाग पर अंग्रेजों का अधिकार होता गया,  उतने भाग पर वे ईसाइयत का प्रचार कराते रहे। लेकिन अंग्रेजों ने जिन रियासतों का आंतरिक प्रबंध देशी नरेशों पर छोड़ दिया, वे हिंदू सिख और मुस्लिम शासक भी वैदिक अर्थात हिंदू धर्म, सिख मत और इस्लाम मत के ही पोषक रहे हैं। कहने का आशय यह है कि विदेशी आक्रान्ताओं के शासन के अतिरिक्त भारत के शासक आदिकाल से देश की परतन्त्रता काल और देश के विभाजन तक कभी भी धर्मनिरपेक्ष नहीं रहे, बल्कि वे सदा ही धर्मसापेक्ष रहे हैं, लेकिन भारतवर्ष का यह परम दुर्भाग्य था कि इसी धर्म निरपेक्षता की छद्म नीति पर चलने के परिणामस्वरूप ही आदि सृष्टि से यह आर्यावर्त्त, देश बंटते- बंटते अंततः 1947 में पुनः दो भागों में अर्थात भारत और पाकिस्तान में बंट गया। देश के कुछ नेताओं ने प्रयत्न किया कि देश का बंटवारा न हो, परंतु गांधी व अंग्रेजों की बदनीयती, कांग्रेस की मुस्लिम साम्प्रदायिकता के आगे घुटने टेकने की नीति, जिन्ना और मुस्लिम लीग की आरंभ से ही अनुचित मांगों को मानना और मुहम्मद अली जिन्ना के दुराग्रह के कारण लाखों भारतीयों के बलिदान और करोड़ों लोगों के घर से बेघर होने के बाद भी भारत माता का बंटवारा टल न सका। ध्यातव्य है कि देश का विभाजन तो भारत में दो प्रमुख धर्म हिंदू और इस्लाम के रहने के परिणाम स्वरूप इन दो जातियों के आधार पर अर्थात द्विजातिय सिद्धांत के आधार पर हुआ, लेकिन विभाजन के समय मुस्लिम लीगी नेताओं ने चालाकी दिखलाते हुए कहा कि विभाजन तो हो, परंतु जो भी हिंदू, मुसलमान, सिख व ईसाई जहां रहना चाहें, वे वहां रह सकते हैं । इस चालाकी को गांधी और जवाहरलाल नहीं समझ सके अथवा जान- बूझकर आँख मूँद ली। सरदार बल्लभ भाई पटेल ने इस चालाकी को समझा और इसका विरोध भी किया, परन्तु उनकी एक न चली, और इसी आधार पर मुसलमान यहां बस गये, परंतु मुसलमानों की धर्मान्धता और असहिष्णुता के कारण भारत के मुस्लिम बाहुल्य प्रांतों सीमांत प्रदेश, पंजाब, बलोचिस्तान, सिंध और बंगाल से हिंदू निकाले जाने लगे। मुसलमानों ने पाकिस्तान को इस्लामी राष्ट्र और भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाया। विभाजन के समय भयंकर रक्तपात, नरसंहार व हिन्दुओं के निर्वासन के पश्चात भारत का धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाना कांग्रेस की करोड़ों भूलों के समान एक भयंकर भूल थी, जिसका दुष्परिणाम आज तक हिंदू जाति को भुगतना पड़ रहा है। देश के विभाजन के बाद अपनी लिबड़ी बर्तना अर्थात बोरिया विस्तर समेटकर जा रहे विदेशी इसाई पादरी भी भारत को धर्म निरपेक्ष राष्ट्र घोषित होते देख यहीं रूक गए और भारतीय संविधान के अनुसार सभी धर्मों को अपने विचारों के प्रचार प्रसार करने की आज्ञा होने के कारण इसका अनुचित लाभ उठाने लग गये। लेकिन आज धर्मनिरपेक्षता का प्रयोग हिंदू जाति व भारतीय राष्ट्रीयता के लिए महान संकट का कारण सिद्घ हो रहा है। इस समय भारतवर्ष में अनेकों विदेशी पादरी ईसाइयत के प्रचार में संलग्न है और पश्चिमी देशों से बहुत बड़ी राशि प्रतिवर्ष भारत में आ रही है। जनसेवा के नाम पर आने वाली इस राशि से स्कूलों, कालेजों, अस्पतालों और अन्य जनसेवा कार्यों के नाम पर भोले- भाले वनवासियों को ईसाई बनाने के काम में लाई जाती है। उधर इसी धर्म निरपेक्षता के आड़ में इस्लाम के अनुयायी लव जिहाद, जमीन जिहाद, जनसंख्या जिहाद और न जाने कौन- कौन सी जिहाद चलाकर सनातन धर्मियों को इस्लाम के नूर से पुर करने में लगे हैं। सरकारें भी बहुसंख्यक जनता से प्राप्त कर अर्थात टैक्स से इन्हें अल्पसंख्यक के बहाने वित्तीय, पंथीय, शैक्षणिक, रोजगारीय संरक्षण देती रहती है। अल्पसंख्यकों के नाम पर इन्हें अनेक सुविधाएँ प्राप्त हैं, जो देश के बहुसंख्यकों को प्राप्त नहीं है। इन परिस्थितियों में सर्वोच्च न्यायालय में दायर इस याचिका की ओर देश की बहुसंख्यक जनता की निगाहें गिद्ध की भांति लगी हुई हैं, अब देखना है कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले क्या रुख अपनाती है? 

बताइए सरकार, क्या जरूरी है, परीक्षा या जिंदगी?

सरकार के अपने तर्क हैं, विपक्ष के अपने तेवर और छात्रों की अपनी परेशानियां। लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह तय कौन करेगा कि क्या जरूरी है, एक साल या लाखों छात्रों की पूरी जिंदगी?  कोरोना संकटकाल में जब बहुत कुछ बंद है, फिर भी केंद्र सरकार परीक्षा करवाने पर तुली है, तो विवाद तो होना ही था।

निरंजन परिहार

देश भर के छात्र परेशान हैं। कोरोना में देश के हालात खराब है। सब कुछ बंद बंद सा है। आने जाने के साधन नहीं है। इसलिए छात्र जेईई और नीट की परीक्षाएं सरकाने की मांग कर रहे हैं। लेकिन सरकार चुप है और सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया हैं, कई सरकारों ने रिव्यू पिटीशन की अपील की है। ऐसे में सरकार से यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि क्या जरूरी है। छात्रों की परीक्षा या छात्रों की जिंदगी? जेईई और नीट परीक्षा पर बवाल थमता नजर नहीं आ रहा है। केंद्र सरकार के रुख से लग रहा है कि परीक्षाएं हर हाल में होंकर रहेंगी। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों के रुख से लग रहा है कि उन्होंने छात्रों के समर्थन में सरकार से भिड़ने का मन बना लिया है। इन दोनों परीक्षाओं को लेकर देश भर में नए सिरे से सियासी संग्राम छिड़ा हुआ है।

जिस हिंदुस्तान में 2 लोगों में किसी एक बात पर सहमति बनना भी आसान नहीं है, वहां पर एक साथ 100 शिक्षाविद मिलकर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर जेईई-नीट की परीक्षाएं सितंबर में वक्त पर ही कराने की मांग करे, तो शक होना वाजिब है कि यह मांग प्रायोजित तो नहीं है। जबकि देश के लाखों छात्र नहीं चाहते कि परीक्षा ऐसे समय में हो, जब कोरोना का कहर संक्रमण  फैलने और मौतों के रोज नए रिकॉर्ड बना रहा है। फिर कई प्रदेश बाढ़ की समस्या से भी जूझ रहे हैं।  छात्रों की मांग यह है कि परीक्षा की तारीख़ को आगे बढ़ाया जाना चाहिए ताकि स्थितियां सामान्य होने पर वे ठीक से परीक्षा दे सकें। लेकिन सरकार का रुख है कि ऐसा करने से युवाओं का पूरा एक साल ख़राब हो जाएगा।

 ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या सरकार ने बच्चों की जान दांव पर लगाने का फैसला कर लिया है। वैसे, हमारे ज्यादातर पाठकों को पता नहीं होगा, कि जेईई और नीट आखिर होते क्या हैं, जिसकी परीक्षाएं होने जा रही हैं और उन पर इतना बवाल क्यों है। तो, सबसे पहले जान लीजिए कि इन परीक्षाओं में पास होकर छात्र डॉक्टर व इंजीनियर की पढ़ाई करने हैं। भारत में आईआईटी और मेडिकल क्षेत्र की पढ़ाई करने के लिए हर साल राष्ट्रीय स्तर की दो परीक्षाएं आईआईटी जेईई यानी इंजीनियरिंग और नीट यानी मेडीकल के आयोजन किये जाते है।

