विज्ञान कानून, नैतिकता और जीवन के बीच चिकित्सक की दुविधा

कानून, नैतिकता और जीवन के बीच चिकित्सक की दुविधा

भारत में गर्भसमापन से संबंधित कानूनी ढाँचा मुख्य रूप से चिकित्सा गर्भसमापन अधिनियम (Medical Termination of Pregnancy Act) पर आधारित है।

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मनोरंजन क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता कोरा बुलबुला है या वास्तविक चुनौती?

क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता कोरा बुलबुला है या वास्तविक चुनौती?

एआई के बढ़ते प्रभाव के साथ रोजगार और अर्थव्यवस्था में भी व्यापक परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं। अनेक क्षेत्रों में नियमित और दोहराव वाले कार्य…

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बच्चों का पन्ना क्लिक से पहले सोचें : सोशल मीडिया सुरक्षा के मूल मंत्र

क्लिक से पहले सोचें : सोशल मीडिया सुरक्षा के मूल मंत्र

तो इस प्रश्न का सीधा सा और सटीक उत्तर यह है कि आज बच्चे और किशोर इंटरनेट पर कई प्रकार के खतरों(जैसा कि संयुक्त राष्ट्र…

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समाज सामने आ रहे हैं लिव-इन रिलेशनशिप के दुष्परिणाम

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लिव-इन रिलेशनशिप का मूल विचार यह है कि दो वयस्क बिना विवाह के एक साथ पति-पत्नी की तरह रहें और अपने संबंध को आगे बढ़ाने…

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प्रवक्ता न्यूज़ सोशल मीडिया, जेनजी क्रांति और “व्यवस्था परिवर्तन” का नया नैरेटिव

