गजल साहित्य उर के उफानों में ! April 10, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment सकल सिकुड़न गात अकड़न, छोड़ सब संकोच जाती; मानसिक परिधि परे जा, वृत्तियाँ मृदु मधुर होती ! Read more » उर के उफानों में !
व्यंग्य सेल्फी सेल्फी सेल्फी April 9, 2017 by आरिफा एविस | Leave a Comment एक महाशय सुबह से इसी बात पे नाराज थे कि जिसे देखो वो सेल्फी खींच कर डालने पर अड़ा है, पड़ा है सड़ा है . सेल्फी देख देखकर कुढा रहे थे.’ मैंने भी पूछ ही लिया -“क्या हुआ भाई क्यों बडबडा रहे हो… बैठे बैठे.’ ‘क्या बताएं मैडम जिसे देखो वो सेल्फी लेकर फेसबुक और […] Read more » सेल्फी
व्यंग्य टांग खींचने की बीमारी April 9, 2017 by अशोक गौतम | Leave a Comment तभी साहब ने सचिव को बीच में रूकने का इशारा कर गंभीर हो कहा,‘ पर हां! एक बात का जयपुर से टांगें लाते हुए विशेश ख्याल रखा जाए। जो भी वहां टांगें खरीदने जाए वह असली का आभास देने वाली टांगें ही लाए ताकि सभी असली सी टांगें खींचने का समान रूप से मजा ले सकें। और हां! इसके बाद असली टांगें खींचना गैर कानूनी माना जाएगा। फिर मत कहना मैंने किसीकी एसीआर में रेड एंट्री कर दी । शर्मा जी! आपसे और आपके सहयोगियों से तब तक खास निवेदन है कि......’कह साहब ने उनकी ओर हाथ जोड़े। Read more » Featured the disease of leg pulling टांग खींचने की बीमारी
लेख साहित्य वैद्यराज श्री भट्ट के प्रयासों से कश्मीर फिर से बन गया था स्वर्ग April 9, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment ‘‘सामान्य रूप से यही समझा जाता है कि जौहर की प्रथा केवल राजपूतों में ही विद्यमान थी। परंतु ग्रीक सैनिकों ने भारतीय वीरों के इस आत्मोत्सर्ग से अभिभूत होकर उसका जो वर्णन किया है, उससे स्पष्ट है कि राजपूतों से पूर्व भी अपने देश में भारतीय वीरों में जौहर की तेजस्वी परंपरा कायम थी। जौहर शब्द की उत्पत्ति भी संभवत: जयहर शब्द से हुई हो। समरांगण में जीवन और मृत्यु का सौदा करने वाले भारतीय वीरों के अधिदेव थे-हर अर्थात महादेव। इसीलिए जयहर का घोष करती हुई भारतीय वीरों की वाहिनियां समरांगण में शत्रु सैन्य पर टूट पड़ती थीं। आगे चलकर मराठों का भी रणघोष ‘हर-हर महादेव’ ही प्रचलित हुआ। Read more » Featured कश्मीर फिर से बन गया स्वर्ग वैद्यराज श्री भट्ट
व्यंग्य हम और अहम April 8, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment हम "अहम" के बिना अधूरे है। गुरुर का सुरूर बहुत मुश्किल से उतरता है। हम हिंदुस्तानी, "ज़िंदगी झंड बा, फिर भी घमंड बा" की सनातन परंपरा के वाहक है और इस परंपरा को हमने अनादिकाल से जीवित रखा है जो परंपराओ के प्रति हमारे समर्पण और बिना शोषित हुए उन्हें पोषित करने की कला को दर्शाती है। Read more » हम और अहम
पुस्तक समीक्षा अपना आसमान तराशना April 7, 2017 by गंगानन्द झा | Leave a Comment जीवन में वृद्धि प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है, निश्चित पराजय के सामने रहते हुए भी वृद्धि में अवरोध नहीं आता। । अपनी पसन्द और नापसन्दी के कारण हम चीजों को उनके सही परिप्रेक्ष्य में नहीं देख पाते, क्योंकि हमारी समझ हमेशा लगाव और विमुखता से रंजित रहती है। सम्यक सफाई की जाने की जरूरत होती है ताकि चीजें वैसी ही नजर आएँ जैसी वे होती हैं। Read more » अपना आसमान तराशना