देश भर में आईआईटी जेईई की परीक्षा 1 से 6 सितंबर के बीच और नीट की परीक्षा 13 सितंबर को होनी है। देशभर में आईआईटी के लिए 11 लाख छात्रों ने फ़ॉर्म भरे हैं और नीट के लिए 16 लाख छात्रों ने आवेदन किया है। कुल 26 लाख छात्र परीक्षा देंगे। उनमें से 16 लाख ग्रामीण क्षेत्रों के हों और उन 16 में से भी लगभग 6 लाख छात्र ऐसे रिमोट इलाकों से हैं, जहां से परीक्षा देने के लिए उन्हें कमसे कम 200 से 500 किलोमीटर की यात्रा करनी होगी। देश भर में कोरोना फैला हुआ है, लोग मर रहे हैं और आवाजाही के साधन बहुत ही सीमित है। ऊपर से बिहार, बंगाल, उत्तराखंड, आदि में बाढ़ का कहर है। सरकार ने कोरोना वायरस संक्रमण की रफ़्तार थामने के लिए कई जगहों पर यातायात साधनों पर प्रतिबंध लगाए हुए हैं। इसके साथ ही ट्रेन सेवाएं अब तक सामान्य नहीं हुई हैं।

यही कारण है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत, पंजाब के सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह, छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेंद्र सिंह बघेल, पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी, महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे और झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन, दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और डीएमके अध्यक्ष एम के स्टालिन आदि ये परीक्षाएं ऐसे विपरीत हालात में करवाने के सख्त विरोध में हैं। देश के कई नेताओं ने भी छात्रों के हितों को देखते हुए परीक्षाएं आगे सरकाने की अपील की है। इन नेताओं न मुख्यमंत्रियों ने केंद्र सरकार इन परीक्षाओं को कोरोना और बाढ़ की स्थिति सुधरने के बाद कराने का सुझाव दिया है।

देश में हर रोज मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सरकार लगातार चेतावनी दे रही है। जब सब ठप है, एक शहर से दूसरे शहर जाना मुश्किल है। तो, लेकिन नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए), जो आईआईटी और नीट परीक्षा करवाती है, उसका तर्क है कि परीक्षा करवाने के लिए भी तैयारी करने में तीन महीने का वक़्त लगता है, सो टाले जाने से समय बरबाद होगा। लेकिन  देश गंभीर हालात में है। फिर भी सरकार परीक्षा करवाने पर उतारू है, तो सवाल ये है कि छात्र इन परीक्षाओं में बैठने के लिए बाढ़ग्रस्त राज्यों से, बारिश प्रभावित इलाकों से, ट्रेन सी सामान्य सेवाओं के अभाव में छात्र परीक्षा केंद्रों तक कैसे पहुंचेंगे? छात्र चीख चीख कर मांग कर रहे हैं कि परीक्षाएं सरका दीजिए, लेकिन सरकार सुने तब न!

मृत संवेदनाओं के बीच शांत सुशांत

बात दिल्ली के रिक्से, ऑटो, बस चालक से शुरू करें तो,इनका भी अपना एक संगठन है, नही, नही, सबका घाल मेंल नहीं, वह विशेषज्ञता की बात समझते हैं । इसलिये रिक्से वालों का अलग यूनियन, आटो वालों का अलग और बस ड्राइवर का अलग, यहाँ तक कि ओला/ऊबर जैसे ऐप द्वारा दरवाजे तक सेवा हेतु उपस्थित सुविधा देने वाला चालक तक सभी का अपना-अपना यूनियन है । किसी को छू कर तो देखिये ! वह जरूरत पड़ने पर कैसे आस पास के सभी कार्य आधारित बिरादरी को बुला लेते हैं और आप को तब समझ में आता है  कि हल्के में ले कर गलती कर दी है।
             फिर हत्या हो जाये, और यह खामोश रह जाएँ ? न, यह मुश्किल है वह भी तब जबकि राष्ट्रीय मीडिया इस मुद्दे को जबर्दस्त तरीके से उठा रही हो, तो फिर और अधिक मुश्किल । पर, जैसा कि एक उभरते युवा कलाकार “सुशान्त सिंह राजपूत” के साथ सहकर्मियों की मृत संवेदना हैरान करने वाली है । किसी भी क्षेत्र अथवा व्यवसाय से जुडे व्यक्ति के साथ ऐसी कोई भी घटना घटित हो जाय तो एक आंदोलन सा वातावरण तानांव औऱ आक्रोश के बवंडर में सब कुछ धूल-धूसित हो जाती है । आप तीस हजारी कोर्ट में पुलिस बनाम अधिवक्ता की पराकाष्ठा देख चुके हैं, सही अथवा गलत सिद्ध करने  पर मेंरा अधिकार नहीं किन्तु संगठन में शक्ति है और अपार शक्ति है, हम सभी इसके गवाह हैं, प्रमाणित करने की आवश्यकता ही नहीं “प्रत्यक्षम किम प्रमाणम ।।”

“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।”

दुष्यंत कुमार की एक कविता का यह अंश बताता है कि हमारा उद्देश्य हंगामा खड़ा करने का नहीं, बल्कि हमारी रुचि सम्भावना तलाशने में है । 
किसी को भी संवेदना नहीं खोना चाहिए अन्यथा ऐसा मनुष्य और नोट छापने की मशीन में कोई फर्क नहीं रह जाता । संवेदना लेखन और साहित्य दोनों में बनी रहे इसलिये संवेदना को जीवित रख कर हम सम्भावना को तलाशते हैं ।

मैं अपना छोटा सा अनुभव आप से साझा करता हूँ ।अगर आप दिल्ली में हैं,तो एक प्रयोग करिये, किसी रिक्से पर बैठ जाइये और बता दीजिये कहाँ जाना है। अधिकांश रिक्से वाले बिहार के मिलेंगे,रास्ते का सफर इनकी आय-व्यय और अपनी मौलिकता को बताते हुए,उस व्यक्ति के शहर में आने के कारण को समझते हुए सफर करते रहिये और रिक्से से उतरिये तब पूछिये कि बताओ भैया आप की ईमान का या मेहनत का कितना हुआ ? वह आप से यही कहेगा कि आप को जो उचित लगे दे दीजिये । आप पुनः बोलिये नहीं मुझे तय करना होता तो बैठने से पहले तय कर के बैठता, आपका रिक्सा, आप की मेहनत, फिर मैं मूल्य कैसे निर्धारित करूँ ? आप की ईमानदारी का जितना होता है,आप जो बोलेंगे,दे दूँगा । थोड़ा रिस्क लीजिये क्योंकि अपवाद हर सिद्धान्त में होता है ।वह आप से ज्यादे बोल कर कितना ले जायेगा 50 का 100 लेगा ! यही न ? वह 2000 का बिल नहीं पकड़ायेगा, जितना आप किसी रेस्टोरेंट में किसी मित्र या करीबी के साथ शान से खर्च करके और बाद में 50 रुपये टिप दे कर चले आते हैं । अगर आप रिक्से वाले को मूल्य तय करने की स्वतंत्रता देते हैं तो पारिश्रमिक तय करने पर उसका पूरा अधिकार है,किन्तु वह 50 का 40 बता कर आप को हैरान जरूर कर सकता है । क्योंकि शायद उसके रिक्से पर एक अरसे बाद कोई ऐसा व्यक्ति बैठा है जो उसके अधिकार और स्वतंत्रता की बात कर रहा है बहुत दिनों के बाद कोई ऐसा व्यक्ति बैठा है जो उसे मूल्य निर्धारण की छूट दे रहा । बेईमानी करके वह पूरी बिरादरी को बदनाम नहीं करेगा । वह चाहता है, कि कोई उसका भी दुख सुने,समझे और ऐसा व्यक्ति कभी न ठगा जाय वह यही सोचेगा। आप कर के देखिये । पर आप उसे,वह जितना मांगे उतना देने के बाद 20 या 25 रूपये अतरिक्त, अलग से दीजिये और यह कह कर की आप से बात कर के बहुत अच्छा लगा, आप मेहनती भी हैं और ईमानदार भी,इस अतरिक्त पैसे का आप चाय ही पी लीजियेगा, साथ में यह भी जोड़ दीजिये कि नहीं लोगे तो मैं साथ में चाय पिलाने खुद ले चलूंगा और तब शायद मुझे और खर्च करना पड़ जाय । वह टपाक से पैसे ले लेगा कि आप अपना समय न नस्ट करें वह इसका भी ख्याल रखेगा ।

यह मेंरा व्यक्तिगत अनुभव है यथार्थ है । आप को लगेगा कि यह तो अपव्यय हो गया, मूर्खता ! 
तो जैसे अविरल बहती गंगा में आप ने कभी 5 या 10 का सिक्का फेंक कर सन्तुष्टि का भाव ग्रहण किया था यहाँ भी वही भाव ग्रहण कीजिये क्योंकि माँ गंगा आप को हर जगह नहीं मिलेगी पर ऐसे लोग हर जगह मिल जायेंगे जो आप की संवेदना, आस्था, प्रेम और विश्वास को हमेशा जीवित रखेंगे ।