सोशल मीडिया, जेनजी क्रांति और “व्यवस्था परिवर्तन” का नया नैरेटिव

गजेंद्र सिंह भारत की राजनीति पिछले एक दशक में केवल चुनावी सभाओं और टीवी डिबेट तक सीमित नहीं रही। अब राजनीति का सबसे बड़ा मंच सोशल मीडिया बन चुका है। इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब पॉडकास्ट, वायरल क्लिप्स और डिजिटल अभियानों ने राजनीतिक संवाद की दिशा बदल दी है। आज लाखों फॉलोअर्स रखने वाले कुछ सोशल मीडिया चेहरे खुद को “नई राजनीति”, “व्यवस्था परिवर्तन” और “युवा क्रांति” का प्रतिनिधि बताने की कोशिश कर रहे हैं। इनमें से कई लोग विदेशों में रहकर भारत की राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं पर लगातार टिप्पणी करते हैं । वे पॉडकास्ट, वीडियो और ऑनलाइन अभियानों के माध्यम से भारत के जेन जी युवाओं को “सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाने” और “सड़कों पर उतरने” के लिए प्रेरित करते दिखाई देते हैं। लोकतंत्र में सवाल उठाना और व्यवस्था की आलोचना करना गलत नहीं है। बल्कि यह लोकतंत्र की शक्ति है लेकिन चिंता तब पैदा होती है जब सामाजिक असंतोष को भावनात्मक नारों, डिजिटल ट्रेंड्स और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के साथ मिलाकर प्रस्तुत किया जाने लगे। इनमें से कुछ चेहरे पहले भी राजनीतिक दलों के सोशल मीडिया और प्रचार अभियानों से जुड़े रहे हैं। आज वही लोग “क्रांति”, “सिस्टम परिवर्तन” और “युवा आंदोलन” के नाम पर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करते दिखाई देते हैं। विदेशी डिग्रियों, डिजिटल लोकप्रियता और लाखों फॉलोअर्स को राजनीतिक पूंजी में बदलने की यह नई शैली तेजी से बढ़ रही है। खुद को युवाओं का मार्गदर्शक, व्यवस्था परिवर्तन का नेता या सामाजिक न्याय का चेहरा बताने की कोशिश करते हैं। कभी वे खुद को पीड़ित बताते हैं, कभी दलित पहचान के माध्यम से सहानुभूति जुटाने का प्रयास करते हैं, तो कभी पूरे राजनीतिक ढांचे को भ्रष्ट और विफल घोषित कर देते हैं। यह पहली बार नहीं है जब भारत ने ऐसा नैरेटिव देखा हो। देश ने इससे पहले भी भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन का बड़ा दौर देखा था। जनलोकपाल, भ्रष्टाचार मुक्त शासन, आम आदमी की राजनीति और व्यवस्था परिवर्तन जैसे नारों के साथ लाखों लोग सड़कों पर उतरे। युवाओं ने उम्मीद की कि राजनीति बदल जाएगी, शासन पारदर्शी होगा और आम नागरिक की आवाज मजबूत होगी। लेकिन समय के साथ वही आंदोलन राजनीति में बदल गया।  उस आंदोलन और युवाओं की फ़ौज को राजनैतिक फायदे के लिए उपयोग लिया गया, राजनैतिक पार्टी का गठन हुआ ,  नेताओं पर भ्रष्टाचार, शराब नीति विवाद, आलीशान सरकारी आवास, सत्ता संघर्ष और राजनीतिक अवसरवाद जैसे आरोप लगे। कुछ नेता जेल तक पहुंचे और जो बचे, वे आपसी मतभेदों और शक्ति संघर्ष में उलझते दिखाई दिए । इस अनुभव ने देश के युवाओं के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया क्या हर आंदोलन वास्तव में व्यवस्था परिवर्तन के लिए होता है, या फिर वह नई राजनीतिक जमीन तैयार करने का माध्यम बन जाता है? आज फिर सोशल मीडिया पर वही शैली नए चेहरों के साथ दिखाई दे रही है । अचानक से 10 मिलियन फॉलोअर्स की एक फ़ौज खड़ी कर दी गई है,  वायरल वीडियो और ऑनलाइन क्रांति के नारों के बीच विपक्ष के कुछ नेता भी सत्ता की उम्मीद में इस ऑनलाइन क्रांति के समर्थन में जुड़ गए है। पहले राजनीति सड़कों पर संघर्ष, मेहनत और जनसेवा से थी। लोग जनता की समस्याओं के लिए कोर्ट-कचहरी और सरकारी दफ्तरों की खाक छानते थे। आज राजनीति कई लोगों के लिए एक कैरियर विकल्प बन गई है ,अच्छी नौकरी नहीं मिली तो एल्गोरिद्म, वायरल वीडियो और सोशल मीडिया के जरिए राजनीति में जगह बनाने का प्रयास शुरू हो जाता है । पहले नेताओं के पास जनसमस्याओं का जमीनी अनुभव और संघर्ष होता था, अब वातानुकूलित कमरों, विदेशी डिग्रियों, रील्स और ट्रेंडिंग हैशटैग के जरिए “लोक कल्याण” और “व्यवस्था परिवर्तन” की बातें होती हैं। पहले लोगों के दुःख में कंधे से कंधा मिलाया जाता था, अब डिजिटल मीडिया के माध्यम से गुस्से को तीव्र और वायरल बनाया जाता है। और अंतत खुद को “कॉक्रोच” और “पैरासाइट” जैसे शब्दों का उपयोग कर “क्रांतिकारी”, “व्यवस्था परिवर्तन के सैनिक” या “सिस्टम के खिलाफ लड़ने वाली पीढ़ी” कहकर संबोधित करते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि हर बार आंदोलन की सबसे बड़ी कीमत युवा ही क्यों चुकाएं? जब सड़कों पर प्रदर्शन होते हैं, पुलिस कार्रवाई होती है, शैक्षणिक और पेशेवर जीवन प्रभावित होता है, तब सबसे ज्यादा असर आम युवाओं पर पड़ता है। लेकिन कई बार आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लोग सुरक्षित स्थानों पर रहते हैं, उनके पास संसाधन, राजनीतिक संपर्क और डिजिटल प्रचार की पूरी व्यवस्था होती है । आज राजनीति का एक नया मॉडल सामने आया है डिजिटल लोकप्रियता को राजनीतिक शक्ति में बदलना । लाखों फॉलोअर्स, वायरल वीडियो, भावनात्मक भाषण और ऑनलाइन अभियानों के जरिए राजनीतिक जमीन तैयार की जाती है। जेन जी  की बेचैनी, बेरोजगारी, सामाजिक असंतोष और व्यवस्था के प्रति नाराजगी को एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव में बदला जाता है । यह भी सच है कि भारत का युवा आज कई वास्तविक समस्याओं का सामना कर रहा है रोजगार, शिक्षा की गुणवत्ता, अवसरों की असमानता, सामाजिक तनाव और राजनीतिक ध्रुवीकरण। इसलिए जब कोई व्यक्ति “व्यवस्था परिवर्तन” की बात करता है तो युवाओं का आकर्षित होना स्वाभाविक है । लेकिन किसी भी आंदोलन या नेता को केवल भावनाओं के आधार पर स्वीकार करना लोकतांत्रिक परिपक्वता नहीं कहलाता । युवाओं को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल विरोध का नाम नहीं है बल्कि जिम्मेदारी, भागीदारी और जवाबदेही का भी नाम है। किसी भी नेता, आंदोलन या डिजिटल अभियान को उसके परिणामों, पारदर्शिता, नीतियों और वास्तविक कार्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए। सोशल मीडिया आज सूचना का सबसे बड़ा माध्यम है, लेकिन वही माध्यम भ्रम, अतिशयोक्ति और भावनात्मक ध्रुवीकरण का साधन भी बन सकता है। इसलिए जरूरी है कि युवा हर वायरल वीडियो, हर क्रांतिकारी भाषण और हर ऑनलाइन आंदोलन को आलोचनात्मक दृष्टि से देखें। भारत को जागरूक, विचारशील और जिम्मेदार युवाओं की आवश्यकता है ऐसे युवा जो सवाल भी पूछें और समाधान भी खोजें। देश को केवल ट्रेंड करने वाले युवा नहीं, बल्कि सोचने, समझने और निर्माण करने वाले युवा चाहिए । लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति भीड़ में नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों में होती है। गजेंद्र सिंह

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राजनीति गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग: आस्था, राजनीति, अर्थव्यवस्था और भाजपा की नई परीक्षा

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शख्सियत सुमन कल्याणपुर :स्वर की वह शालीन नदी, जो चुपचाप बहती रही

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सुमन कल्याणपुर ने ऐसे समय में संगीत जगत में कदम रखा जब लता मंगेशकर, गीता दत्त और आशा भोंसले जैसी महान गायिकाओं का वर्चस्व था।…

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Health जीवन के लिए जरूरी साइकल का साथ

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विश्व साइकिल  दिवस

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समाज जब ट्रेंड तय करने लगे जनमत

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मनोरंजन क्या पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बन पायेगा ?

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आज सूचना क्रांति का युग है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने समाचारों के प्रसार को अत्यंत तेज बना दिया है। जहां पहले एक…

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प्रवक्ता न्यूज़ मनुस्मृति और भारतीय संविधान, भाग – 17

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