व्यंग्य आईने, चेहरे और चरित्र April 7, 2017 by अशोक गौतम | Leave a Comment आखिर मन मसोस कर सरकार ने जनहित में चेतावनी जारी की,’ देश के तमाम तबके के चेहरों को सूचित किया जाता है कि वे आईने के सामने आने से बचें। आईनों ने देश के तमाम चेहरों के विरूद्ध उनका चेहरा सजाने के बदले उनके चरित्र को दिखाने की जो मुहिम छेड़ी है ,वह राष्टर विरोधी है। सरकार अखिल समाज आईना संघ के इस निर्णय की हद से अधिक निंदा करती है। Read more » आईने चरित्र चेहरे
कविता साहित्य रामचरित April 4, 2017 by अरुण तिवारी | Leave a Comment अरुण तिवारी भजियो रामचरित मन धरियो तजियो, जग की तृष्णा तजियो। परहित सदा धर्म सम धरियो, मरियो, मर्यादा पर मरियो।। भजियो, रामचरित…. भाई संग सब स्वारथ तजियो संगिनी बन दुख-सुख सम रहियोे। मातु-पिता कुछ धीरज धरियो सुत सदा आज्ञा-पालन करियो।। भजियो रामचरित… सेवक सखा समझ मन भजियो शरणागत की रक्षा करियो। धोखा काहू संग मत […] Read more » रामचरित
व्यंग्य साहित्य मार्च एंडिंग की मार्च पास्ट April 3, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment मार्च का महीना बैंक और कंपनियो के लिए वार्षिक खाताबंदी का भी होता है। वर्ष की शुरुवात में जो खाते शुरू किए जाते है, वो पर्याप्त समय और दिमाग खाने के बाद बंद कर दिए जाते है। खाताबंदी करते वक़्त बंदा या बंदी में फर्क नहीं किया जाता है और समान रूप से उनके पेशेंश का एंड कर मार्च एंडिंग करवाई जाती है। डेबिट-क्रेडिट कर खातो को बंद किया जाता है लेकिन इसका क्रेडिट हमेशा बॉस को मिलता है। खाताबंदी, नोटबंदी और नसबंदी से भी ज़्यादा तकलीफ देती है और ये दिल मांगे मोर (तकलीफ) कहते हुए हर साल मार्च में आ जाती है। खाताबंदी, नोटबंदी, नसबंदी और नशाबंदी, सरकार चाहे तो इन सारी "बंदियों" को "लिंगानुपात" संतुलित करने में भी उपयोग में ला सकती है। Read more » मार्च एंडिंग
व्यंग्य साहित्य बेवकूफी का तमाशा April 3, 2017 by आरिफा एविस | 2 Comments on बेवकूफी का तमाशा अरे जमूरे ! आजकल के बुद्धिजीवी और लेखक भी तो लोगों का अप्रैल फूल बनाते हैं. ऐसे मुद्दों पर लिखते और ऐसे विषयों पर चर्चा करते हैं जिसका अवाम से कुछ भी लेना देना नहीं होता.लेकिन अपना स्वार्थ सिद्ध जरूर पूरा हो जाये अवाम पर लिखकर . अरे भाई अगर उनको अवाम के बारे में सोचना ही होता तो वो बुद्धिजीवी ही क्यों कहलाते, बुद्धिजीवी सिर्फ विमर्श करते, फर्श पर कुछ नहीं करते.' Read more » बेवकूफी का तमाशा
व्यंग्य साहित्य घर की मुर्गी लेकिन उपचार बराबर April 3, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment हर मर्ज़ का इलाज़ हम अपनी मर्ज़ी से करते है। अगर किसी बीमारी का कोई घरेलू इलाज़ हमारे पास उपलब्ध नहीं है तो मतलब वो बीमारी गैरसंवैधानिक है और वो बीमारी सभ्य समाज के लायक नहीं है। घरेलू उपचार अब घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रह गए है वो रोज़ वाट्सएप और फेसबुक के ज़रिए लोगो के मोबाइल में अपनी जगह और पैठ बना चुके है। सोशल मीडिया पर ये उपचार "फॉरवर्ड" कर करके हम इतने ज़्यादा "फॉरवर्ड" हो चुके है अब बीमारी का आविष्कार होने से पहले ही उपचार की खोज कर लेते है ताकि बीमारी आने पर तुरंत उपचार को "केश" और "पेश" किया जा सके। Read more »
लेख साहित्य भारत राष्ट्र April 2, 2017 by सुरेन्द्र नाथ गुप्ता | Leave a Comment सुरेंद्र नाथ गुप्ता भारतीय संस्कृति ने अखिल ब्रह्मांड के कण-कण में अनन्त चेतन परमब्रह्म परमात्मा का दर्शन किया है। भारत ने मानव ही नही वरन सम्पूर्ण प्राणी मात्र -जल चर, थल चर, नभ चर एवम् बनस्पतियों के भी कल्याण का आदर्श अपनाया है, इसीलिये ऋग्वेद में घोषणा की गयी कि सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। […] Read more » भारत राष्ट्र