एक परीक्षा के लिये मैं मेट्रो से निकला और सीधा रिक्से पर पहुँचा भाई मुझे फला कॉलेज ले चलें परीक्षा का समय होने वाला है,आप को इस कॉलेज का लोकेशन पता हो तो ले चलें ! उसने कहा हाँ, देख रहा, स्कूल जानता हूँ, पास में ही है चलिये, हाँ चलो । पर असल में रिक्से वाला मुझे उसी नाम के गर्ल्स कॉलेज ले गया लेकिन प्रवेश पत्र पर गर्ल्स कॉलेज का जिक्र नहीं था, पर संतुष्टि के लिए मैंने वहाँ मौजूद अभ्यर्थियों से पूछा, तो पता चला कि यह वह कालेज नहीं है । मैं भागते हुए फिर से रिक्से पर बैठा और बोला कि फला ब्लॉक में है यह नहीं है, जल्दी करो, अब उसके पाँव में पंख लग गये और परीक्षा केंद्र पर पहुँचा तो उसने गमझे से पसीना पोछते हुए कहा कि अभी लड़के बाहर ही हैं देर नहीं हुई है । मैंने कहा हाँ पर अगर एक बार और भटकते तो देर हो जाना तय था । वह इस बात से शर्मिंदा हुआ और बोला आप जो चाहें दे दीजिये ! मैंने कहा आप फिर देर करवायेंगे, मुझे सब जोड़ कर बताईये कितना दूँ वह बोला 30 रूपया यह स्कूल मेट्रो स्टेशन से नजदीक है,अगर सीधा आता तो यही मेरे ईमान का था पर मैंने भटकने वाली दूरी को इसमें नही जोड़ा है आप 30 रुपया दे दीजिये । मैंने 30 दिया उसने जेब में रखा और इससे पहले कि वह वहाँ से जाता मैंने उसे 30 और रुपये दिये,यह कहते हुए कि आप ईमानदार हैं और मेहनती भी रख लीजिये, मैं खुशी से दे रहा हूँ, आपने जाने अंजाने में इतना श्रम तो किया ही है इसमें अतरिक्त कुछ नहीं। वह कुछ और कहे इससे पहले मैं प्रोफेशनल हो गया कि अब बहस का नहीं है मेंरे पास । उसने पैसे रख लिये,उसकी थकी हुई मुस्कान में गूढ़ भाव था और मेंरे चेहरे पर सन्तुष्टि और प्रेम की सुखद अनुभूति, जिसे ले कर मैं परीक्षा भवन में गया । दो घण्टे बाद जब बाहर निकला तो, वही रिक्से वाला मेंरे सामने रिक्सा लिये खड़ा था और कहा चलिये, मैं स्तब्ध था ।उसने दो घण्टे वही गुज़ारे या ठीक समय पर पहुँच गया ? पर उसे क्या मालूम था कि परीक्षा 2 घण्टे ही चलेगी और वह ठीक समय पर पहुँच गया ? मैं निरुत्तर था, अब मेंरे पास उसे देने के लिये कुछ भी नही था, थी तो बस खामोशी !!

अब आप इस रिक्से वाले से वालीवुड की एक बार फिर से तुलना कीजिये । मुझे नहीं लगता भावना और निष्ठुरता की तुलना करना उचित होगा, क्योंकि वालीवुड की बड़ी-बड़ी हस्तियों के निम्नतर कार्यों के साथ इस रिक्से वाले के कार्य की कोई तुलना है भी अथवा नहीं ?अपने चुलबुल पाण्डे,अनाड़ी से लेकर खिलाड़ी और सहनशाह की उपाधि तक, अगर कुछ दिखता है तो वह है खामोशी !! यह खामोशी निःशब्दता की नहीं बल्कि निष्ठुरता की है,नाम बड़े दर्शन छोटे । यह बात देश के लोगो को कील की तरह चुभ रही है पूरे समाज में आक्रोश है पर इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता ? 
राम जन्म भूमि के शिलान्याश पर तो राम शब्द जुबान पर आया नही तो इस मातम में ही राम नाम जप लेते तो भी इन्हें इस पाप से मुक्ति मिल जाती । 
पर्दे पर 50 की उम्र में क्रीम,पाउडर पोत कर 21वर्ष की नायिका के साथ अभिनय, इतना विभत्स स्वरूप है जिसे बयान करना भी कठिन है । ई रॉन्ग नम्बर है बोलने वाला नमूना कहाँ है ? भारत में डर-डर कर जीवन बिता दिया बेचारे ने पर अब देखो ISIS के गढ़ रहे टर्की में यह कैसे निर्भय और शेर की तरह घूम रहा। देश की असहिष्णुता ने इनका हवा-बयार बन्द कर रखा था अब कितने खुशनुमा माहौल में जीवन का कैसा आनंद ले रहा, जरा गौर करिये । जबकि CBI सुशांत सिंह राजपूत की तथाकथित हत्या/आत्महत्या की गुत्थी सुलझा रही तो दूसरी ओर टर्की के खंडहर में क्या गुफ्तगूँ चल रही । वाह !!
पर यह स्क्रीन शॉट बहुत कुछ बया कर रहा है ।
“हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।”  ~ दुष्यंत कुमार

लेखक – मृदुल चन्द्र श्रीवास्तव

हे सांड़ देवता नमस्कार!

हे सांड़ देवता नमस्कार !हे सांड़ देवता नमस्कार!
नित दर्शन दे करते उद्धार, हे सांड़ देवता नमस्कार!

खेतों में रात भर पड़े रहे, सब लाठी लेकर खड़े रहे
पत्ती सब आप ग्रास करते, भूमि में बस जड़ पड़े रहे
क्यों इतना लेते हो आहार , हे सांड़ देवता नमस्कार!

जब मार्ग कोई अवरुद्घ किये ,तो आप भी उसके विरुद्ध हुए
खुद पर न नियन्त्रण कर पाते, जब आप किसी पर क्रुद्ध हुए
सींगो से कर देते प्रहार , हे सांड देवता नमस्कार!

विश्राम वही पर होता जो , स्थान आपको जम जाये
सब राह बदलने लगते है ,जहाँ पाव आपके थम जाये
साइकिल पैदल या मोटर कार, हे सांड देवता नमस्कार!

जब टुकड़ी आपकी चलती है ,तो हवा भी राह बदलती है
डरकर सब पीछे हट जाते, जब नैनें दिशा बदलती हैं
सह पाये न नैनो के मार , हे सांड़ देवता नमस्कार!

आपस मे सब मिलकर रहते, फ्रीजियन जर्सी चाहे देशी हों
ना तंग किसी को करते है, चाहे कोई भले विदेशी हो
मानवता का करते प्रचार, हे सांड देवता नमस्कार!

जब किसी बात पर अड़ जाये, चाहे जो हो फिर लड़ जाये
सम्मान बचाने भिड़ जाते, चाहे चित या पट पड़ जाये
जीवन में कभी न माने हार, हे सांड देवता नमस्कार!

जब तक ये सेवा करते थे, मालिक पर जान लुटाते थे
धरती का सीना चीरते थे , और फसलें हरी उगाते थे
तुम ही थे जीवन के आधार, हे सांड देवता नमस्कार!

कितने ही लाठी डंडे सहे ,पर मुंह से फिर भी कुछ न कहे
बाते भी बहुत सुनी तुमने, पर आप सदा से चुप ही रहे
आया अब समय तुम्हारे द्वार, हे सांड़ देवता नमस्कार!

नेता जनता की जो न सुने, अब उसका तुम संहार करो
कृषकों से दृष्टि हटा करके, इस पर भी आप विचार करो
जनता मागे ये ही उपहार, हे सांड देवता नमस्कार!

हे देव ! आपसे विनती है, पीड़ा का अब एहसास करो
पड़े हैं कुदृष्टि में आम व्यक्ति, कुछ खासों का भी नाश करो
बस इतना सा कर दो उपकार,हे सांड देवता नमस्कार!

    - अजय एहसास

अब कुंआरों का ब्याह भी कराएंगे गुरुजन !

