व्यंग्य साहित्य आखिर क्यों युवराज की करीबी दूरी में बदल रही है ? November 15, 2016 by सुप्रिया सिंह | 1 Comment on आखिर क्यों युवराज की करीबी दूरी में बदल रही है ? कहते है कि युवराज को कोई चीज बिना मांगे ही मिल जाती है और जब तक युवराज उस चीज की मांग करता है तब तक वे चीज उसके सामने हाजिर हो जाती है पर यहाँ तो स्थिति उल्टी ही है युवराज बेचारा हर बार कहता है कि वे अब बड़ा हो गया है और जिम्मेदारी उठा सकता है पर महारानी का पद लोभ और युवराज का अपरिपवक्क व्यवहार महारानी को उनके पद से दूर नही जाने दे रहा है और युवराज को पद के करीब नही आने दे रहा है । Read more » Featured
व्यंग्य साहित्य इस लाइन को देख कर मुझे ‘कालिया ’ याद आ गया….!! November 14, 2016 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा बचपन में एक फिल्म देखी थी … कालिया। इस फिल्म का एक डॉयलॉग काफी दिनों तक मुंह पर चढ़ा रहा… हम जहां खड़े हो जाते हैं… लाइन वहीं से शुरू होती है। इस डॉयलॉग से रोमांचित होकर हम सोचते थे… इस नायक के तो बड़े मजे हैं। कमबख्त को लाइन में खड़े […] Read more »
कविता बच्चों का पन्ना साहित्य बचपन की कैद November 14, 2016 by लक्ष्मी अग्रवाल | Leave a Comment नन्हें नन्हें कांधों पर वजन उठाये कौन सी जंग लड़ रहे हैं ये ज़िन्दगी के मासूम सिपाही। क्या यही है इनके लिये ज़िन्दगी की अनमोल सौगात? कब तक यूँ ही बोझा ढोयेंगे ये नन्हें-नन्हें कोमल हाथ? क्या यही है इनके लिये ज़िन्दगी के असली मायने? या देख पाएंगे ये भी कभी बचपन के सपने सुहाने? गुड्डे-गुड़ियों का घर सजाने […] Read more » बचपन की कैद
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म लेख साहित्य स्वास्तिक शास्वत और विश्वव्यापी सनातन प्रतीक November 14, 2016 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्न अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। 'सु' का अर्थ अच्छा, 'अस' का अर्थ 'सत्ता' या 'अस्तित्व' और 'क' का अर्थ 'कर्त्ता' या करने वाले से है। इस प्रकार 'स्वस्तिक' शब्द का अर्थ हुआ 'अच्छा' या 'मंगल' करने वाला। 'अमरकोश' में भी 'स्वस्तिक' का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं - 'स्वस्तिक, सर्वतोऋद्ध' अर्थात् 'सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।' Read more » Featured अन्य देशों के लिए स्वास्तिक के चिन्ह का महत्व भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक का पौराणिक महत्त्व विश्वव्यापी सनातन प्रतीक स्वस्तिक चिह्न :- स्वास्तिक के चिन्ह का महत्व स्वास्तिक शास्वत
व्यंग्य बेचारा गाँधी November 12, 2016 by एल. आर गान्धी | Leave a Comment एल आर गाँधी यकायक ५०० -१००० के गाँधी पर बैन लगा कर माया-मुलायमों और नकली गान्धिओं को तो मोदी ने एक ही झटके में हलाल कर दिया ! झटका तो इस बेचारे असली गाँधी को भी लगा और झटका देने वाली कोई और नहीं हमारी अर्धाङ्गिनी जी ही थीं। माचिस की डिबिया खरीदने के […] Read more » बेचारा गाँधी
गजल साहित्य अब पहले वाली कोई बात न रही ! November 11, 2016 / November 11, 2016 by मनीष कुमार सिंह | Leave a Comment बस इतना इल्म कर लो अंधेरें के रहनुमाओं ! आफताब के आने पर कोई रात न रही !! ऐतबार किस पर करें इस शहर में हम 'मनीष' ! आदमी अब भरोसे वाली जात न रही !! Read more » अब पहले वाली कोई बात न रही !
व्यंग्य साहित्य अथ श्री चचा कथा ….!! November 6, 2016 by तारकेश कुमार ओझा | 1 Comment on अथ श्री चचा कथा ….!! से देखा जाए तो आम चचा भी एेसे ही होते हैं। भतीजा सामने आया नहीं कि शुरू हो गए, अरे पुत्तन... जरा इहां आओ तो बिटवा, सुनो जाओ फट से उहां चला जाओ.. अउर इ काम कर डाओ...। Read more » Featured चचा कथा
कविता साहित्य बेसहारा बाप की व्यथा November 4, 2016 by अमन कौशिक | 1 Comment on बेसहारा बाप की व्यथा उधर भूख से बिलख रही थी नवासी मेरी.. इधर दुनिया को छोड़ चुकी थी बिटिया मेरी.. क्या करूँ, क्या पूछूँ, कुछ नहीं था सूझ रहा.. क्या वज़ह थी इसके पीछे, कुछ नहीं था दिख रहा.. Read more » "बेसहारा बाप की व्यथा" Featured
कविता साहित्य मेरा इंतजार November 3, 2016 / November 3, 2016 by लक्ष्मी जायसवाल | Leave a Comment इंतज़ार में हूं मैं कि कुछ वक़्त खुद के लिए तलाश पाऊंगी इंतज़ार में हूं मैं कि अपना हाल-ए-दिल उनसे कह पाऊंगी। इंतज़ार में हूं मैं कि उनके साथ एक हसीं शाम बिता पाऊंगी। इंतज़ार में हूं मैं कि शायद कभी अपनी पहचान जान पाऊंगी। इंतज़ार में हूं मैं कि अपने दिल के दर्द को […] Read more » मेरा इंतजार
कविता साहित्य मेरी मां की डायरी October 30, 2016 by बीनू भटनागर | Leave a Comment मेरी मां लिखा करती थी, रोज़ डायरी का इक पन्ना, ये सिलसिला कब शुरू हुआ, कैसे शुरू हुआ ये तो याद नहीं, पर तब तलक चलाता रहा.. जब तक होशो हवास थे। कितने साल तक लिखा ,क्या लिखा, ये तो पता नहीं, पर कुछ किस्से, कहानी और कविता सुना देतीं वो खुद ही कभी कभी। […] Read more » मेरी मां की डायरी
कविता साहित्य दिव्य आभा दिलों में ढाली है ! October 30, 2016 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment दिव्य आभा दिलों में ढाली है; प्रभा लेकर दिवाली आई है ! ख़ुशाली हर जगह पै छायी है; प्रमा में आत्म हर सुहायी है ! Read more » दिव्य आभा दिलों में ढाली है !
गजल साहित्य मैं और मेरी जिंदगी.. October 28, 2016 / October 28, 2016 by अमन कौशिक | Leave a Comment मैं और मेरी जिंदगी.. Read more » मैं और मेरी जिंदगी..