Category: समाज

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भारत की जाति व्यवस्था और मनु

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डा. भीमराव अंबेडकर भारत में जातिवाद के घोर विरोधी थे और वह इसे भारतीय समाज की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा मानते थे। डा. अंबेडकर उन लोगों की मानसिकता के भी विरोधी थे, जिन्होंने अपनी दुकानदारी को चमकाने और निहित स्वार्थों की पूत्र्ति के लिए भारतीय समाज में जातिवाद को प्रोत्साहित किया और समाज में ऊंच-नीच व छुआछूत की बीमारी को भी फैलाया। डा. अंबेडकर मनु को जातिवाद का प्रणेता नहीं मानते थे और वह महर्षि दयानंद जी महाराज की जाति विषयक अवधारणा से तथा मनु के सिद्घांतों की आर्य समाजी व्याख्या से भी सहमत व संतुष्ट थे। वह चाहते थे कियह परम्परा आगे बढ़े और भारतीय समाज में समरसता का परिवेश सृजित हो।

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शख्सियत समाज

“मेरा गीत मुझे गाने दो”…..स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर…..

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आज राष्ट्र चेतना के धधकते अंगारे, हिन्दू राष्ट्र के प्रचंड परंतु सर्वाधिक प्रताड़ित योद्धा स्वातंत्र्यवीर विनायक दमोदर सावरकर जी को उनके 135 वें जन्मोत्सव पर अधिकांश राष्ट्रवादी समाज स्मरण कर रहा है। प्रतिवर्ष आने वाली यह तिथि (28 मई) हिन्दुत्वनिष्ठ समाज को एकजुट व संगठित करके संगोष्ठी व वार्ताओं के विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा वीर सावरकर […]

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सर्वोदयवादी और अन्त्योदयवादी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए था हमारा संघर्ष

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भारतीय लोगों पर और विशेषत: हिंदुओं पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे मुस्लिम शासकों का इसलिए विरोध कर रहे थे कि वे मुस्लिम थे, यह आरोप भी मिथ्या है, क्योंकि मुस्लिम शासक हिंदुओं के इसलिए विरोधी थे कि वे हिंदू हैं। राजा का अनुकरण जनता किया करती है। राजा कभी प्रजा का अनुयायी नही होता है। इतिहास को स्वाभाविक और सहज रूप से अपनी दिशा निर्धारित करने देनी चाहिए। यदि इतिहास को सत्य बोलने दिया जाए तो सल्तनत काल में हिंदू प्रतिरोध के हर अवसर से लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मांग के लिए उठते स्वरों को देखकर हर भारतीय को गर्व होगा कि हमारे पूर्वज सर्वोदयवादी और अन्त्योदयवादी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए उस समय कितना महत्वपूर्ण संघर्ष कर रहे थे, जिस समय शेष विश्व इनके विषय में कुछ भी नही जानता था।

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उपेक्षाओं के मध्य ‘दलित उड़ान’

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दलित समाज को जागृत करने के नाम पर मायावती तथा रामविलास पासवान जैसे और भी कई नेताओं को राजनैतिक रूप से काफी अवसर भी मिले। परंतु इन लोगों ने भी सिवाय अपनी कुर्सी व सत्ता सुरक्षित रखने,धन-संपत्ति संग्रह करने, अपने वारिसों को अपना उत्तराधिकारी बनाने के, और कुछ नहीं किया। हां इतना ज़रूर किया कि यह नेता भी महज़ अपनी राजनैतिक रोटी सेेंकने के लिए दलित समाज को उनके उपेक्षित होने का हमेशा एहसास कराते रहे जबकि इनके अपने रहन-सहन शाही अंदाज़ व शान-ो-शौकत से भरपूर हैं।

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