सुशील कुमार ‘नवीन’

गांव में एक रांडे(कुंआरे)  का ब्याह नहीं हो पा रहा था। एक दिन सुबह-सुबह आत्महत्या की सोच रस्सी लेकर वह खेत की ओर निकल पड़ा। रास्ते में रिश्ते में भाभी लगने वाली महिला ने हंसी-ठिठोली के मूड में छेड़ दिया। बोलीं-देवर जी, रस्सी से फांसी खाने का इरादा है क्या। उसने तो मजाक में ही कहा था पर वह तो पहले ही भरा बैठा था। बोला-हां, तुम्हें खानी हो तो तुम भी साथ आ जाओ। भाभी ने फिर ठिठोली की। बोलीं-फांसी खानिये किसी को बताते थोड़े ही है, वो तो चुपचाप लटक जाते हैं। मजाक मत करो। युवक चलते हुए बोला-मजाक नहीं कर रहा, घन्टे बाद गांव के बाहर खेत में आकर देख लेना। मेरी आखरी राम-राम। 

मामले की गम्भीरता को जान महिला दौड़ी-दौड़ी घर पहुंचीं और पति को सारी बात बताई। महिला के पति ने आस-पड़ोस के लोगों को इकठ्ठा किया और सरपंच के पास जा पहुंचा। सरपंच समेत सभी कुछ ही देर बाद गांव के बाहर खेत मे पहुंच गए। युवक एक पेड़ की डाली पर रस्सी बांध फांसी लेने की पूरी तैयारी में था। सरपंच ने रोका तो फूट पड़ा। बोला- क्या करूं ऐसी जिंदगी का। सब रांडा-रांडा कहकर चिढ़ाते हैं। सरपंच बोले- 15 दिन का समय दो। समझाने पर वह मान गया। 

अगले दिन गांव में पंचायत हुई। गांव के एक बुजुर्ग ने सलाह दी कि यह जिम्म्मेदारी फत्ते मास्टर को दी जाए। कोई न कोई समाधान वो निकाल देगा। मास्टर को बुलाया गया। मामला जान मास्टर ने भी हाथ खड़े कर दिया और कहा यह कोई मेरी ड्यूटी थोड़े ही है। डीसी का आर्डर तो मास्टर को मानना ही पड़ेगा। यह सोचकर पंचायती डीसी दरबार पहुंच गए। इस तरह का मामला पहली बार आया था सो डीसी ने कमिश्नर को मार्गदर्शन के लिए लिख दिया। मामला एक युवक की जिंदगी से जुड़ा था इसलिए कमिश्नर ने भी फ़ौरन गृह मंत्री को इस बारे में अवगत करा दिया। गृह मंत्री से बात सीएम तक जा पहुंची। सीएम ने फौरन मीटिंग कॉल की। एक अफसर ने कहा-जी, यह मामला तो आपके लिए स्वर्णिम अवसर जैसा है। आप भूल गए गए क्या। चुनाव के दौरान आपने प्रदेश के सभी कुंआरों का ब्याह कराने का वादा किया था। इसी कारण तो सभी कुंआरों और उनके परिवार के वोट आपको मिले थे। सीएम बोले- वादा तो किया था पर इसका कोई समाधान तो नहीं निकला। अफसर बोला-समाधान तो अब आपके पास आ गया। प्रदेशहित में आवश्यक सेवा का हवाला देते हुए मास्टरों के नाम आर्डर निकलवा दो। वैसे भी अटके हुए काम वे ही करते हैं। हमने उनसे टिड्डियां उड़वाईं, सब तरह के सर्वे करवाए, वोट बनवाये, राशन बंटवाया, फैमिली आईडी बनवा ही रहे हैं। यह काम भी वे कर ही लेंगे। सीएम को बात सही लगी।फौरन चीफ सेक्रेटरी को बुला अति आवश्यक के नाम से आर्डर निकाल शिक्षा मंत्री को भिजवा दिया। शिक्षा मंत्री ने शिक्षा निदेशक को निर्देश जारी कर दिए। निदेशक से डीईओ, बीईओ होते हुए आदेश कुछ ही देर में सभी स्कूलों के हेडमास्टर-प्रिंसिपलों तक जा पहुंचा। सभी मास्टरों को ‘इसे अति आवश्यक समझें ,अन्यथा आप विभागीय कार्रवाई के हकदार होंगे’ के निर्देश नोट करा दिए गए। आदेश देखते ही फत्ते मास्टर ने पहले अपने बाल नोंचे फिर गाल पर चपेट लगाई। मन ही मन दो चार गालियां भी दी। पंचायत में तो ड्यूटी नहीं है कहकर पिंड छुड़वा लिया था,अब क्या होगा। रात भर नींद भी नहीं आई। सुबह तड़के एक बार आंख लगी तो आवाज सुनाई पड़ी। देखा तो वह युवक गांव के सरपंच और 10-15 अन्य ग्रामीणों को लिए खड़ा था। आने का कारण तो मास्टरजी को पता ही था फिर भी औपचारिकवश पूछ लिया। जवाब सरपंच साहब ने दिया। बोले- अब तो आपकी ड्यूटी आ गई है, गांव का यह काम करवाओ। मास्टरजी कहना तो बहुत चाह रहे थे पर सरकारी आदेश की अवहेलना के डर से चुप्पी साध गए। ग्रामीण और सरपंच अब इस बात से खुश थे कि गांव पर रांडे युवक की अकाल मौत का कलंक नहीं लगेगा। मास्टर जी को यह जिम्मेदारी मिलने से युवक भी अब जल्द ब्याह के सपने देखने लगा। उधर, इस बीमारी का किस तरह क्लेश काटूं ,मास्टरजी ध्यानमुद्रा में बैठ इस बारे में विचारमग्न हो गए। समाधान क्या निकाला और कैसे इस जिम्मेदारी से मास्टर जी ने पिंड छुड़वाया यह आपको फिर कभी बताऊंगा।

मुखड़ा देख ले प्राणी जरा दर्पण में


आत्माराम यादव पीव
जगत को रचनेवाला विधाता बड़ा जादूगर है। जब विधाता ने रचने का वर्कशाप खोला तो पहले उसने जगत की रचना की। समुद्र से लेकर नदियों तक, टीले से लेकर पहाड़तक और घास से लेकर विशाल वृक्षों का पूरा जाल धरती पर बिछाया। फिर जीव-जन्तुओं की रचना की जिसमें पानी में रहने वाले, जमीन पर रेंगने वाले, आकाश में उ़डने वाले जीवों का डिजाईन तय कर उनमें प्राण फूंक दिये। सबके लिये भोजन पानी का साधन दिया। फिर वह अपने वर्कशाप में मनुष्य की रचना में जुट गया। उसने करिश्माई मानव प्राणी में भी वहीं अंतर किया जो अन्य जीव-जंतुओं,प्राणियों एवं वनस्पति में था, वह अंतर था नर और मादा का। ताकि जगत में सभी जीव-जंतु और वनस्पति जनन-प्रजनन के द्वारा अपने वंश की वृद्धि कर सके। सबको आॅखें दी, मुॅह दिये, कान दिये, पैर देने के साथ-साथ एक सम्पूर्ण आकार,प्रकार का शरीर दिया ताकि वह अधूरा न रहे, साथ ही सभी में शारीरिक एवं मानसिक क्षमता की ताकत देते समय किसी तरह का कोई पूर्वाग्रह नहीं रखा।
विधाता ने अपने वर्कशाप में मानव-सृष्टि की रचना शुरू की। अब तक संसार के सभी प्राणियों-जीव जंतुओं और वनस्पति की रचना आसानी से करने वाले इस ऊपरवाले विधाता ने मानवसृष्टि की रचना करना बड़ा ही आसान समझ रखा था लेकिन मनुष्य का निर्माण करते समय उसे सबसे ज्यादा करिश्मा और कारीगरी दिखाने के लिये तत्पर होना पड़ा। उसने द्विपद-प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में मनुष्य को स्थान दिया। मनुष्य में भी नर-नारी की सुन्दर कल्पना को विधाता ने साकार करना शुरू किया और फिर उनका शरीर रचा तो उसमें एक ही समय निर्माण किये गये मनुष्य के मिनिट दर मिनिट की एक्सपायरी डेट अलग तय की। उनका सुन्दर मुखड़ा रचा, दो आॅखें रची, मुॅह रचा, कान रचे। या यूं कहिये मानव रचकर विधाता ने एक नायाब इनायत की है। जब विधाता मनुष्य रचने के वर्कशाप में बैठा था तब वह इत्मीनान से अपने-अपने प्रारब्ध और भाग्य का ठप्पा लगाकर मनुष्यों के लाट-पर लाट पैदा करता रहा। जहाॅ सबके विचार खत्म हो जाते है वहाॅ से विधाता के विचार शुरू होते हैं। उसके दिमागी कबूतरखाने में क्या चल रहा है यह बात जानने की थोड़ी भी गुंजाईश उसने किसी मनुष्य के दिमागी फितूर मे नहीं भरी। आदमजात को अलग-अलग साॅचों में या कहिये रूप, स्वरूप, कुरूप में कई नमूनों के रूप में रचते हुये वह अपनी कारीगरी और चमत्कार दिखाता रहा है और आज भी एक से एक नमूनों को गोरे-काले रंग में ढ़ालकर वह संसार में भेज रहा है।
विधाता ने मनुष्य को बनाया तो उसमें बौद्धिक तर्क-वितर्क और कुतर्क के साथ खुद को समझने,जानने की विद्यायें भी उपलब्ध करायी ताकि आध्यात्म का अनुकरण कर वह जीवन-मरण के कुचक्र से मुक्त हो सके। आदिमानव ने आदम और हव्वा से जीवन शुरू किया और परमात्मा से प्राप्त ज्ञान से अपनी नस्ल बढ़ाई जो शून्य से शुरूआत मानी गयीं तो वहीं कोई मनु-शतरूपा से जगत पर इस मनुष्य समाज को साकार होना कहता है। बात जो भी हो पर उसके पैदा किये गये मानव जिनकी शक्ल-सूरतें और दिमाग बेबूझ था, उसकी खोपड़ी में भरा ज्ञान वह उपयोग में नहीं ला रहा है और खोपड़ी में गुड़-गोबर भर लिया है। विधाता ने चिकनी मिट्टी से जिन मनुष्यों का बुत बनाया वे मनुष्य पूरे घाघ, मक्कार और चिकने दिल के फरेवी झूठे निकलते गये। कालान्तर में चिकनी माटी से बनाये गये मनुष्य नेता बन गये जिनके दिल में प्रजा के लिये कोई प्यार-स्नेह नहीं, ये स्वयंसेवी मनुष्य खुद को और अपने परिवार, सगे सम्बन्धियों को बनाने,सॅवारने में लग गया। इन्हेें जो वाणी दी वह शहद की तरह मीठी थी जिसे सुनकर हर व्यक्ति मंत्रमुग्ध हो जाता। इसी चमत्कृत वाणी जो सिर्फ झूठ, सिर्फ झूठ का पुलिन्दा होती, जिसे जनता सच मानकर नेता के आकर्षण में फॅस जाती जैसे मकड़ी के जाले में शिकार फॅसता है। जल में अपनी छवि देखकर मनुष्य के अपने स्वरूप का भान होता था, जल के आकर्षण से मुक्त कर विधाता ने उसे शक्ल सूरत निहारने के लिये दर्पण का आविष्कार कर दिया। दर्पण मिलते ही वह अपने मुखड़े को लेकर उसके पास घन्टों बैठने और आॅखों से खुदकी प्रशंसा करने में लगा रहता। हाॅ जिन्हें विधाता ने आॅखें नहीं बक्शी, दर्पण उनके काम न आ सका।
बचपन से एक गीत सुनते आया हॅू कि मुखड़ा देखले प्राणी जरा दर्पण में। तब से मैं दर्पण के विषय में विचारने लगा। गीतकार ने मनुष्य को चेताया कि दर्पण में देख कि कितना पाप और कितना पुण्य तेरे जीवन में हैं। मैं कईों बार दर्पण के सामने बैठा और खुदको निहारने के साथ पाप-पुण्य देखता तो सिवाय मेरे मुखड़े पर धॅसी हुई आॅखें, चिपटी नाक, गोल-गोल गाल के सिवाय कुछ नजर नहीं आता इसलिये मुझे दर्पण देखकर गीत पर चिंतन करना पड़ा और यह लिखने का विचार आया। बात दर्पण की है, दर्पण में करम कहानी विचारने से पहले दर्पण के बनने या कहिये दर्पण के जन्म को लेकर बात करनी उचित समझता हॅू। विधाता ने दर्पण की रचना यह सोच कर की कि मनुष्य इसे पाकर अपने सौन्दर्य को सॅवार सके लेकिन विधाता ने संसार को देखने के लिये दो आॅखें दी किन्तु मनुष्य संसार को देखना भूलकर उन आॅखों सेे दर्पण के द्वारा खुद को निहारने में लग गया। अतएव कहा जा सकता है कि मानव ने दर्पण को निर्विरोध रूप से अपनी आवश्यकता का अंग बनाकर स्वीकार कर लिया। दर्पण स्त्रियों के लिये वरदान साबित हुआ और कुमारी युवतियों के मनोरथों को सिद्ध करने के अभ्यास का साध्य भी हुआ और विवाहिताओं को अपने-अपने पतियों को प्रेम के मोहपाॅश में कैद करने का हुनर देने वाला भी साबित हुआ। ये कुमारी सुमुखियाॅ घन्टों दर्पण के सामने बिताने लगी। वे दर्पण में अपनी आॅखें देखती और उसकी गहराई में खुद उतरती-डूबती। दर्पण के सामने वे नैनों से तीर चलाने का अभ्यास कर कैसे दिल का घायल किया जा सकता वे दर्पण से सीखती। वे दर्पण के सामने श्रृंगार करते समय अपने रूप लावण्य द्वारा अपनी आॅखों की मादकता में मदहोश करनें, आॅखों की गहराई में डुबोनेे, अपने केशों को गूंथते समय एक-एक लट गूंथते हुये उन लटों में सम्पूर्ण मनोरथों को खींचकर बाॅध लेती है। सुमुखियों और रमणियों के इसी चन्द्रमुख की उन्मुक्तता को शबाब पर पहुॅचाने का काम दर्पण करता रहा है जिसमें अवतारी देवता भी बच न सकेे, फिर आम व्यक्ति की क्या औकात जो खुद को इनके मोहपाॅश से बचा सके। दुनिया में पिचके गालों वाले युवक हो या कचैडी की तरह फूले गालों वाले युवक हो अथवा कुपोषित की तरह अस्थिपंजर निकल आये युवकों या फूटे ज्वालामुखी की तरह बेडोल शरीर वाले युवक हा, सभी को खुदके निहारने के लिये दर्पण ही है जो उन्हें खुद को निहारने के बाद नवरत्न होने की तसल्ली देकर जीने की ताकत देता है।
घर-परिवार बसे तो पति-पत्नी, बाप-बेटे माॅ-बेटी, साॅस-बहू के सम्बन्ध भी बने। परिवार को चलाने के लिये घर के पुरूष सदस्यों को महिने भर कमाने को निकलना पड़ा। इधर दर्पण के आते ही ऐसा कोई घर, झोपड़ी, होटल, महल-अटारी शेष न रही थी जहाॅ दर्पण को सम्मान न मिला हो, हर जगह उसकी उपस्थिति एक फैशन बन गयी। पत्नियाॅ पति से ज्यादा दर्पण को प्यार करने लगी, माताओं को बेटे की सुध नहीं होती और वे दर्पण के सामने मुखड़ा देखने में बिताती। धीरे-धीरे दर्पण रोजमर्या में शामिल हो गया और हर-घर में पहली जरूरत बन गया, जिसे देखकर घर से सॅजधॅज कर सॅवरकर जाने का चलन पुरूष ही नहीं स्त्री के जीवन का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर रह गया। दुनियाभर में दर्पण उपयोगी और सर्वप्रिय होने से सर्वव्यापी हो गया। दुनिया का कोई भी देश हो हर देश में, हर घर-दुकान में भले ईश्वर सर्वव्यापी न हो, वेद-पुराण,शास्त्र लोगों के घरों में न हो लेकिन हाॅ यह सच है कि सभी जगह दर्पण की व्यापकता हो गयी। यानि ईश्वर की छवि देखने की बजाय आदमी दर्पण में अपनी छवि देखना ज्यादा महत्वपूर्ण समझने लगा। दर्पण निहारने का प्रमुख कारण हर मनुष्य अपने मुखड़े के आकर्षक एवं सुन्दरतम स्वरूप को सॅजाना और सॅवारना बन गया। बदशक्ल से बदशक्ल भी अपनी कुरूपता को सुरूपता में करने का सारा उपक्रम दर्पण के सामने करके सुन्दरमुख वालें को लज्जित करने का अवसर नही खोना चाहता है और अब यह सब व्यूटीपार्लर सेन्टरों के माध्यम कार्यान्वित किया जाना एक फैशन का रूप ले चुका है और महिलाओं और पुरूषों के लिये अलग-अलग ब्यूटीपार्लर सेन्टर गली-गली खुल गये है। ब्यूटीपार्लर सच मायने में दर्पणों के मायाजाल का सुन्दर कक्ष है जहाॅ आगे-पीछे, दाॅये-बाॅये और ऊपर दर्पणों को ऐसा मोहक जाल बिछाया जाता है जिसमें सभी ओर आप ही आप दिखे। ब्यूटीपार्लर कक्ष में धोखा इतना कि इन दर्पणों के चारों और चकाचैंध कर देने वाले प्रकाश/लाईट की व्यवस्था में स्त्री और पुरूष घन्टों व्यूटी होने के लिये दर्पणों के समूह के बीच घिरे अपने मुखमण्डल को रंगने-पोतने में अपने सहज प्राकृतिक सौन्दर्य को गॅवाकर ब्यूटिशियन द्वारा दी गयी कृतिम सुन्दर सूरत पर फूले नहीं समाते है। जो जरा सी गर्मी पड़ने या बरसात के छीटे पड़ने पर चेहरे से पिघलकर चेहरे को बदरंग करने में देर नहीं करती।
दर्पण का महत्व इतिहास में हजारों साल पहले वर्णित है। अयोध्या के राजा दशरथ के घर भगवान राम अवतरित हुये। राम बालक थे और संध्या को खेलते समय आकाश में चन्द्रमा को देख मचल पड़े और पिताजी से जिद करने लगे कि उन्हंें खेलने के लिये चन्द्रमा चाहिये। राम को रोता देख दर्पण लाया गया और उसमें चन्द्रमा का प्रतिबिंब राम को दिखाया गया जिसे देख राम दर्पण में चन्द्रमा को देख खुश हो गये। इतिहास में एक प्रसंग रानी पदमिनी के अपूर्व सौन्दर्य को लेकर दर्पण प्रयोग का है जिसमें मेवाड़ राज्य की महारानी पदमिनी को एक मुगल शासक पाना चाहता था तब उस शासक को दर्पण में महारानी पदमिनी का सौन्दर्य दिखाया गया जिसे देख वह उसे पाने को वावला हो गया। धोखे से उसने राजा को कैद कर दिल्ली ले गया और पदमिनी को पाने की उन्मुक्ता नहीं त्यागी। बाद में राजा तो बरी हो गये लेकिन पदमिनी को अपने सौन्दर्य का पता दर्पण से लगा। सच मायने में दर्पण का सिर्फ इतना ही महत्व है जो जैसा उसके सामने हो वह वैसा ही दिखाता है। दर्पण देह के आवरण का ही प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करता है और रूपवान को रूपवान और कुरूप को कुरूप ही दिखाता हैं। हाॅ यह अलग बात है कि मुखड़े की कुरूपता को सौन्दर्य का लेप चढ़ाने के लिये दर्पण उपयोगी हो गया है। उस विधाता का दिया सौन्दर्य अपने में पर्याप्त है परन्तु पल-पल दर्पण के सामने बैठने वाले को उसके चेहरे पर कुछ कमजोरी ही दिखाई देगी और दूसरे का कुरूप चेहरा उसे अपने चेहरे से ज्यादा विशेष दिखेगा। या यॅू कहिये दर्पण के सामने अक्सर कुरूपों को सौन्दर्यवान होने का ज्यादा एहसास होता है। मैं जगत के रचनाकार की रचनाओं में त्रुटि नहीं देखता हॅू और समझता हॅू कि उसने जो भी रचनायें की सभी समय,काल और परिस्थितियों के अनुरूप ही है। दर्पण सच प्रगट करता है इसलिये दर्पण के इस विशिष्ट गुण से लोगों का विश्वास कम होता जा रहा है तभी परमात्मा के द्वारा उपहार में दिये अपने मुखड़े में कमी देखने की आदत सी हरेक में देखी जाती है।
कभी किसी ने अपने पाप-पुण्य देखने के लिये दर्पण का उपयोग नहीं किया है। इसलिये किसी भी मनुष्य को चाहे वह स्त्री हो या पुरूष उसे भान ही नहीं होता कि दर्पण के सामने हमेशा खुद का दीदार करते रहने के बाद भी वे अपने जीवन के यर्थात सत्यों से कितने परिचित है। किसने कितने पाप किये, कितने पुण्य किये, कितने अच्छे काम कर सका या कितने गलत काम करके अपने जीवन में बदनुमा दाग लगाये यह दर्पण में देखते वक्त किसी के भी चिंतन में नहीं आता है। जीवन में धर्म,कर्म और आध्यात्म की बात दर्पण में निहारते समय कोई कर सका ऐसा एक भी प्रमाण दुनिया बनने के दिन से आज दिन तक रिकार्ड में नहीं मिली। समाज में चिंतन हमेशा से रहा है जो इस गीत में भी सहज और सरलता से देखने को मिला। गीत में कपटपूर्ण काम करने वाले अर्थात अनैतिक काम करने वालों को समझाने का प्रयास किया कि खुद को धोखा मत दे वन्दे, अच्छे न होते कपट के धंधे। इतना ही नहीं एक पंक्ति में सारी बात को कहने का साहस गीतकार ने किया और चेताया कि सदा न चलता किसी का नाटक, इस दुनिया के आॅगन में। लेकिन गीत में सहजता से यह व्यक्त करना कि मुखड़ा देख ले प्राणी जरा दर्पण में, एक क्रान्तिकारी संदेश रहा जिसपर तेजी से भागते किसी भी मनुष्य ने अमल में नही ला सका।
विधाता कहिये, ईश्वर कहिये, परमात्मा कहिये या इस दुनिया का मालिक। उसकी रचनाओं का कोई सानी नहीं। उसने देह दर्शन के लिये दर्पण तो बना दिया लेकिन देह को धारण करने वाले इस जीवात्मा को देखने के लिये मन को देखने के लिये, मन-मस्तिष्क में चल रहे विचारों को देखने के लिये कोई दर्पण नहीं बनाया। वह सर्वज्ञ कहलाता है, वह सर्वव्यापी बतलाया गया है इसलिये उसे पाने के लिये या खुदको ेको जानने-पहचानने के लिये किसी काॅच की जरूरत नहीं समझी, जिसे परमात्मा को पाना है, खुदको पाना है वह खुदके अन्दर की यात्रा करें। तत्वज्ञानियों ने दर्पण की महिमा लिखी है और उसे काॅच जैसा निर्मल पारदर्शी बतलाया है अर्थात काॅच के समान निर्मल हृदयवाला ही लक्ष्य पाता है। यद्यपि उस रचनाकार परमात्मा की हर रचना स्वयं में निर्मल है, काॅच की तरह है इसलिये इस निर्मलता में काॅच का महत्व समाहित है। इसलिये भी दर्पण को हम परमात्मा का आंशिक अंश मान सकते है, क्योंकि जो उसके द्वारा दिखाया जाता है उसे प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। दर्पण देखकर कोई भी मनुष्य प्रेरणा ले सकता है और अपने मुख के तेज, शौर्य और बल का सही जगह उपयोग कर अपने व्यक्तित्व का परिचय दे सकता है। दर्पण को मैंने परमात्मा के आंशिक अंश होने की बात इसलिये की, क्योंकि सच बात यह है कि इस संसार में परमात्मा का कोई प्रतिनिधि नहीं है अलबत्ता हम दर्पण को उसका प्रतिनिधि मानने का दावा इसलिये कर सकते है क्योंकि दर्पण ही है जिसे बार-बार निहारने और उसके सामने एकचित्त बैठकर खुदकी कला और रसिकता का भोन्डा प्रदर्शन हर आयु-वर्ग के स्त्री-पुरूष करते मिल जायेंगे। इसका प्रमाण तलाषने के लिये किसी भी नगर-गाॅव के मोहल्लों में कुकुरमुत्ते की तरह उग आये ब्यूटीपार्लर सेन्टरों से समझा जा सकता है।

जानिए वास्तु के अनुसार सेप्टिक टैंक कहाँ होना चाहिए ?

वर्तमान परिवेश में सेप्टिक टैंक वास्तु के अनुसार घर में होना बहुत जरुरी है। आज की इस पोस्ट में हम चर्चा करेंगे की वास्तु के अनुसार सेप्टिक टैंक क्यों और कहाँ होना चाहिए?सेप्टिक टैंक निर्माण क्यों करना चाहिए?
सबसे ख़ास बात तो यह है की घर में मल-मूत्र और अपशिष्ट पदार्थों के निर्वहन के लिए सेप्टिक टैंक बनाना बहुत जरुरी है।
जानिए कहाँ होना चाहिए वास्तु के अनुसार सेप्टिक टैंक :– 
इसमें सबसे बड़ी गलती यह कर देते है की इसे घर में कहीं पर भी बना देते है और लोग इसे जरुरी नहीं समझते। लेकिन लोग नहीं जानते की गलत दिशा और गलत स्थान पर सेप्टिक टैंक का निर्माण करने से परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। वास्तु के हिसाब से सेप्टिक टैंक मुख्य द्वार पर होना चाहिए।
वास्तु के अनुसार सेप्टिक टैंक—सेप्टिक टैंक की जरूरत कुछ दशकों पहले ही अस्तित्व में आई लेकिन आज यह हर घर की जरूरत बन गया है। सेप्टिक टैंक के निर्माण के लिए जमीन के नीचे एक गड्डा बनाया जाता है। वास्तु के अनुसार गड्डा बनाते समय किसी चीज की कमी नहीं रहनी चाहिए अन्यथा घर में नकारात्मक ऊर्जा का वास होता है और साथ में अनेक तरह की समस्याएं भी आ सकती है।
 नैऋत्य कोण में सेप्टिक टैंक का गड्ढा करने से ऊंचा और भारी होने का नियम भंग हो रहा है। इस कोण में सेप्टिक टैंक होने से स्वास्थ सम्बन्धी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
इसी तरह दक्षिण-पूर्व में टैंक होने से आपके बच्चे व पत्नी परेशान हो सकते हैं। दक्षिण-पश्चिम में कमोड ( डब्ल्यू सी वॉटर क्लोसेट) होने से धन की निरंतर हानि व घर मुखिया का मानसिक तनाव में रहना मुख्य लक्षण है। 
होती है धन की हानि—

वास्तु के अनुसार नैऋत्य कोण में सेप्टिक टैंक होने से धन की भी हानि होती है। नैऋत्य कोण में सेप्टिक टैंक होने से घर, फैक्ट्री, दुकान या ऑफिस में आय से अधिक व्यय होता है।
प्रेम संबंधों में आती है कमी–नैऋत्य कोण में सेप्टिक टैंक होने से पति और पत्नी के सम्बन्धों में खटास देखा गया है। नैऋत्य कोण में सेप्टिक टैंक होने से घर में पारिवारिक जीवन दुखमय हो जाता है। 
नैऋत्य कोण में सेप्टिक टैंक होने से वैवाहिक जीवन का कोना भी दूषित होता है इसीलिए योग्य होते हुए भी घर में लड़के और लड़कियों की शादी नहीं हो पाती। 
नैऋत्य कोण में सेप्टिक टैंक होने से ऑफिस में कर्मचारियों में आपसी संबंध खराब देखे गए हैं।
वास्तु के अनुसार सेप्टिक टैंक कहाँ होना चाहिए??? सेप्टिक टैंक कहाँ बनाना चाहिए?पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के मतानुसार वास्तु के अनुसार घर का सेप्टिक टैंक का निर्माण इस तरह करना चाहिए की इसका मुहं कभी भी दक्षिण-पूर्व, दक्षिण-पश्चिम, उत्तर-पूर्व दिशा की और ना हो। सेप्टिक टैंक के लिए सबसे सही जगह उत्तर-पश्चिम की दिशा मानी गई है।सीवेज और अवशिष्ट पदार्थों के लिए घर पर सेप्टिक टैंक का निर्माण करना बहुत महत्वपूर्ण है। वास्तु के अनुसार, मुख्य द्वार पर सेप्टिक टैंक का निर्माण न करें।
वास्तु के अनुसार, सेप्टिक टैंक की जरूरत कुछ दशक पहले ही अस्तित्व में आई थी, लेकिन आज यह हर घर की जरूरत बन गया है। इसके निर्माण के लिए जमीन के नीचे एक गड्ढा बनाया जाता है। वास्तु के अनुसार, इसके निर्माण में कुछ भी कमी नहीं होनी चाहिए। अन्यथा, घर में नकारात्मक ऊर्जा का निवास होता है। और कई तरह की समस्याएं भी हैं।
वास्तु के अनुसार सेप्टिक टैंक के निर्माण के लिए उत्तर-पश्चिम दिशा सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
सेप्टिक टैंक का जल निकासी पूर्व की ओर होना चाहिए। और सीवेज और अपशिष्ट पदार्थों की निकासी पश्चिम दिशा में होनी चाहिए।
सेप्टिक टैंक की लंबाई पूर्व-पश्चिम दिशा में होनी चाहिए। और चौड़ाई उत्तर-दक्षिण दिशा की ओर होनी चाहिए।
सेप्टिक टैंक को घर की मुख्य दीवार से कुछ दूरी पर बनाया जाना चाहिए। ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि बाथरूम की नाली का पाइप पश्चिम या उत्तर पश्चिम दिशा में होना चाहिए।
हमेशा ध्यान रखें कि ड्रेनेज पाइप दक्षिण दिशा में नहीं होना चाहिए। यदि गलती से इसका निर्माण दक्षिण दिशा में हो गया है तो कम से कम ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि जल निकासी पूर्व या उत्तर दिशा की ओर हो।
पूर्व दिशा में सेप्टिक टैंक कभी न बनाएं। यदि आप इसे पूर्व में निर्मित करते हैं, तो उत्तर-पूर्व कोण को छोड़कर और फायरिंग कोण को छोड़कर, बीच में एक टैंक बनाएं।
पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि सेप्टिक टैंक के जल की निकासी पूर्व दिशा की और हो तथा मल और अपशिष्ट पदार्थों की निकासी पश्चिम दिशा की और हो। सेप्टिक टैंक की लम्बाई पूर्व-पश्चिम दिशा की और तथा चोड़ाई उत्तर-दक्षिण दिशा की और होना सही माना जाता है। इसे घर के मुख्य दीवार से कुछ दुरी पर बनाये। इस तरह की व्यवस्था होनी चाहिए की बाथरूम की नाली का पाइप पश्चिम अथवा उत्तर-पश्चिम दिशा की और हो और रसोईघर की जल निकासी का पाइपपूर्व अथवा उत्तर की दिशा में हो।इस बात का हमेशा ध्यान रखें की जल निकासी का पाइप दक्षिण दिशा की और नहीं होना चाहिए। अगर गलती से दक्षिण दिशा में इसका निर्माण हो गया है तो कम से कम ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए की जल निकासी पूर्व अथवा उत्तर दिशा से हो।
गलत जगह सेप्टिक टैंक वास्तु दोष–
कभी भी सेप्टिक टैंक को पूर्व दिशा में नहीं बना चाहिए क्योंकि यह दिशा शुद्द और देवीय मानी जाती है और इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है। इसी तरह दक्षिण-पश्चिम घर का सबसे शांत एरिया होता है जिसमे घर के लोग आराम करते है, इसलिए इस दिशा में भी सेप्टिक टैंक का निर्माण नहीं करना चाहिए अन्यथा घर में नकारात्क ऊर्जा आ सकती है, जिसके कारण बैचेनी, सिर दर्द, घबराहट, लड़ाई-झगड़े, व्यपार में नुकसान, पुलिस केस आदि हो सकते है और इसका असर घर के मालिक पर ज्यादा पड़ता है।
सेप्टिक टैंक वास्तु दोष निवारणअगर सेप्टिक टैंक गलत दिशा में बन गया हो तो क्या करें? 
वास्तुनुकूल सेप्टिक टैंक बनाने हेतु आवश्यक निर्देशः-
 1. सेप्टिक टैंक का प्रतिष्ठापन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि इसका मुख कभी भी दक्षिण-पूर्व, दक्षिण-पश्चिम अथवा उत्तर-पूर्व दिशा की ओर न हो। 2. सेप्टिक टैंक के लिए सबसे आदर्श एवं उपयुक्त स्थिति उत्तर-पश्चिम दिशा है। 3. सेप्टिक टैंक का पृथक्करण इस प्रकार किया जाना चाहिए जिससे कि जल का निकास पूर्व दिशा की ओर हो तथा मल एवं अवशिष्ट पदार्थों का निष्कासन पश्चिम दिशा की ओर हो। 4. सेप्टिक टैंक की लम्बाई पूर्व-पश्चिम दिशा की ओर तथा चैड़ाई उत्तर-दक्षिण दिशा की ओर होनी चाहिए। 5. इसका निर्माण जमीन के लेवल में किया जाना चाहिए तथा इसे घर के मुख्य दीवार अथवा कम्पाउन्ड वाॅल से कुछ दूरी पर होना चाहिए। 6. ऐसी व्यवस्था बनाएं कि टाॅयलेट एवं स्नानागार की नाली के पाइप का निकास पश्चिम अथवा उत्तर-पश्चिम की ओर से हो। इसके विपरीत रसोईघर का जल-निकास पाइप पूर्व अथवा उत्तर की दिशा की ओर उन्मुख हो। 9. जल निकास पाइप किसी भी परिस्थिति में घर के दक्षिणी भाग में प्रतिष्ठापित नहीं होना चाहिए। यदि इस प्रकार का निर्माण अपरिहार्य कारणों से हो भी गया है तो यह अवश्य निश्चित करें कि कम से कम जल का निकास पूर्व अथवा उत्तर दिशा से हो। 10. मुख्य सीवेज (गन्दा जल/मल जल) उत्तर, पूर्व अथवा पश्चिम की ओर अवस्थित हो सकता है किन्त दक्षिण दिशा में इसकी अवस्थिति वास्तु के दृष्टिकोण से स्वीकार्य नहीं है। 11. यदि सम्पूर्ण उत्तरी भाग को 9 समान हिस्सों में विभाजित किया जाय तो सेप्टिक टैंक उत्तर-पश्चिम दिशा के तीसरे भाग में निर्मित की जानी चाहिए। 12. सेप्टिक टैंक को मुख्यतया सम्पूर्ण भूखण्ड को 9ग9 के कुल 81 ग्रिड में बांटकर सेप्टिक टैंक का स्थान निर्धारित करना चाहिए। 
संलग्न चित्र में इन 81 ग्रिड में किन दिशाओं में सेप्टिक टैंक शुभ अथवा अशुभ अथवा सम है, दर्शाया गया है। इसी चित्र के अनुरूप सेप्टिक टैंक हेतु स्थान का चयन कर निर्माण करवाना चाहिए। 
पूर्व पूर्व दिशा सबसे शुद्ध एवं दैव दिशा मानी जाती है। इधर से ही जीवनदायिनी रश्मियों एवं ऊर्जाओं का घर में प्रवेश एवं प्रवाह होता है। अतः इस दिशा को सेप्टिक टैंक के लिए निषिद्ध माना गया है क्योंकि इसकी नकारात्मक ऊर्जा के कारण इस दिशा से सकारात्मक ऊर्जा एवं लाभदायक किरणों एवं तरंगों का प्रवेश एवं प्रवाह अवरुद्ध एवं प्रभावित होगा। अतः वास्तु में इस दिशा को काफी महत्व प्रदान किया गया है तथा इसे दोषमुक्त रखने की वकालत की गई है। इस कारण से इस दिशा में सेप्टिक टैंक होना बहुत बड़ा दोष दक्षिण-पश्चिम दक्षिण-पश्चिम घर का सर्वाधिक शान्त क्षेत्र होता है। 
गृहस्वामी के शयन कक्ष के लिए यह क्षेत्र सर्वथा उपयुक्त है क्योंकि दिनभर के कार्य से थकान के उपरान्त यहां आराम एवं मानसिक शान्ति की अनुभूति होती है। इस दिशा में सेप्टिक टैंक का निर्माण होने से अत्यधिक नकारात्मक ऊर्जा का सृजन होता है जिसके कारण गृहस्वामी एवं उनकी पत्नी को घबराहट, बेचैनी, सिरदर्द एवं माइग्रेन के साथ-साथ अन्य कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। 
इस दिशा में सेप्टिक टैंक होने से निम्नलिखित परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं: 1. सिरदर्द, घबराहट, बेचैनी आदि की समस्या। 2. घर के सदस्यों का स्वास्थ्य अक्सर खराब। 3. दुर्घटना का भय। 4. घर के सदस्यों में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति विकसित होना। 5. पति-पत्नी के बीच लड़ाई-झगड़े, मार-पीट, मुकदमेबाजी। 6. व्यापार में नुकसान। ब्रह्मस्थान जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है ब्रह्मस्थान देवताओं का स्थान है जहां हर प्रकार के देवी-देवताओं का वास माना जाता है। यहां पर वास्तुपुरुष की नाभि मानी जाती है जो कि शरीर का सर्वाधिक मर्म स्थान है। अतः यहां पर पूजा-पाठ के अतिरिक्त किसी भी प्रकार की गतिविधि वर्जित है। वास्तु शास्त्र के अनुसार 81 ग्रिड में से एकदम मध्य के 9 ग्रिड में किसी भी प्रकार का निर्माण सर्वथा वर्जित है। अतः यहां पर सेप्टिक टैंक का निर्माण निवासियों की पूर्ण बर्बादी का द्योतक है। 

ब्रह्मस्थान में सेप्टिक टैंक होने से घर के लोगों को निम्नलिखित परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है: –1. घर में सुख, शान्ति एवं समृद्धि का पूर्ण अभाव। 2. अकारण लड़ाई-झगडे़। 3. पड़ोसियों से मुकदमेबाजी। 4. घर के किसी सदस्य की हत्या अथवा अपहरण होने की संभावना। 5. घर के लोगों के स्वास्थ्य में असामान्य उतार-चढ़ाव। 6. अकारण अपमान तथा मान-प्रतिष्ठा में कमी। 7. संतानहीनता। 8. लम्बे समय तक (वर्षों से) वास्तुदोष स्थल में निवास करने से शरीर की आण्विक (सूक्ष्म) संरचना में बदलाव आ जाता है। आधुनिक एक्यूप्रेशर के यंत्रों और आभामंडल के चित्रों की सहायता से वास्तुदोषयुक्त घर के निवासियों की जाँच करके भी उनके घर के वास्तुदोषों का पता लग सकता है। दोषयुक्त वास्तु के सुधार के साथ-साथ योगासन, प्राणायाम आदि योगाभ्यास एवं एक्यूप्रेशर के सम्मिलित प्रयास से अस्वस्थ शरीर की आण्विक संरचना को सुधारा जा सकता है।यदि किसी घर में वास्तुदोष पता नहीं हो अथवा ऐसा वास्तुदोष हो जो ठीक करना संभव न हो तो उस मकान के चारों कोनों में एक-एक कटोरी मोटा (ढेलावाला) नमक रखा जाय। प्रतिदिन कमरों में नमक के पानी का अथवा गौमूत्र (अथवा गौमूत्र से निर्मित फिनाइल) का पौंछा लगाया जाय। इससे ऋणात्मक ऊर्जाओं का प्रभाव कम हो जायेगा। जब नमक गीला हो जाये तो वह बदलते रहना आवश्यक है। वास्तु दोष प्रभावित स्थल पर देशी गाय रखने से भी वास्तुदोष का प्रभाव क्षीण होता है।
गलत स्थान पर सेप्टिक टैंक के दोष के उपाय:- 
अगर सेप्टिक टैंक गलत दिशा में बन गया है तो उसे हटाना ही सबसे सही उपाय है लेकिन आप निचे दिए गए उपायों को अपनाकर कुछ दोषों को दूर कर सकते है। जैसे–1. घर के उत्तर-पूर्व में फाउण्टेन अथवा फिश एक्वेरियम लगाएं। 2. घर के द्वार के बाहर बड़ा स्वास्तिक चिह्न बनाएं अथवा स्वास्तिक पिरामिड लगाएं। 3. द्वार पर ओम त्रिशूल लगाएं। 4. द्वार के बाहर एवं अन्दर गणेश जी के दो फोटो इस प्रकार लगाएं कि दोनों के पृष्ठ भाग एक-दूसरे से जुड़े हों। 5. घर के हर कमरे में पिरामिड रखें। 6. घर के उत्तर-पश्चिम भाग में बांस का पौधा लगाएं। 7. बीच-बीच में घर में पूजा-पाठ तथा हवन कराएं। 8. घर के उत्तरी क्षेत्र में मनी प्लान्ट लगाएं। 9. घर के उत्तरी एवं उत्तर-पश्चिमी दिशा में विन्ड चाइम लगाएं। 10. गलत स्थान में सेप्टिक टैंक हो तो उसके चारों तरफ तांबे का तार परगोला बनाकर दबा दें। तीन भागों में विभाजित किया जाता है। आदर्श रूप में जल पूर्व भाग में तथा मल एवं अवशिष्ट पश्चिमी भाग में जमा होना चाहिए। 
 यदि जगह की कमी है तथा आदर्श स्थान पर सेप्टिक टैंक का निर्माण संभव नहीं है तो सेप्टिक टैंक पश्चिमी भाग के उत्तरी कोने पर बनवाया जाना वास्तु सम्मत है। किन्तु सेप्टिक टैंक की घर के मुख्य दीवार (कम्पाउण्ड वाॅल) से दूरी कम से कम 2 फीट अवश्य होनी चाहिए। 
 सेप्टिक टैंक का निर्माण भवन में प्लिंथ लेवल से ऊपर नहीं होना चाहिए। इसका निर्माण ग्राउण्ड लेवल में करना सर्वोत्तम है। 
 भवन का गटर उत्तर, पूर्व अथवा पश्चिम में होना वास्तु सम्मत है। दक्षिण दिशा में इसकी स्थिति कदापि स्वीकार्य नहीं है। 
वैसे लोग जो भवन के ऊपरी तलों पर रहते हैं, वे इस बात का ख्याल अवश्य रखें कि जल निकास पाइप दक्षिण-पश्चिम के कोने पर कदापि न हो। यदि अपरिहार्य कारणों से हो भी तो उससे जल का रिसाव तो बिल्कुल न हो। 
 ऊपर के तलों से आने वाले पाइप दक्षिण-पश्चिम कोने पर नहीं होना चाहिए।
घर के उत्तर-पूर्व में फाउन्टेन या फिश एकेरियम लगायें।घर के बाहर बड़ा स्वस्तिक बनाये।समय-समय पर घर में पूजा-पाठ और हवन कराएँ।दरवाजे पर ॐ अथवा त्रिशूल लगाये।घर के अंदर और बाहर गणेश जी की तस्वीर लगाये।घर के हर कमरे में पिरामिड रखें।घर के उत्तरी क्षेत्र में मनी प्लांट लगायें।